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हाईकोर्ट ने आर्य समाज कीडगंज की ओर से कराई जा रही शादियों पर लगाई रोक
Thu, 02 Jun 2022 02:00 AM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 02 Jun 2022 02:00 AM IST
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इलाहाबाद हाईकोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आर्य समाज कीडगंज की ओर से कराई जा रही शादियों पर रोक लगा दी है। मामले में प्रयागराज के एसएसपी को जांच का आदेश देते हुए अगली सुनवाई पर हलफनामे के साथ रिपोर्ट पेश करने को कहा है।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि आरोप सही पाए जाएं तो संस्था के कथित प्रधान के खिलाफ कार्रवाई की जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा और रजनीश कुमार की खंडपीठ ने कपिल कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने मामले की सुनवाई केलिए आठ अगस्त 2022 को तिथि तय की है।
कोर्ट ने कहा है कि आर्य समाज कीडगंज, प्रयागराज के कथित प्रधान संतोष कुमार शास्त्री के माध्यम से विवाह प्रमाण पत्र जारी करते समय उनके कामकाज के तरीके और कार्यप्रणाली की जांच की जाए। यह पता लगाया जाए कि क्या वास्तव में शादियां हो रही हैं या यह महज शादी के खाली प्रमाण पत्र जारी कर रहे हैं। कोर्ट ने कथित प्रधान संतोष कुमार शास्त्री को उन सभी विवाहों के रजिस्टर प्रस्तुत करने का भी निर्देश दिया है, जो विवाह पिछले पांच वर्षों में उन्होंने कराए हैं।
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प्रकरण में याची ने कोर्ट के समक्ष सुरक्षा की मांग को लेकर याचिका दाखिल की थी। याची का तर्क था कि वह प्रतिवादी पक्ष संख्या चार से शादी कर चुका है। उसकी शादी का प्रमाणपत्र आर्य समाज कृष्णानगर कीडगंज के पुजारी संतोष कुमार शास्त्री की ओर से 25 जुलाई 2016 को जारी किया गया है। इसके बावजूद उसके खिलाफ मथुरा के राया थाने में रिपोर्ट दर्ज की गई है और प्रतिवादियों की ओर से उनकी शादी को अवैध बताते हुए परेशान किया जा रहा है। याची ने एफआईआर को कानूनन गलत बताया।
कोर्ट ने कहा कि विवाह प्रमाण पत्र विवाह के तथ्य को स्थापित करने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है और पार्टियों या उनके माध्यम से दावा करने वालों के भविष्य के अधिकारों को भी निर्धारित करता है। अत:ऐसे प्रमाणपत्र बिना उचित सत्यापन या विवाह समारोह के प्रदर्शन के जारी नहीं किए जा सकते हैं और न ही किसी निकाय को केवल मांगे जाने पर विचार करने के लिए प्रमाण पत्र जारी करने की अनुमति दी जा सकती है। इसलिए यह उचित होगा कि मामले की जांच कराई जाए।
मां ने कहा-याची की पहले ही हो चुकी है शादी
सुनवाई के दौरान उस समय नया मोड़ आया जब याची की मां की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने बताया कि याची की शादी पहले ही मथुरा में दलवीर से हो चुकी है। आर्य समाज कीडगंज में उसकी शादी नहीं हुई है। केवल फर्जी विवाह प्रमाणपत्र जारी किया गया है। इस वजह से यह विवाह वैध नहीं है।
यह भी बताया गया कि दोनों पार्टियां मथुरा की हैं। कोर्ट को यह भी बताया गया कि आर्य समाज कीडगंज के कथित प्रधान संतोष कुमार शास्त्री की ओर से फर्जी विवाह प्रमाणपत्र जारी करने की शिकायतों को लेकर सौ से अधिक याचिकाएं लंबित हैं। प्रधान की ओर से जारी यह विवाह प्रमाणपत्र बिना तथ्यों के सत्यापन किए जारी किया है।
प्रधान को पद से हटा चुकी है आर्य प्रतिनिधि सभा
कोर्ट ने अगली सुनवाई पर कथित प्रधान संतोष कुमार शास्त्री को हलफनामे के साथ पेश होने के लिए आदेश दिया है। अपने हलफनामे में उन्हें यह बताना होगा कि उन्होंनेा कितने विवाह प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं और इस तरह के प्रमाण पत्र जारी करने के लिए क्या उनको कानूनी अधिकार है।
