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पांच मनीषियों को ‘मीरा स्मृति सम्मान’
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Mon, 30 Oct 2017 01:24 AM IST
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इलाहाबाद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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मीरा फाउंडेशन एवं साहित्य भंडार की ओर से रविवार को साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए पांच मनीषियों को ‘मीरा स्मृति सम्मान’ से नवाजा गया। इसमें राजी सेठ, प्रोफेसर नित्यानंद तिवारी, नीलकांत, दामोदर दत्त दीक्षित और प्रोफेसर अशोक कालिया शामिल हैं। सभी मनीषियों को शाल ओढ़ाने के बाद प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। राजी सेठ नहीं आ सकीं।
बतौर मुख्य अतिथि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर रतनलाल हांगलू ने कहा, मौजूदा दौर में हम सच का साथ नहीं दे रहे। डर-डर कर जीने के साथ ही अपनी संस्कृति से भी दूर होते जा रहे हैं। शिक्षकों सहित तमाम पढ़े-लिखे लोग अपनी जिम्मेदारियों से विमुख हैं। राष्ट्रनिर्माण में बुद्धिजीवियों की अहम भूमिका है। ऐसे में मौजूदा दौर में उनकी चुनौतियां बढ़ गई हैं। जागरूक एवं संवेदनशील होना जरूरी है।
जानीमानी कथा लेखिका ममता कालिया ने कहा, जीवनमूल्यों को बचाए रखने सहित साहित्य में समाज की चिंताएं साझा होनी चाहिए। हमें अपनी रचनाशैली, शिल्प को तोड़कर लगातार प्रयोग करते रहना चाहिए, तभी नवीनता रहेगी। अपने को निरंतर खोजते, खारिज करते रहना जरूरी है। कथाकार कालिया ऐसा नियमित रूप से करते थे। सुखद है कि नवलेखन में ऐसे प्रयोग खूब हो रहे हैं। जहां तक इलाहाबाद की बात है तो यहां के स्पर्श से ही कोई रचनाकार बन जाता है।
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वरिष्ठ साहित्यकार विजय बहादुर सिंह ने कहा, लेखक का शील उसकी कलम और अनुभवों की धार है। अनुभवों से वह शब्दों की प्राणप्रतिष्ठा करता है। प्रोफेसर राजेंद्र कुमार ने कहा, रचनाकार का काम पाठक को उम्मीद के रास्ते पर ले जाना है। रचनाकर्म के जरिए चारों पुरुषार्थो की प्राप्ति होनी चाहिए।
सांस्कृतिक केंद्र प्रेक्षागृह में हुए कार्यक्रम में रचनाकारों का परिचय देते हुए संचालन प्रोफेसर विजय अग्रवाल, स्वागत डॉ.एसके पांडेय और धन्यवाद ज्ञापन डॉ.आनंद कुमार श्रीवास्तव ने किया। आरंभ में कृतिका अग्रवाल ने नृत्य के माध्यम से गणेश वंदना प्रस्तुत की। कार्यक्रम में सतीश चंद्र अग्रवाल, विभोर अग्रवाल सहित अग्रवाल परिवार के सभी सदस्यों के अतिरिक्त अनेक रचनाकार, बुद्धिजीवी, साहित्यप्रेमी मौजूद थे।
दुनिया की द्वंद्वात्मक स्थितियां हमें भी प्रभावित कर रही हैं। उदारीकरण, धुव्रीकरण, निजीकरण ने हमारी चेतना पर कुठाराघात किया है। साहित्य संकट के दौर से गुजर रहा है। हम रोज नए-नए सिम तो खरीदते हैं लेकिन किताबें नहीं।
0 नीलकांत
फाउंडेशन की पहल सराहनीय है। लिखना और लिखते रहना मेरे लिए दुरुह कार्य जैसा है।
0 दामोदर दत्त दीक्षित
000
