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‘हंड्रेड नॉट आउट’ हो डटे रहें दूधनाथ
अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद।
Updated Tue, 18 Oct 2016 01:26 AM IST
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दूधनाथ सिंह
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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कवि, कथाकार, आलोचक और अध्यापक दूधनाथ सिंह सोमवार को अस्सी बरस के हुए। उनके शिष्यों की ओर से ही हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित ‘अस्सी के दूधनाथ’ कार्यक्रम के पहले सत्र में जहां शिष्यों ने बतौर गुरु उनकी स्मृतियां सहेजीं, वहीं दूसरे सत्र में उनके रचनाकर्म की पड़ताल की गई।
अस्सी के दूधनाथ को शुभकामनाएं देने आए ‘काशी का अस्सी’ के रचनाकार प्रोफेसर काशीनाथ सिंह ने कहा, दूधनाथ सिर्फ अस्सी बरस के ही नहीं हुए बल्कि उन्होंने यह वक्त उपलब्धियों के साथ पूरा किया। तमाम मुसीबतों को शिकस्त देते हुए बिना किसी गिला शिकवा वह ईमानदारी से अपना काम करते रहे। झूठा सच और तमस के बाद हिंदी उपन्यास के क्षेत्र में उनका उपन्यास आखिरी कलाम सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वह साठोत्तरी के अकेले ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने तकरीबन सभी विधाओं में काम किया और योग्य शिष्यों की कई-कई पीढ़ियां तैयार कीं। वह मुकम्मल रचनाकार हैं।
वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव ने उन्हें जोखिम का लेखक बताया। कहा, उन्होंने जीवन, विचार और रचनाकर्म हर जगह जोखिम लिए। वह साठोत्तरी के अकेले ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने अपनी की थीम का बार-बार अतिक्रमण किया। विचार, भाषा, लय, प्रस्तुति के साथ उनका लेेखन विस्मय पैदा करता है। आलोचना की भाषा में भी गजब की रचनात्मकता है। चाहे ‘माई का शोकगीत’ हो या धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे या फिर आखिरी कलाम, हर जगह सार्थक वैचारिक हस्तक्षेप है। वह शतायु हों और उनकी रचनात्मकता बनी रहे।
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कथाकार और संपादक अखिलेश ने कहा, दूधनाथ जी ने अपने शिष्यों के साथ लोकतांत्रिक और बराबरी का रिश्ता रखा। लोग गुरुओं पर लिखते हैं, उन्होंने शिष्यों पर लिखा। उन्होंने आलोचना का अर्थ बताया। वरिष्ठ कवि अनिल कुमार सिंह ने कहा, कक्षा के बाहर दूधनाथ जी के गुरुकुल में जीवन के अनेक अनुभव सीखे। वह कई बार कोई आदर्श उत्तर न देकर धूसर में लाकर छोड़ देते थे, इस उद्देश्य से कि जीवन का सफर खुद तय करो।
वरिष्ठ आलोचक प्रो.एए फातमी ने कहा, उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी साहित्य साधना बेमिसाल है। उर्दू केप्रति भी उनकेमन में ललक है। कामना है कि वह उम्र की सेंचुरी पूरी करें, भले रन न बनाएं लेकिन आउट न हों। प्रोफेसर सदानंद शाही ने उन्हें आनंदभाव का लेखक बताया। उनका मानना है कि लिखने से जीना संभव हुआ। लिखने से हम मनुष्य और मुक्त हुए। उनके मन में कभी कोई कटुता नहीं रही।