जबकि आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश ने उन्हें पहले ही इस पद से हटा दिया है। फिर भी वह इस तरह के प्रमाणपत्र जारी कर रहे हैं। कोर्ट ने मामले में पाया कि याची मथुरा का निवासी है और विवाह प्रमाण पत्र जारी करने के अलावा उनका इलाहाबाद से कोई सरोकार नहीं है।
इस तरह के प्रमाणपत्र भागे हुए लड़के और लड़कियों को वैधता प्रदान करते हैं
कोर्ट ने मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि जिस तरह सिर्फ उत्तर प्रदेश राज्य ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों से भी व्यक्तियों को विवाह प्रमाणपत्र जारी किए जा रहे हैं, उससे प्रथम दृष्टया यही प्रतीत होता है कि इस तरह के प्रमाणपत्र जारी करने का उद्देश्य केवल भागे हुए लड़के और लड़कियों को वैधता प्रदान करना है।
यह प्रमाणपत्र उनकी पहचान निर्धारित किए बिना और उनकी उम्र आदि का पता लगाए बिना जारी किए जा रहे हैं, जिसका कि एकमात्र उद्देश्य है कि वे सुरक्षा हासिल कर सकें। यदि पक्षों के बीच भविष्य में कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो संबंधित व्यक्ति द्वारा प्रमाण पत्र जारी करने के तरीके से विवाह के तथ्य को निर्धारित करना बहुत मुश्किल होगा। कोर्ट ने कहा कि ये युवा लड़के और लड़कियां मोह या अन्य कारणों से आपस में प्रेम कर बैठते हैं। जिसका भविष्य बहुत सीमित अवधि के लिए हो सकता है।
कोर्ट ने कहा कि इन युवाओं के लिए वह जो कठिनाई देखते हैं, वह यह है कि अगर उनके रिश्ते टूट जाते हैं, तो उनका साथ देने वाला कोई नहीं होता है। परिवार उनसे दूरी बना लेते हैं और जाहिर तौर पर इन युवा लड़कियों के लिए कोई अन्य सामाजिक सुरक्षा तंत्र नहीं है। संविधान उनकी स्वतंत्रता का सम्मान करता है लेकिन न्यायालय उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है और उस पर बाद में होने वाली बीमारियों से बचाने का दायित्व भी है।
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कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि आरोप सही पाए जाएं तो संस्था के कथित प्रधान के खिलाफ कार्रवाई की जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा और रजनीश कुमार की खंडपीठ ने कपिल कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने मामले की सुनवाई केलिए आठ अगस्त 2022 को तिथि तय की है।
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कोर्ट ने कहा है कि आर्य समाज कीडगंज, प्रयागराज के कथित प्रधान संतोष कुमार शास्त्री के माध्यम से विवाह प्रमाण पत्र जारी करते समय उनके कामकाज के तरीके और कार्यप्रणाली की जांच की जाए। यह पता लगाया जाए कि क्या वास्तव में शादियां हो रही हैं या यह महज शादी के खाली प्रमाण पत्र जारी कर रहे हैं। कोर्ट ने कथित प्रधान संतोष कुमार शास्त्री को उन सभी विवाहों के रजिस्टर प्रस्तुत करने का भी निर्देश दिया है, जो विवाह पिछले पांच वर्षों में उन्होंने कराए हैं।
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प्रकरण में याची ने कोर्ट के समक्ष सुरक्षा की मांग को लेकर याचिका दाखिल की थी। याची का तर्क था कि वह प्रतिवादी पक्ष संख्या चार से शादी कर चुका है। उसकी शादी का प्रमाणपत्र आर्य समाज कृष्णानगर कीडगंज के पुजारी संतोष कुमार शास्त्री की ओर से 25 जुलाई 2016 को जारी किया गया है। इसके बावजूद उसके खिलाफ मथुरा के राया थाने में रिपोर्ट दर्ज की गई है और प्रतिवादियों की ओर से उनकी शादी को अवैध बताते हुए परेशान किया जा रहा है। याची ने एफआईआर को कानूनन गलत बताया।
