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UP : हाईकोर्ट ने आर्बिट्रेशन कार्यवाही को लेकर दाखिल याचिका को पोषणीय नहीं माना
Wed, 03 Apr 2024 04:54 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 03 Apr 2024 04:54 PM IST
सार
राज्य सरकार के अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता निमाई दास ने सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की पीठ के दीप कांस्ट्रक्शन व भावेन कांस्ट्रक्शन केसों के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आर्बिट्रेशन कार्यवाही के खिलाफ अनुच्छेद 226 व 227 में याचिका पोषणीय नहीं है।
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अदालत।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आर्बिट्रेशन कार्यवाही को लेकर दाखिल की गई याचिका को पोषणीय नहीं माना और हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अवार्ड देने से पहले याची की आपत्ति का निस्तारण नहीं किया गया है, इसलिए आर्बिट्रेशन अधिकरण आपत्ति को निस्तारित करे। यह आदेश न्यायमूर्ति एसडी सिंह तथा न्यायमूर्ति सुरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने कैनन डंकरले एंड कंपनी लिमिटेड की तरफ से दाखिल याचिका को निस्तारित करते हुए दिया है।
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राज्य सरकार के अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता निमाई दास ने सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की पीठ के दीप कांस्ट्रक्शन व भावेन कांस्ट्रक्शन केसों के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आर्बिट्रेशन कार्यवाही के खिलाफ अनुच्छेद 226 व 227 में याचिका पोषणीय नहीं है। आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 34 में अवार्ड के खिलाफ जिला जज के समक्ष आपत्ति की जा सकती है। इसलिए हाईकोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने तथ्यों व न्यायिक निर्णयों पर विचार करते हुए हस्तक्षेप से इंन्कार कर दिया। याचिका में आर्बिट्रेशन अधिकरण माइक्रो एंड स्माल इंटरप्राइजेज फैसिलिटेशन काउंसिल मेरठ के 25 जुलाई 23 के आदेश को चुनौती दी गई थी।
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शासकीय अधिवक्ता ने कहा कि आर्बिट्रेशन एक्ट एक स्वतंत्र कानून हैं और उसकी खुद की कार्यवाही प्रक्रिया निर्धारित है। इसलिए सामान्य प्रक्रिया इसपर लागू नहीं होगी। यदि आपत्ति अस्वीकार की गई है तो अवार्ड के साथ चुनौती दी जा सकती है। याचिका दायर नहीं की जा सकती। याचिका पर अधिवक्ता विकास भटनागर व विपक्षी के अधिवक्ता अभिनव मेहरोत्रा ने भी पक्ष रखा। कोर्ट ने पाया कि आपत्ति का मेरिट पर निस्तारण नहीं किया गया है। जो अवार्ड की चुनौती के समय विचारणीय होगा। हाईकोर्ट का इसपर विचार करना उचित नहीं होगा।
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