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याचिका की पोषणीयता के लिए वाद कारण जरूरी, निवास नहींः हाईकोर्ट
Tue, 05 May 2020 09:08 PM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Tue, 05 May 2020 09:08 PM IST
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इलाहाबाद हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन जजों की वृहदपीठ ने फैसला दिया है कि हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने के लिए पूर्ण अथवा आंशिक वाद का कारण होना जरूरी है। अगर वाद का कारण होने का विस्तृत जिक्र याचिका में नहीं है तो कोर्ट में याचिका इस आधार पर ग्राह्य नहीं हो सकती कि याची हाईकोर्ट की अधिकारिता वाले राज्य में निवास करता है।
कोर्ट ने कहा कि केवल हाईकोर्ट की अधिकारिता वाले राज्य का निवासी होना किसी याचिका की पोषणीयता का आधार नहीं हो सकता। वृहद्पीठ के जस्टिस सुनीता अग्रवाल, जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्र, व जस्टिस डा. वाई के श्रीवास्तव ने मनीष कुमार मिश्र व कई अन्य रिफरेन्स को तय करते हुए यह फैसला दिया है।
एकल जज ने अपने प्रेषित संदर्भ में कहा था कि यहां की फुल बेंच व अन्य डिवीजन बेंच में इस बात की मतभिन्नता है कि राज्य के बाहर के किसी सक्षम अधिकारी द्वारा पारित आदेश के खिलाफ याचिका पोषणीय है कि नहीं। संदर्भ में उन सभी निर्णयों का भी उल्लेख किया गया था। वृहदपीठ ने अपने निर्णय में विस्तार से उन सभी पूर्व निर्णयों का उल्लेख कर कहा कि इस मामले में कोई संशय नहीं है। पूर्व के निर्णय स्पष्ट हैं।
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तीनों जजों ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया कि जब तक वाद का कारण पूर्ण अथवा आंशिक रूप से संबंधित हाईकोर्ट के क्षेत्र वाले अधिकारिता में न हो, याचिका पोषणीय नहीं होगी । कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 में हुए संशोधन को भी अपने निर्णय में आधार लिया है। कोर्ट ने कहा कि यदि वाद का कारण कई स्थानों में उत्पन्न होता है तो यह याची की अपनी इच्छा पर है कि वह किस हाईकोर्ट में याचिका दायर करेगा। याचिका ग्राह्य होने से पूर्व याची को यह बताना होगा कि यह जरूरी तथ्य है, जिस कारण याचिका यहां पोषणीय है। याचिका में कहीं गई बातों के आधार पर ही अधिकारिता का मुद्दा तय होगा।
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कोर्ट ने कहा कि केवल हाईकोर्ट की अधिकारिता वाले राज्य का निवासी होना किसी याचिका की पोषणीयता का आधार नहीं हो सकता। वृहद्पीठ के जस्टिस सुनीता अग्रवाल, जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्र, व जस्टिस डा. वाई के श्रीवास्तव ने मनीष कुमार मिश्र व कई अन्य रिफरेन्स को तय करते हुए यह फैसला दिया है।
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एकल जज ने अपने प्रेषित संदर्भ में कहा था कि यहां की फुल बेंच व अन्य डिवीजन बेंच में इस बात की मतभिन्नता है कि राज्य के बाहर के किसी सक्षम अधिकारी द्वारा पारित आदेश के खिलाफ याचिका पोषणीय है कि नहीं। संदर्भ में उन सभी निर्णयों का भी उल्लेख किया गया था। वृहदपीठ ने अपने निर्णय में विस्तार से उन सभी पूर्व निर्णयों का उल्लेख कर कहा कि इस मामले में कोई संशय नहीं है। पूर्व के निर्णय स्पष्ट हैं।
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तीनों जजों ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया कि जब तक वाद का कारण पूर्ण अथवा आंशिक रूप से संबंधित हाईकोर्ट के क्षेत्र वाले अधिकारिता में न हो, याचिका पोषणीय नहीं होगी । कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 में हुए संशोधन को भी अपने निर्णय में आधार लिया है। कोर्ट ने कहा कि यदि वाद का कारण कई स्थानों में उत्पन्न होता है तो यह याची की अपनी इच्छा पर है कि वह किस हाईकोर्ट में याचिका दायर करेगा। याचिका ग्राह्य होने से पूर्व याची को यह बताना होगा कि यह जरूरी तथ्य है, जिस कारण याचिका यहां पोषणीय है। याचिका में कहीं गई बातों के आधार पर ही अधिकारिता का मुद्दा तय होगा।