संचालक सुधीर सिंह ने कहा, इलाहाबाद पहुंचकर उनसे मिलने में तकरीबन तीन बरस लग गए लेकिन उन्होंने जीने की राह सिखाई। विवेक निराला ने कहा, वह तिलिस्मी गुरु हैं लेकिन हमने उनके मन को खोलने की कुंजी पा ली है। उनसे साहित्य की समझ सीखी। बांदा से आए उमाशंकर ने कहा, दूधनाथ जी का मूल्यांकन जरूरी है। विभु प्रकाश ने भी उन्हें नमन किया। डॉ.बालकृष्ण पांडेय ने कहा, दूधनाथ जी साबित करते हैं कि सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता है। छात्रनेता रामाधीन सिंह और कमलकृष्ण राय ने कहा कि वह हर संघर्ष में साथ खड़े दिखे।
अंत में कथाकार दूधनाथ सिंह ने ‘आखिरी कलाम’ की रचनाप्रक्रिया से परिचित कराया। कहा, वर्ष 2016 में सरयू स्वच्छ है, लेकिन अयोध्या गंदी हो गई है। अयोध्या को एक सामान्य शहर की तरह माना जाए और उसकी साफ सफाई की जाए। साधु महात्मा की जगह हमें आम इंसान को बड़ा मानना चाहिए जो रोजी रोटी कमाता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो.सत्यप्रकाश मिश्र की पत्नी चिंतन मिश्र, संचालन सुधीर सिंह और धन्यवाद ज्ञापन रामप्यारे राय ने किया।
अस्सी बरस पूरे होने पर कथाकार दूधनाथ सिंह के शिष्यों, शुभेच्छुओं और हिन्दी-उर्दू के नए-पुराने हस्ताक्षरों ने पुष्पगुच्छ देकर और मालाएं पहनाकर उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। साथ ही शतायु होने की कामना भी की। हिन्दुस्तानी एकेडेमी की ओर से कोषाध्यक्ष रविनंदन सिंह ने शाल ओढ़ाकर स्मृति चिह्न प्रदान किया। कार्यक्रम में परिजनों अजय, अनुपमा, अनिमेष के अतिरिक्त प्रो.अनीता गोपेश, प्रो.हेरंब चतुर्वेदी, असरार गांधी, अनिलरंजन भौमिक, हरिश्चन्द्र द्विवेदी, अविनाश मिश्र, नरेंद्र पुंडरीक, शहनवाज, हीरालाल, विकास स्वरूप, दिनेश ग्रोवर, रमेश ग्रोवर, तुषार, श्लेष गौतम, हीरालाल आदि मौजूद थे।
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अस्सी के दूधनाथ को शुभकामनाएं देने आए ‘काशी का अस्सी’ के रचनाकार प्रोफेसर काशीनाथ सिंह ने कहा, दूधनाथ सिर्फ अस्सी बरस के ही नहीं हुए बल्कि उन्होंने यह वक्त उपलब्धियों के साथ पूरा किया। तमाम मुसीबतों को शिकस्त देते हुए बिना किसी गिला शिकवा वह ईमानदारी से अपना काम करते रहे। झूठा सच और तमस के बाद हिंदी उपन्यास के क्षेत्र में उनका उपन्यास आखिरी कलाम सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वह साठोत्तरी के अकेले ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने तकरीबन सभी विधाओं में काम किया और योग्य शिष्यों की कई-कई पीढ़ियां तैयार कीं। वह मुकम्मल रचनाकार हैं।
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वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव ने उन्हें जोखिम का लेखक बताया। कहा, उन्होंने जीवन, विचार और रचनाकर्म हर जगह जोखिम लिए। वह साठोत्तरी के अकेले ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने अपनी की थीम का बार-बार अतिक्रमण किया। विचार, भाषा, लय, प्रस्तुति के साथ उनका लेेखन विस्मय पैदा करता है। आलोचना की भाषा में भी गजब की रचनात्मकता है। चाहे ‘माई का शोकगीत’ हो या धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे या फिर आखिरी कलाम, हर जगह सार्थक वैचारिक हस्तक्षेप है। वह शतायु हों और उनकी रचनात्मकता बनी रहे।
