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High Court : धोखाधड़ी से पाई गई नियुक्ति को लंबे समय की सेवा भी वैध नहीं बना सकती, शिक्षिका को नहीं मिली राहत
Sat, 04 Apr 2026 06:02 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Sat, 04 Apr 2026 06:02 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने जालसाजी या धोखाधड़ी से सार्वजनिक रोजगार प्राप्त किया है तो दशकों तक की उसकी सेवा भी नियुक्ति को वैधता प्रदान नहीं कर सकती।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने जालसाजी या धोखाधड़ी से सार्वजनिक रोजगार प्राप्त किया है तो दशकों तक की उसकी सेवा भी नियुक्ति को वैधता प्रदान नहीं कर सकती। धोखाधड़ी और न्याय कभी एक साथ नहीं रह सकते और जालसाजी पर टिकी कोई भी नींव कानून की नजर में शुरुआत से ही शून्य मानी जाती है। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की पीठ ने मेरठ की शिक्षिका वीणा मेनन की याचिका खारिज करते हुए दिया है।
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याची की नियुक्ति वर्ष 1989 में मेरठ के एक स्कूल में सहायक शिक्षक के पद पर हुई थी। विवाद तब शुरू हुआ जब मानव संपदा पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड करने की प्रक्रिया के दौरान याची ने वर्ष 1984 की अपनी हाईस्कूल की मूल मार्कशीट और प्रमाणपत्र जारी करने के लिए आवेदन किया, जो लंबे समय से फर्जी टीसी के आधार पर बोर्ड ने रोके गए रिजल्ट की श्रेणी में डाल दिया था।
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बीएसए के आदेश को कोर्ट ने ठहराया सही
जांच में यह तथ्य सामने आया कि याची ने हाईस्कूल परीक्षा में बैठने के लिए कक्षा-आठ का जो स्थानांतरण प्रमाणपत्र (टीसी) लगाया था, वह फर्जी था। इस आधार पर याची की नियुक्ति को अवैध घोषित करते हुए वेतन रोक दिया गया। याची ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची अधिवक्ता ने दलील दी कि शिक्षिका ने 35 वर्षों तक बिना किसी विवाद के सेवा दी है। उसकी नियुक्ति के समय दस्तावेज के सत्यापन में अधिकारियों ने चूक की है। ऐसे में अधिकारियों की चूक के लिए उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
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कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि जब नियुक्ति का आधार ही धोखाधड़ी हो तो सेवा की अवधि का कोई महत्व नहीं रह जाता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिकारियों की ओर से सत्यापन में हुई कथित देरी या चूक का लाभ उठाकर जालसाजी को जायज नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से याची का वेतन रोकने और उसके दस्तावेजों को रद्द करने की कार्यवाही को पूरी तरह वैध करार दिया।