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High Court: मुकदमों के बोझ से बचने के लिए तलाक अर्जी में संशोधन की अनुमति दी जानी चाहिए, पत्नी की याचिका खारिज

Wed, 08 Oct 2025 04:20 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 08 Oct 2025 04:20 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल वाद बिंदु तय हो जाने से मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हो जाती है। सुनवाई तब शुरू होती है जब वादी की ओर से साक्ष्य प्रस्तुत करने की तारीख तय की जाती है।

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High Court: Amendment of divorce petition should be allowed to avoid the burden of litigation
अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल वाद बिंदु तय हो जाने से मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हो जाती है। सुनवाई तब शुरू होती है जब वादी की ओर से साक्ष्य प्रस्तुत करने की तारीख तय की जाती है। ऐसे में वाद बिंदु तय होने के बाद नए तथ्य सामने आते हैं तो संशोधन की अनुमति दी जा सकती है, ताकि मुकदमों के बोझ से बचा जा सके।

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इस टिप्पणी संग कोर्ट ने तलाक अर्जी में नए तथ्य जोड़ने के खिलाफ पत्नी की ओर से दाखिल याचिका खारिज कर दी। यह आदेश न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की एकलपीठ ने चित्रांशी की याचिका पर दिया। हमीरपुर निवासी राजनारायण त्रिपाठी ने परिवार न्यायालय में तलाक के लिए अर्जी दाखिल की थी। वाद बिंदु तय होने के बाद पति ने पत्नी पर अपने सहकर्मी के साथ संबंध होने का आरोप लगाया और इस तथ्य को जोड़ने के लिए संशोधन अर्जी दाखिल की। परिवार न्यायालय ने इस अर्जी को स्वीकार कर लिया। इसे याची पत्नी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।

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याची पत्नी के अधिवक्ता ने दलील दी कि नियमानुसार मुकदमा शुरू होने के बाद संशोधन की अनुमति नहीं दी जा सकती। वाद बिंदु तय हो चुके थे और ट्रायल शुरू हो चुका था। ऐसे में संशोधन अर्जी स्वीकार करना पूर्व निर्धारित तलाक के आधार को बदलने या नए को जोड़ने का प्रयास है।

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हाईकोर्ट ने कहा कि संशोधन आवेदन में वे तथ्य शामिल हैं जो वादी-पति को बाद में पता चले। यदि बाद में कोई तथ्य ज्ञान में आते हैं तो न्याय के हित में संशोधन की अनुमति दी जा सकती है। कोर्ट ने माना कि पति ने मूलरूप से जो तलाक याचिका दायर की थी, वह लंबे समय से पति से अलग रहने और क्रूरता के आधार पर थी। प्रस्तावित संशोधन किसी नए आधार को पेश करने के बजाय उन तथ्यों का विस्तार है जो साबित होने पर क्रूरता की श्रेणी में आ सकते हैं।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत एक पक्ष से एक से अधिक आधार पर तलाक की मांग कर सकता है। यदि कोई नया आधार भी जोड़ा जाता है तो भी संशोधन की अनुमति दी जानी चाहिए, ताकि मुकदमों के बोझ से बचा जा सके। 

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