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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   High Court: Mere incitement or being present at the scene of the incident is not enough to prove common intent

High Court : केवल उकसाना या घटना स्थल पर मौजूद होना साझा इरादा साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं

Mon, 11 Aug 2025 10:08 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 11 Aug 2025 10:08 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल किसी को उकसाना या घटना स्थल पर मौजूद होना हत्या के आरोपी के साथ साझा इरादा साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने विजय उर्फ बब्बन की अपील स्वीकार कर ली।

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High Court: Mere incitement or being present at the scene of the incident is not enough to prove common intent
अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल किसी को उकसाना या घटना स्थल पर मौजूद होना हत्या के आरोपी के साथ साझा इरादा साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने विजय उर्फ बब्बन की अपील स्वीकार कर ली। इसके साथ ही ट्रायल कोर्ट की ओर से हत्या मामले में आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह व न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की खंडपीठ ने दिया।

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झांसी के नवाबाद थाने में 1983 में विजय पर हत्या के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता बहादुर शाह ने आरोप लगाया था कि वह 17 दिसंबर 1983 को अपने भाई बशीर शाह और एक अन्य महेंद्र के साथ अपने घर लौट रहे थे। रास्ते में नरेंद्र कोरी और विजय मिल गए। नरेंद्र ने बशीर शाह के साथ गाली-गलौज शुरू कर दी।

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इसी दौरान विजय ने कथित तौर पर मारने के लिए उकसाया। इसके बाद नरेंद्र ने चाकू निकाला और बशीर पर वार किए। घटना के बाद दोनों आरोपी मौके से भाग गए और घायल बशीर इलाज के दौरान मौत हो गई। अपर सत्र न्यायाधीश ने इस मामले में विजय व नरेंद्र को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इसके खिफाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की गई। अपील के लंबित रहने के दौरान नरेंद्र की मौत हो जाने से उसकी अपील को निरस्त कर दी गई।

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हाईकोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि अपीलकर्ता विजय का नरेंद्र के साथ अपराध करने का कोई पूर्व-निर्धारित साझा इरादा था। विजय के खिलाफ केवल उकसावे का आरोप था और यह एक कमजोर साक्ष्य है। गवाहों ने अपने बयान में कहा कि विजय की ओर से चाकू लहराया और गवाहों को धमकाया गया जबकि एफआईआर में इसका उल्लेख नहीं था। इन आधारों पर कोर्ट ने विजय को सभी आरोपों से बरी कर दिया और उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।

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