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High Court : मजिस्ट्रेट तथ्य की जानकारी होने के आधार पर एफआईआर से इन्कार नहीं कर सकते

Fri, 11 Oct 2024 12:57 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 11 Oct 2024 12:57 PM IST
सार

यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की अदालत ने मुकेश खरवार की अर्जी पर दिया है। चंदौली पपौरा विकास खंड चहनिया से बीडीसी सदस्य मुकेश खरवार ने 156(3) के तहत आवेदन दायर किया था।

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High Court: Magistrate cannot refuse FIR on the basis of knowledge of facts
अदालत - फोटो : ANI

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि मजिस्ट्रेट तथ्यों की जानकारी होने के आधार पर एफआईआर दर्ज करने से इन्कार नहीं कर सकते हैं। यह टिप्पणी कर कोर्ट ने चंदौली के मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द कर कहा कि एक महीने में कानून के अनुसार नया आदेश पारित करें। मजिस्ट्रेट ने आवेदन को शिकायत के रूप में दर्ज करते हुए कहा था कि तथ्य आवेदक की जानकारी में है। इसलिए एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने की जरूरत नहीं।

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यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की अदालत ने मुकेश खरवार की अर्जी पर दिया है। चंदौली पपौरा विकास खंड चहनिया से बीडीसी सदस्य मुकेश खरवार ने 156(3) के तहत आवेदन दायर किया था। आरोप लगाया था कि चार फरवरी 2024 को 66 क्षेत्र पंचायत सदस्यों के साथ अरुण जायसवाल ब्लॉक प्रमुख चहनिया के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करने के लिए डीएम कार्यालय पर एकत्र हुए थे।

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इससे नाराज होकर ग्रामीण गोपाल सिंह उर्फ बबलू,मोनू सिंह उसके गांव पहुंचे। वहां ब्लॉक प्रमुख के पक्ष में शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया। इन्कार करने पर गालीगलौज, जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए मारपीट की। इस संबंध में पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की तो 156(3) के तहत आवेदन दायर किया। संबंधित मजिस्ट्रेट ने आवेदन को कंप्लेन की तरह दर्ज किया। साथ ही एफआईआर दर्ज करने का निर्देश जारी करने की प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया। आवेदक ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।

कोर्ट ने कहा कि अपराध की गंभीरता, अभियोजन शुरू करने के लिए साक्ष्य की आवश्यकता और न्याय के हित में 156(3) के तहत आदेश पारित करते समय विचार किया जाना चाहिए। कोर्ट ने आवेदन स्वीकार करते हुए मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया।

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