कोर्ट ने कहा कि विवाह प्रमाण पत्र विवाह के तथ्य को स्थापित करने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है और पार्टियों या उनके माध्यम से दावा करने वालों के भविष्य के अधिकारों को भी निर्धारित करता है। अत:ऐसे प्रमाणपत्र बिना उचित सत्यापन या विवाह समारोह के प्रदर्शन के जारी नहीं किए जा सकते हैं और न ही किसी निकाय को केवल मांगे जाने पर विचार करने के लिए प्रमाण पत्र जारी करने की अनुमति दी जा सकती है। इसलिए यह उचित होगा कि मामले की जांच कराई जाए।
मां ने कहा-याची की पहले ही हो चुकी है शादी
सुनवाई के दौरान उस समय नया मोड़ आया जब याची की मां की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने बताया कि याची की शादी पहले ही मथुरा में दलवीर से हो चुकी है। आर्य समाज कीडगंज में उसकी शादी नहीं हुई है। केवल फर्जी विवाह प्रमाणपत्र जारी किया गया है। इस वजह से यह विवाह वैध नहीं है।
यह भी बताया गया कि दोनों पार्टियां मथुरा की हैं। कोर्ट को यह भी बताया गया कि आर्य समाज कीडगंज के कथित प्रधान संतोष कुमार शास्त्री की ओर से फर्जी विवाह प्रमाणपत्र जारी करने की शिकायतों को लेकर सौ से अधिक याचिकाएं लंबित हैं। प्रधान की ओर से जारी यह विवाह प्रमाणपत्र बिना तथ्यों के सत्यापन किए जारी किया है।
प्रधान को पद से हटा चुकी है आर्य प्रतिनिधि सभा
कोर्ट ने अगली सुनवाई पर कथित प्रधान संतोष कुमार शास्त्री को हलफनामे के साथ पेश होने के लिए आदेश दिया है। अपने हलफनामे में उन्हें यह बताना होगा कि उन्होंनेा कितने विवाह प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं और इस तरह के प्रमाण पत्र जारी करने के लिए क्या उनको कानूनी अधिकार है।
जबकि आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश ने उन्हें पहले ही इस पद से हटा दिया है। फिर भी वह इस तरह के प्रमाणपत्र जारी कर रहे हैं। कोर्ट ने मामले में पाया कि याची मथुरा का निवासी है और विवाह प्रमाण पत्र जारी करने के अलावा उनका इलाहाबाद से कोई सरोकार नहीं है।
इस तरह के प्रमाणपत्र भागे हुए लड़के और लड़कियों को वैधता प्रदान करते हैं
कोर्ट ने मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि जिस तरह सिर्फ उत्तर प्रदेश राज्य ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों से भी व्यक्तियों को विवाह प्रमाणपत्र जारी किए जा रहे हैं, उससे प्रथम दृष्टया यही प्रतीत होता है कि इस तरह के प्रमाणपत्र जारी करने का उद्देश्य केवल भागे हुए लड़के और लड़कियों को वैधता प्रदान करना है।
यह प्रमाणपत्र उनकी पहचान निर्धारित किए बिना और उनकी उम्र आदि का पता लगाए बिना जारी किए जा रहे हैं, जिसका कि एकमात्र उद्देश्य है कि वे सुरक्षा हासिल कर सकें। यदि पक्षों के बीच भविष्य में कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो संबंधित व्यक्ति द्वारा प्रमाण पत्र जारी करने के तरीके से विवाह के तथ्य को निर्धारित करना बहुत मुश्किल होगा। कोर्ट ने कहा कि ये युवा लड़के और लड़कियां मोह या अन्य कारणों से आपस में प्रेम कर बैठते हैं। जिसका भविष्य बहुत सीमित अवधि के लिए हो सकता है।
कोर्ट ने कहा कि इन युवाओं के लिए वह जो कठिनाई देखते हैं, वह यह है कि अगर उनके रिश्ते टूट जाते हैं, तो उनका साथ देने वाला कोई नहीं होता है। परिवार उनसे दूरी बना लेते हैं और जाहिर तौर पर इन युवा लड़कियों के लिए कोई अन्य सामाजिक सुरक्षा तंत्र नहीं है। संविधान उनकी स्वतंत्रता का सम्मान करता है लेकिन न्यायालय उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है और उस पर बाद में होने वाली बीमारियों से बचाने का दायित्व भी है।