इलाहाबाद की साहित्यिक परंपरा को संरक्षित करने का काम मीरा फाउंडेशन ने किया है।
0 प्रोफेसर अशोक कालिया
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मौजूदा दौर ‘न्यू नार्मल’ से संघर्ष का है। इसमें अभिव्यक्ति के खतरे बढ़े हैं, जो ऐसा कर सकेगा, उसी के पास विवेक, शील होगा।
0 प्रोफेसर नित्यानंद तिवारी
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बतौर मुख्य अतिथि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर रतनलाल हांगलू ने कहा, मौजूदा दौर में हम सच का साथ नहीं दे रहे। डर-डर कर जीने के साथ ही अपनी संस्कृति से भी दूर होते जा रहे हैं। शिक्षकों सहित तमाम पढ़े-लिखे लोग अपनी जिम्मेदारियों से विमुख हैं। राष्ट्रनिर्माण में बुद्धिजीवियों की अहम भूमिका है। ऐसे में मौजूदा दौर में उनकी चुनौतियां बढ़ गई हैं। जागरूक एवं संवेदनशील होना जरूरी है।
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जानीमानी कथा लेखिका ममता कालिया ने कहा, जीवनमूल्यों को बचाए रखने सहित साहित्य में समाज की चिंताएं साझा होनी चाहिए। हमें अपनी रचनाशैली, शिल्प को तोड़कर लगातार प्रयोग करते रहना चाहिए, तभी नवीनता रहेगी। अपने को निरंतर खोजते, खारिज करते रहना जरूरी है। कथाकार कालिया ऐसा नियमित रूप से करते थे। सुखद है कि नवलेखन में ऐसे प्रयोग खूब हो रहे हैं। जहां तक इलाहाबाद की बात है तो यहां के स्पर्श से ही कोई रचनाकार बन जाता है।
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वरिष्ठ साहित्यकार विजय बहादुर सिंह ने कहा, लेखक का शील उसकी कलम और अनुभवों की धार है। अनुभवों से वह शब्दों की प्राणप्रतिष्ठा करता है। प्रोफेसर राजेंद्र कुमार ने कहा, रचनाकार का काम पाठक को उम्मीद के रास्ते पर ले जाना है। रचनाकर्म के जरिए चारों पुरुषार्थो की प्राप्ति होनी चाहिए।
सांस्कृतिक केंद्र प्रेक्षागृह में हुए कार्यक्रम में रचनाकारों का परिचय देते हुए संचालन प्रोफेसर विजय अग्रवाल, स्वागत डॉ.एसके पांडेय और धन्यवाद ज्ञापन डॉ.आनंद कुमार श्रीवास्तव ने किया। आरंभ में कृतिका अग्रवाल ने नृत्य के माध्यम से गणेश वंदना प्रस्तुत की। कार्यक्रम में सतीश चंद्र अग्रवाल, विभोर अग्रवाल सहित अग्रवाल परिवार के सभी सदस्यों के अतिरिक्त अनेक रचनाकार, बुद्धिजीवी, साहित्यप्रेमी मौजूद थे।
दुनिया की द्वंद्वात्मक स्थितियां हमें भी प्रभावित कर रही हैं। उदारीकरण, धुव्रीकरण, निजीकरण ने हमारी चेतना पर कुठाराघात किया है। साहित्य संकट के दौर से गुजर रहा है। हम रोज नए-नए सिम तो खरीदते हैं लेकिन किताबें नहीं।
0 नीलकांत
फाउंडेशन की पहल सराहनीय है। लिखना और लिखते रहना मेरे लिए दुरुह कार्य जैसा है।
0 दामोदर दत्त दीक्षित
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इलाहाबाद की साहित्यिक परंपरा को संरक्षित करने का काम मीरा फाउंडेशन ने किया है।
0 प्रोफेसर अशोक कालिया
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मौजूदा दौर ‘न्यू नार्मल’ से संघर्ष का है। इसमें अभिव्यक्ति के खतरे बढ़े हैं, जो ऐसा कर सकेगा, उसी के पास विवेक, शील होगा।
0 प्रोफेसर नित्यानंद तिवारी