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UP: हाईकोर्ट ने भरण-पोषण मामले में व्हाट्सएप चैट को साक्ष्य के रूप में माना, फेमिली कोर्ट ने नहीं दी थी अनुमति
Fri, 27 Feb 2026 02:27 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Fri, 27 Feb 2026 02:27 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण के एक मामले में व्हाट्सएप चैट को साक्ष्य के रूप में पेश करने की अनुमति दी है। मथुरा ट्रायल कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत इसकी अनुुमति नहीं दी थी, जिस पर न्यायमूर्ति मदन पाल की एकलपीठ ने कहा कि पारिवारिक न्यायालय ऐसे साक्ष्य स्वीकार कर सकता है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण के एक मामले में व्हाट्सएप चैट को साक्ष्य के रूप में पेश करने की अनुमति दी है। मथुरा ट्रायल कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत इसकी अनुुमति नहीं दी थी, जिस पर न्यायमूर्ति मदन पाल की एकलपीठ ने कहा कि पारिवारिक न्यायालय ऐसे साक्ष्य स्वीकार कर सकता है। भले ही वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत औपचारिक रूप से ग्राह्य न हों।
मामले में मथुरा के परिवार न्यायालय ने पत्नी को 10,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया था। पति ने दलील दी कि पत्नी किसी अन्य पुरुष के साथ व्यभिचारपूर्ण संबंध में रह रही है। इसलिए उसे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का अधिकार नहीं है। उसके पास पत्नी और कथित व्यक्ति के बीच हुई व्हाट्सएप चैट है, जो अशोभनीय प्रकृति की है और शारीरिक संबंधों की ओर संकेत करती है।
परिवार न्यायालय ने इन चैट्स को इस आधार पर स्वीकार नहीं किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 14 के तहत परिवार न्यायालय किसी भी ऐसे साक्ष्य को स्वीकार कर सकता है, जो विवाद के प्रभावी निस्तारण में सहायक हों, चाहे वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत तकनीकी रूप से ग्राह्य हों या नहीं।
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हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने न तो व्यभिचार के बिंदु पर कोई स्पष्ट मुद्दा निर्धारित किया और न ही प्रस्तुत सामग्री पर विचार किया। विशिष्ट कथनों और समर्थन में प्रस्तुत सामग्री को देखते हुए ट्रायल कोर्ट को इस संबंध में एक विशिष्ट मुद्दा तय कर साक्ष्य के आधार पर निर्णय करना चाहिए था।
हाईकोर्ट ने 22 अगस्त 2025 के ट्रायल कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को पुनः विचार के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया। साथ ही निर्देश दिया कि पक्षकारों को साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर देते हुए परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 14 के आलोक में विवाद का निस्तारण करे।
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मामले में मथुरा के परिवार न्यायालय ने पत्नी को 10,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया था। पति ने दलील दी कि पत्नी किसी अन्य पुरुष के साथ व्यभिचारपूर्ण संबंध में रह रही है। इसलिए उसे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का अधिकार नहीं है। उसके पास पत्नी और कथित व्यक्ति के बीच हुई व्हाट्सएप चैट है, जो अशोभनीय प्रकृति की है और शारीरिक संबंधों की ओर संकेत करती है।
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परिवार न्यायालय ने इन चैट्स को इस आधार पर स्वीकार नहीं किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 14 के तहत परिवार न्यायालय किसी भी ऐसे साक्ष्य को स्वीकार कर सकता है, जो विवाद के प्रभावी निस्तारण में सहायक हों, चाहे वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत तकनीकी रूप से ग्राह्य हों या नहीं।
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हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने न तो व्यभिचार के बिंदु पर कोई स्पष्ट मुद्दा निर्धारित किया और न ही प्रस्तुत सामग्री पर विचार किया। विशिष्ट कथनों और समर्थन में प्रस्तुत सामग्री को देखते हुए ट्रायल कोर्ट को इस संबंध में एक विशिष्ट मुद्दा तय कर साक्ष्य के आधार पर निर्णय करना चाहिए था।
हाईकोर्ट ने 22 अगस्त 2025 के ट्रायल कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को पुनः विचार के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया। साथ ही निर्देश दिया कि पक्षकारों को साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर देते हुए परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 14 के आलोक में विवाद का निस्तारण करे।