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परिचर्चा : जिस स्कूल मे हिजाब पहनकर लड़कियां नहीं जा सकतीं, वहां स्रस्वती पूजा कैसे

Sat, 02 Apr 2022 12:22 AM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Sat, 02 Apr 2022 12:22 AM IST
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Discussion: How can women worship in a school where girls can't wear hijab?
जिस स्कूल में लड़कियां हिजाब नहीं पहन सकतीं, वहां सरस्वती पूजा कैसे: प्रो. अपूर्वानंद
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प्रयागराज। संस्कृति के क्षेत्र में संघर्ष बढ़ने लगा है। विचारों के कारण हत्याएं होने लगी हैं। कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्याएं वैचारिक प्रतिरोध का ही परिणाम रही हैं। यह दौर दिमाग पर कब्जे की लड़ाई का है। यह लड़ाई सत्ता की लड़ाई से अधिक मजबूत है। सोचने वाली बात है कि जिस स्कूल में लड़कियां हिजाब पहनकर नहीं जा सकतीं, वहां सरस्वती पूजा कैसे हो सकती है। लेकिन, इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि हिजाब धर्म का हिस्सा है और सरस्वती पूजा संस्कृति का। ऐसे में बदले दौर की चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रतिबद्धता के साथ खड़े होने की जरूरत है। यह बातें अली जावेद की स्मृति में आयोजित संस्कृति की राजनीति और चुनौतियां विषयक परिचर्चा में कही गई।
प्रगतिवादी लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जसम के संयुक्त तत्वावधान में यह परिचर्चा म्योहाल स्पोर्ट्स कांप्लेक्स से लगे सप्रू हॉल में अंजुमन रूह-ए-अदब की ओर से आयोजित थी। दिल्ली विश्वविद्यालय से आए प्रो. अपूर्वानंद का कहना था कि इस दौर में हिंदू सिर्फ संस्कृति है और इस्लाम धर्म है। उन्होंने इसका उदाहरण कर्नाटक केस्कूल में हिजाब विवाद के रूप में दिया। उनका कहना था कि हिजाब पहनकर स्कूल जाने पर वहां कुछ अधिकारियों ने यह कहते हुए रोक लगा दी कि यह धर्म का हिस्सा है। इसके पीछे दलील दी गई कि यह इस्लाम से जुड़ा है। इस्लाम का यह जरूरी हिस्सा नहीं है। जबकि, हिजाब संस्कृति है।
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संभव है कि इस संस्कृति का पालन करने वाले समाज की महिलाएं अगर हिजाब न लगाएं तो वह अपने आप को बेआबरू समझें। यह सच है कि स्कूल धार्मिक जगह नहीं है। लेकिन सवाल उठता है कि अगर हिजाब नहीं तो फिर उसी स्कूल में सरस्वती पूजा कैसे हो सकती है। इस पर कहा जा रहा है कि सरस्वती पूजा संस्कृति है। यानी किसी के पास संस्कृति और किसी के पास सिर्फ धर्म है। उन्होंने बताया कि जब उनका जनेऊ संस्कार हुआ था, जब उनके कान में मंत्र दिया गया। साथ ही यह भी बताया गया कि इस मंत्र को स्त्री और शूद्र के सामने मत पढ़ना। तब से उन्होंने ऐसे किसी आयोजन में जाना तक बंद कर दिया। उन्होंने कहा कि जाप या कीर्तन करने से संस्कृति नहीं होती।
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संस्कृति में सबकुछ मिला होता है। संस्कृति का स्वर अपना होना चाहिए। इनसे पहले लखनऊ से आए रमेश दीक्षित ने कहा कि जिन सामाजिक विसंगतियों, पीड़ाओं की चुनौतियों का सामना करते हुए हमने मूल्यों, प्रतिबद्धताओं की पूरी ताकत लगा दी, वहां भी अंत में हम चूक गए। हमने एक बार फिर उन्हीं हाथों में सत्ता सौंप दी। सत्ता में बदलाव करना है तो लोकतंत्रात्मक शक्तियों को एक मंच पर आना होगा। जातियों में बंटकर हम बदलाव नहीं ला सकते। इससे पहले विषय प्रवर्तन प्रो प्रणय कृष्ण ने किया। अध्यक्षता प्रो राजेंद्र कुमार ने की। संचालन केके पांडेय ने और धन्यवाद ज्ञापन हरिश्चंद्र पांडेय ने किया।अतिथियों का स्वागत संध्या नवोदिता ने किया।

प्रयागराज एक्सप्रेस पर सवार होकर पहुंचा इलाहाबाद
प्रयागराज। प्रो. अपूर्वानंद ने कहा कि हर बार मैं दिल्ली से इलाहाबाद आने वाली गाड़ी में सवार होता था, लेकिन पहली बार ऐसा नहीं हुआ। जब में दिल्ली में प्रयागराज एक्सप्रेस में सवार हुआ तो मुझे लगा कि अब किस इलाहाबाद जाऊंगा। इसलिए कि अब न अली जावेद हैं और न इलाहाबाद। लेकिन फिर भी मैं प्रयागराज एक्सप्रेस में सवार होकर इलाहाबाद ही पहुंचा। उन्होंने कहा कि कैसे इलाहाबाद प्रयागराज और गुड़गांव गुरुग्राम हो जाता है, यह भी विचार किया जाना चाहिए।
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