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कथाकार और संपादक अखिलेश ने कहा, दूधनाथ जी ने अपने शिष्यों के साथ लोकतांत्रिक और बराबरी का रिश्ता रखा। लोग गुरुओं पर लिखते हैं, उन्होंने शिष्यों पर लिखा। उन्होंने आलोचना का अर्थ बताया। वरिष्ठ कवि अनिल कुमार सिंह ने कहा, कक्षा के बाहर दूधनाथ जी के गुरुकुल में जीवन के अनेक अनुभव सीखे। वह कई बार कोई आदर्श उत्तर न देकर धूसर में लाकर छोड़ देते थे, इस उद्देश्य से कि जीवन का सफर खुद तय करो।
वरिष्ठ आलोचक प्रो.एए फातमी ने कहा, उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी साहित्य साधना बेमिसाल है। उर्दू केप्रति भी उनकेमन में ललक है। कामना है कि वह उम्र की सेंचुरी पूरी करें, भले रन न बनाएं लेकिन आउट न हों। प्रोफेसर सदानंद शाही ने उन्हें आनंदभाव का लेखक बताया। उनका मानना है कि लिखने से जीना संभव हुआ। लिखने से हम मनुष्य और मुक्त हुए। उनके मन में कभी कोई कटुता नहीं रही।
संचालक सुधीर सिंह ने कहा, इलाहाबाद पहुंचकर उनसे मिलने में तकरीबन तीन बरस लग गए लेकिन उन्होंने जीने की राह सिखाई। विवेक निराला ने कहा, वह तिलिस्मी गुरु हैं लेकिन हमने उनके मन को खोलने की कुंजी पा ली है। उनसे साहित्य की समझ सीखी। बांदा से आए उमाशंकर ने कहा, दूधनाथ जी का मूल्यांकन जरूरी है। विभु प्रकाश ने भी उन्हें नमन किया। डॉ.बालकृष्ण पांडेय ने कहा, दूधनाथ जी साबित करते हैं कि सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता है। छात्रनेता रामाधीन सिंह और कमलकृष्ण राय ने कहा कि वह हर संघर्ष में साथ खड़े दिखे।
अंत में कथाकार दूधनाथ सिंह ने ‘आखिरी कलाम’ की रचनाप्रक्रिया से परिचित कराया। कहा, वर्ष 2016 में सरयू स्वच्छ है, लेकिन अयोध्या गंदी हो गई है। अयोध्या को एक सामान्य शहर की तरह माना जाए और उसकी साफ सफाई की जाए। साधु महात्मा की जगह हमें आम इंसान को बड़ा मानना चाहिए जो रोजी रोटी कमाता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो.सत्यप्रकाश मिश्र की पत्नी चिंतन मिश्र, संचालन सुधीर सिंह और धन्यवाद ज्ञापन रामप्यारे राय ने किया।
अस्सी बरस पूरे होने पर कथाकार दूधनाथ सिंह के शिष्यों, शुभेच्छुओं और हिन्दी-उर्दू के नए-पुराने हस्ताक्षरों ने पुष्पगुच्छ देकर और मालाएं पहनाकर उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। साथ ही शतायु होने की कामना भी की। हिन्दुस्तानी एकेडेमी की ओर से कोषाध्यक्ष रविनंदन सिंह ने शाल ओढ़ाकर स्मृति चिह्न प्रदान किया। कार्यक्रम में परिजनों अजय, अनुपमा, अनिमेष के अतिरिक्त प्रो.अनीता गोपेश, प्रो.हेरंब चतुर्वेदी, असरार गांधी, अनिलरंजन भौमिक, हरिश्चन्द्र द्विवेदी, अविनाश मिश्र, नरेंद्र पुंडरीक, शहनवाज, हीरालाल, विकास स्वरूप, दिनेश ग्रोवर, रमेश ग्रोवर, तुषार, श्लेष गौतम, हीरालाल आदि मौजूद थे।