High Court : अभिभावक बनने के लिए अयोग्य साबित किए बिना पिता से बेटी की अभिरक्षा नहीं छीन सकते
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी की अभिरक्षा के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि पिता प्राकृतिक अभिभावक है और उसे अयोग्य साबित किए बिना बेटी की कस्टडी से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पिता को चार वर्षीय बच्ची की अभिरक्षा सौंपते हुए नाना पक्ष को मुलाकात का अधिकार भी दिया।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी की अभिरक्षा से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कहा है कि पिता प्राकृतिक अभिभावक है। जब तक उसे नाबालिग का अभिभावक बनने के लिए अयोग्य साबित नहीं किया जाता, तब तक उसे बेटी की अभिरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। अभिरक्षा के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण पहलू बच्चे का कल्याण है।
यह आदेश न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने प्रयागराज निवासी अभिषेक की अपील पर दिया है। बच्ची का जन्म 2022 में हुआ था। वह नवंबर 2023 तक पिता के साथ रही। इसके बाद मां के साथ मायके चली गई। बच्ची की मां की फरवरी 2024 में बीमारी के दौरान मौत हो गई। पिता ने बेटी की अभिरक्षा के लिए मुकदमा दाखिल किया था, जिसे ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दिया था। इस फैसले को याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि पिता के खिलाफ लगाए गए दहेज उत्पीड़न और मारपीट के आरोपों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य नहीं हैं। मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार बच्ची की मां की मौत एक गंभीर बीमार की वजह से हुई थी। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि उनकी बीमारी और मौत कथित सिर की चोट के कारण हुई थी।
कोर्ट ने चार वर्षीय बच्ची की अभिरक्षा के लिए पिता की ओर से दायर अपील स्वीकार कर ट्रायल कोर्ट के 31 मई 2025 के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने बच्ची की अभिरक्षा उसके पिता को सौंपने का आदेश दिया। साथ ही बच्ची के नाना पक्ष को जिला विधिक सेवा प्राधिकरण प्रयागराज में दोपहर दो से शाम पांच बजे तक मुलाकात का अधिकार दिया है।