High Court : मौत के पहले सौदा तय तो वारिस नहीं कर सकते रजिस्ट्री से इन्कार, बेटियों की अपील खारिज
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि विक्रय अनुबंध के बाद संपत्ति के मालिक की मौत हो जाए और खरीदार सौदे के मुताबिक रकम अदा करने को तैयार है तो मृतक के वारिस रजिस्ट्री करने से इन्कार नहीं कर सकते।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि विक्रय अनुबंध के बाद संपत्ति के मालिक की मौत हो जाए और खरीदार सौदे के मुताबिक रकम अदा करने को तैयार है तो मृतक के वारिस रजिस्ट्री करने से इन्कार नहीं कर सकते। उन्हें हर हाल में रजिस्ट्री करनी होगी। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति संदीप जैन की अदालत ने कानपुर निवासी मीमांसा नांगिया व अन्य की ओर से दाखिल अपील खारिज कर दी। साथ ही आदेश दिया है कि वे एक महीने के भीतर बकाया रकम लेकर खरीदार के पक्ष में विक्रय विलेख (रजिस्ट्री) निष्पादित करें।
मामला कानपुर नगर के काकादेव स्थित एक बेशकीमती जमीन से जुड़ा है। जमीन के मालिक धर्म प्रकाश नांगिया ने 2012 में शिवानी हॉस्पिटल प्राइवेट लिमिटेड के साथ 5.25 करोड़ रुपये में संपत्ति का सौदा किया था। अस्पताल ने करीब 2.41 करोड़ रुपये का भुगतान भी कर दिया था। शेष राशि रजिस्ट्री के वक्त दी जानी थी।
इसी बीच 2015 में धर्म प्रकाश नांगिया का निधन हो गया। पिता की मौत के बाद उनकी बेटी मीमांसा नांगिया व अन्य बेटियों ने इस आधार पर रजिस्ट्री से इन्कार कर दिया कि सौदा कम कीमत पर हुआ था और खरीदार ने उनके पिता पर अनुचित दबाव बनाया था।
बेटियों की ओर से रजिस्ट्री से इन्कार करने पर खरीदार ने सिविल कोर्ट में वाद दाखिल किया था। अदालत ने खरीदार के पक्ष में फैसला सुनाया तो बेटियों ने हाईकोर्ट का रुख किया। कहा कि खरीदार अस्पताल के मालिक उनके पारिवारिक डॉक्टर हैं। इसी अनुचित प्रभाव में उन्होंने उनके पिता से सस्ते में जमीन का सौदा कर लिया। यह भी दलील दी कि जमीन फ्रीहोल्ड भी नहीं कराई गई है।
कोर्ट ने बेटियों की अपील खारिज करते हुए कहा कि केवल पारिवारिक डॉक्टर होना अनुचित प्रभाव का सबूत नहीं है। वह भी तब जब अस्पताल प्रशासन ने न केवल समय पर भुगतान किया, बल्कि शेष 2.84 करोड़ रुपये भी अदालत में जमा कर दिए। लिहाजा, अनुबंध की शर्तों को पूरा करना विक्रेता के वारिसों की कानूनी बाध्यता है।
कोर्ट की टिप्पणी
विशिष्ट अनुपालन अधिनियम के तहत यदि खरीदार अपनी जिम्मेदारी निभाने को तैयार है तो विक्रेता के वारिस अनुबंध को ठंडे बस्ते में नहीं डाल सकते। विक्रेता की जिम्मेदारी थी कि वह जमीन फ्रीहोल्ड कराए। इसकी आड़ में वारिस खरीदार की रजिस्ट्री में रोड़ा नहीं खड़ा कर सकते। - हाईकोर्ट