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मेडिकल बोर्डों की विश्वसनीयता के मामले में बरतें सावधानी

Sat, 16 Jan 2016 11:47 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद Updated Sat, 16 Jan 2016 11:47 PM IST
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भर्ती परीक्षा में मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आदेश देने में अदालतों को सावधानी बरतनी चाहिए। आदेश भर्ती प्रक्रिया में निर्धारित नियमों के तहत ही होना चाहिए। इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अदालतों को नसीहत दी है कि अनुच्छेद 226 के तहत प्राप्त शक्तियां व्यापक हैं, किंतु इसका उपयोग बेहद सावधानी से परिस्थिति के अनुरूप होना चाहिए। यदि अभ्यर्थी स्वयं किसी चिकित्सक से परीक्षण कराकर रिपोर्ट देता है, और अदालत किसी स्वतंत्र बोर्ड को दोबारा परीक्षण करने का निर्देश देती है तो याची की विश्वसनीयता की जांच कठिन कार्य होगा। खंडपीठ ने रेलवे सुरक्षा बल में कांस्टेबल पद की अभ्यर्थी के मामले में एकल न्यायपीठ का आदेश इसी आधार पर रद्द कर दिया है।
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एकलपीठ में याची पारुल पुनिया ने भर्ती हेतु गठित मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को चुनौती दी। उसने सिपाही भर्ती परीक्षा में आवेदन किया था। लिखित परीक्षा में पास होने के बाद मेडिकल बोर्ड ने उसकी दृष्टि क्षमता उपयुक्त नहीं होने के आधार पर नियुक्ति नहीं दी। याची ने एम्स के एक चिकित्सक की रिपोर्ट कोर्ट में प्रस्तुत कर बताया कि उसकी दृष्टि क्षमता सही है, इसके बावजूद रेलवे द्वारा गठित मेडिकल बोर्ड ने उसकी दृष्टि क्षमता कम बताते हुए चयन सूची में स्थान नहीं दिया। एकल पीठ ने किंग जार्ज मेडिकल लखनऊ के प्राचार्य को एक मेडिकल बोर्ड बनाकर याची की दृष्टि क्षमता पर रिपोर्ट मांगी। केजीएमसी की रिपोर्ट में भी दृष्टि क्षमता सही पाई गई। एकलपीठ ने याची को नियुक्ति देने का आदेश दिया साथ रेलवे पर दस हजार रुपये का हर्जाना भी लगाया था।
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रेलवे ने इस फैसले को विशेष अपील में चुनौती दी। खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए कहा कि भर्ती प्रक्रिया के तहत ही मेडिकल बोर्ड के निर्णय का पुनरीक्षण करने की व्यवस्था है। याची ने जिस चिकि त्सक की रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की उसमें यह तय नहीं कि चिकित्सक की योग्यता कितनी है। या उसने जिसका नेत्र परीक्षण किया वह याची ही थी कोई और व्यक्ति नहीं। याची का प्रत्यावेदन मुख्य सुरक्षा आयुक्त आरपीएफ ने कारण देते हुए निस्तारित किया है जबकि एकल पीठ ने इसे सही नहीं माना। खंडपीठ का कहना था कि ऐसे मामलों में अदालतों को आदेश देते समय ऐसी संभावनाओं और खतरों का भी ध्यान रखना चाहिए। सामान्यत: निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही पुनरीक्षण का आदेश पारित करना चाहिए। 
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