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फूलपुर में चेले ने दी अपने गुरु कांशीराम चुनावी पटखनी
Sun, 17 Mar 2019 01:03 AM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Sun, 17 Mar 2019 01:03 AM IST
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कांशीराम
- फोटो : SELF
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संगमनगरी की चुनावी भूमि कई मायनों में अनूठी रही है। फूलपुर में 1996 में हुए लोकसभा चुनाव में गुुरु-चेला के बीच सीधा मुकाबला हुआ। इस चुनाव में चेले ने गुरु को बड़ी पटखनी दी। 1996 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम चुनावी मैदान में उतरे, उनके सामने बसपा के संस्थापक सदस्य रहे जंग बहादुर पटेल समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरे। जंग बहादुर पटेल ने इस चुनाव में कांशीराम को 16 हजार से अधिक मतों से पराजित किया।
बीएसपी से बाहर किए जाने की टीस मन में लिए जंग बहादुर ने 1996 के लोकसभा चुनाव में अपने गुरु को बड़ी पटखनी दी थी। इस चुनाव के बाद ही फूलपुर लोकसभा सीट समाजवादी पार्टी के गढ़ के रूप में उभरी। साथ ही समाजवादी पार्टी लगातार चार चुनाव फूलपुर लोकसभा से जीतती रही। जंग बहादुर पटेल फूलपुर से दो बार सांसद चुने गए। 1996 का लोकसभा इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इस चुनाव में फूलपुर से दो पूर्व सांसद भी चुनावी मैदान में थे। चुनाव में उस समय के निवर्तमान सांसद राम पूजन पटेल कांग्रेस के टिकट पर और पूर्व सांसद प्रो. बीडी सिंह भाजपा प्रत्याशी के रूप में मैदान में थे। इस चुनाव में बीडी सिंह तीसरे और राम पूजन पटेल को चौथे स्थान पर रहकर संतोष करना पड़ा।
देश भर में बहुजन आंदोलन के उफान के समय कांशीराम के साथ जंग बहादुर पटेल ने कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। जंग बहादुर प्रदेश में बसपा के अध्यक्ष भी रह चुके थे। 1996 के आसपास बीएसपी की नंबर दो की नेता मायावती से मनमुटाव के चलते जंग बहादुर को बीएसपी से बाहर कर दिया गया। इसके बाद जंग बहादुर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। सपा ने उन्हें फूलपुर लोकसभा से बीएसपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कांशीराम के खिलाफ उतार दिया।
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1996 के चुनाव में जंग बहादुर पटेल को 162844 मत और कांशीराम को 146823 मत मिले। इससे पूर्व में भी कांशीराम इलाहाबाद संसदीय सीट से 1988 के उप चुनाव के भाग्य आजमा चुके थे। इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहते हुए कांशीराम को लगभग 70 हजार मत मिले थे। समाजशास्त्री एवं जबी पंत संस्थान के निदेशक प्रो. बद्री नारायण बहते हैं कि संस्थापक कांशीराम अपनी चुनावी रणनीति के तहत अपने कार्यकर्ताओं से कहते थे कि पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा मतदाताओं के निगाह में आने के लिए और तीसरा जीतने के लिए है। इसी सिद्धांत के तहत उन्होंने 1988 के उपचुनाव में कांग्रेस से विद्रोह करके और देश में जननायक की छवि लेकर चुनावी मैदान में उतरे वीपी सिंह को चुनौती दी।
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बीएसपी से बाहर किए जाने की टीस मन में लिए जंग बहादुर ने 1996 के लोकसभा चुनाव में अपने गुरु को बड़ी पटखनी दी थी। इस चुनाव के बाद ही फूलपुर लोकसभा सीट समाजवादी पार्टी के गढ़ के रूप में उभरी। साथ ही समाजवादी पार्टी लगातार चार चुनाव फूलपुर लोकसभा से जीतती रही। जंग बहादुर पटेल फूलपुर से दो बार सांसद चुने गए। 1996 का लोकसभा इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इस चुनाव में फूलपुर से दो पूर्व सांसद भी चुनावी मैदान में थे। चुनाव में उस समय के निवर्तमान सांसद राम पूजन पटेल कांग्रेस के टिकट पर और पूर्व सांसद प्रो. बीडी सिंह भाजपा प्रत्याशी के रूप में मैदान में थे। इस चुनाव में बीडी सिंह तीसरे और राम पूजन पटेल को चौथे स्थान पर रहकर संतोष करना पड़ा।
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देश भर में बहुजन आंदोलन के उफान के समय कांशीराम के साथ जंग बहादुर पटेल ने कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। जंग बहादुर प्रदेश में बसपा के अध्यक्ष भी रह चुके थे। 1996 के आसपास बीएसपी की नंबर दो की नेता मायावती से मनमुटाव के चलते जंग बहादुर को बीएसपी से बाहर कर दिया गया। इसके बाद जंग बहादुर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। सपा ने उन्हें फूलपुर लोकसभा से बीएसपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कांशीराम के खिलाफ उतार दिया।
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1996 के चुनाव में जंग बहादुर पटेल को 162844 मत और कांशीराम को 146823 मत मिले। इससे पूर्व में भी कांशीराम इलाहाबाद संसदीय सीट से 1988 के उप चुनाव के भाग्य आजमा चुके थे। इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहते हुए कांशीराम को लगभग 70 हजार मत मिले थे। समाजशास्त्री एवं जबी पंत संस्थान के निदेशक प्रो. बद्री नारायण बहते हैं कि संस्थापक कांशीराम अपनी चुनावी रणनीति के तहत अपने कार्यकर्ताओं से कहते थे कि पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा मतदाताओं के निगाह में आने के लिए और तीसरा जीतने के लिए है। इसी सिद्धांत के तहत उन्होंने 1988 के उपचुनाव में कांग्रेस से विद्रोह करके और देश में जननायक की छवि लेकर चुनावी मैदान में उतरे वीपी सिंह को चुनौती दी।