फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Gyanvapi case: Judgment reserved on the petition challenging puja in Vyas basement

ज्ञानवापी विवाद : व्यास तहखाने में पूजा के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित

Thu, 15 Feb 2024 11:48 AM IST
विनोद सिंह अमर उजला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 15 Feb 2024 11:48 AM IST
सार

ज्ञानवापी स्थित व्यास जी तहखाने में पूजा को लेकर चल रहे विवाद में सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित कर लिया है।

विज्ञापन
Gyanvapi case: Judgment reserved on the petition challenging puja in Vyas basement
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वाराणसी स्थित ज्ञानवापी परिसर स्थित व्यास तहखाने में काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट को पूजा की अनुमति देने के जिला जज के आदेश की वैधता की चुनौती अपीलों की सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित कर लिया है। न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने मसाजिद कमेटी की तरफ से जिला जज के दो आदेशों की चुनौती अपीलों की सुनवाई कर रहे थे।

विज्ञापन


मस्जिद पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता एसएफए नकवी व पुनीत गुप्ता ने तर्क दिया कि पूजा के अधिकार की मांग में दाखिल सिविल वाद में अधिकार तय किए बगैर अंतरिम आदेश से फाइनल रिलीफ देना कानूनी प्रक्रिया का उल्लघंन है। तहखाने में पूजा की अनुमति देकर वस्तुत: सिविल वाद स्वीकार कर लिया है। साथ ही जिला जज ने स्वयं ही दो विरोधाभाषी आदेश दिए हैं।
विज्ञापन


यह भी कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 152 के अंतर्निहित अधिकार का प्रयोग करते हुए अदालत मूल आदेश की प्रकृति में बदलाव का आदेश नहीं दे सकती। मूल आदेश में केवल एक मांग मानी गई। जिलाधिकारी को रिसीवर नियुक्त कर दिया गया। बिना किसी अर्जी के केवल मौखिक अनुरोध पर पूजा का अधिकार दे दिया गया। अदालत ने अपनी अंतर्निहित शक्ति का इस्तेमाल करने का आदेश में उल्लेख नहीं किया है। कहा जिला अदालत ने 17 जनवरी को अर्जी स्वीकार कर केवल एक रिलीफ ही दी। दूसरी मांग पर आदेश नहीं देना ही अनुतोष से इंकार माना जाएगा।

विज्ञापन
विज्ञापन

मस्जिद पक्ष ने कहा- जिला जज ने दिया है विरोधाभासी आदेश
 

 

मस्जिद पक्ष के अधिवक्ता ने कहा कि 17 जनवरी 24 के मूल आदेश से जिला जज ने विवादित भवन की सुरक्षा व देखरेख करने व किसी प्रकार का बदलाव न होने देने का भी निर्देश दिया है और 31 जनवरी 24 के आदेश से बैरिकेडिंग काट कर तहखाने में पूजा के लिए दरवाजा बनाने तथा ट्रस्ट को पुजारी के जरिए तहखाने में स्थित देवी देवताओं की पूजा करने की अनुमति देकर अपने ही आदेश का विरोधाभासी आदेश दिया है।


इसके अलावा डीएम को रिसीवर नहीं नियुक्त किया जा सकता है। क्योंकि, डीएम काशी विश्वनाथ ट्रस्ट के पदाधिकारी हैं। रेवेन्यू के सर्वेसर्वा हैं। कानून व्यवस्था भी उन्हें देखना है। इसके साथ ही वह इस केस में प्रतिवादी हैं। यह भी कहा कि तहखाने पर किसका अधिकार है। यह साक्ष्यों के बाद सिविल वाद के निर्णय से तय होगा।जिला जज ने अंतरिम आदेश से फाइनल रिलीफ देकर गलती की है। इसलिए जिला जज के आदेश रद किए जाय।

मंदिर पक्ष ने कहा - अदालत ने कोई नया अधिकार नहीं दिया है

मंदिर पक्ष के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, हरिशंकर जैन और काशी विश्वनाथ ट्रस्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन, विनीत संकल्प ने भी पक्ष रखा। इनका कहना था कि अदालत को धारा 151 व 152 के अंतर्गत न्याय हित में आदेश देने का अंतर्निहित अधिकार है। वादी अधिवक्ता के संज्ञान में लाने के बाद अदालत ने छूटी हुई प्रार्थना स्वीकार की है। वादी के बजाय अदालत ने ट्रस्ट को पुजारी के जरिए पूजा का अधिकार बहाल किया है। वादी व्यास जी के तहखाने में वर्षों से पूजा अर्चना करता आ रहा है। 1993 में श्रीराम जन्मभूमि विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद ज्ञानवापी की लोहे की बाड़ से बैरिकेडिंग करने के कारण तहखाने में पूजा करने से बिना किसी आदेश के रोक लगा दी गई। अदालत ने कोई नया अधिकार नहीं दिया है।

कहा कि जिला जज ने अर्जी की तीन बार सुनवाई की तिथि तय की किंतु मस्जिद पक्ष की तरफ से कोई आपत्ति नहीं की गई। दोनों पक्षों को सुनकर जिला जज ने 31 जनवरी का दूसरा आदेश जारी किया है जो 17 जनवरी के मूल आदेश का ही हिस्सा है। अदालत के गलती दुरूस्त करने व छूटे आदेश को पारित करने का पूरा अधिकार है। आदेश कानूनी प्रक्रिया के तहत पारित किया गया है। दीन मोहम्मद केस में कोर्ट ने व्यास जी के तहखाने का जिक्र किया है।

डीएम को रिसीवर नियुक्त करना गलत नहीं

 

जितेंद्र व्यास के पूजा करने को स्वीकार किया गया है। इसलिए अपीलें बलहीन होने के नाते खारिज की जाय। प्रदेश सरकार की तरफ से महाधिवक्ता अजय कुमार मिश्र, मुख्य स्थाई अधिवक्ता कुणाल रवि व हरे राम त्रिपाठी ने पक्ष रखा। महाधिवक्ता का कहना था कि कानून व्यवस्था कायम रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। अदालत के आदेश पर अमल कराना सरकार का दायित्व है। कोर्ट के समय-समय पर दिए गए आदेशों के अनुसार डीएम अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं। उन्हें रिसीवर नियुक्त करना गलत नहीं है।


सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने लगभग 40 मिनट तक तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि ज्ञानवापी के दाहिने हिस्से में तहखाना स्थित है, जहां हिंदू वर्ष 1993 तक पूजा कर रहे थे। सीपीसी के आदेश 40 नियम एक तहत वाराणसी कोर्ट ने डीएम को रिसीवर नियुक्त किया है। पूजा का आदेश किसी तरह से मुस्लिमों के अधिकारों को प्रभावित नहीं करता है क्योंकि मुसलमान कभी तहखाने में नमाज नहीं पढ़ता था।

नकवी ने पं चंद्रनाथ व्यास के वसीयत का हवाला दिया। कहा कि इस दस्तावेज में संपत्ति का कुछ विवरण दिया गया है लेकिन सब कुछ नहीं है। उन्होंने शैलेंद्र कुमार पाठक, जितेंद्र कुमार पाठक और काशी विश्वनाथ ट्रस्ट द्वारा निष्पादित दस्तावेज पेश किया। हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि डीएम ने सिर्फ इसी मामले में कोर्ट के आदेश का पालन नहीं कराया बल्कि नमाज के दौरान मस्जिद परिसर में वजू का इंतजाम भी कराया था। उस वक्त मुस्लिम पक्ष ने कोई आपत्ति नहीं की थी।
 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed