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कुलपति की जिद बनी बवाल की वजह
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sat, 29 Apr 2017 02:46 AM IST
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इलाहाबाद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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हॉस्टलों में वॉश आउट की प्रस्तावित कार्रवाई के विरोध में छात्रों का आंदोलन कई दिनों पहले से चल रहा है। इससे पहले भी छात्रों ने दो बार वीसी दफ्तर का घेराव किया। रजिस्ट्रार के घर पर धावा बोल दिया और चीफ प्रॉक्टर से भी उनकी भिड़ंत हुई। आठ दिनों से छात्र क्रमिक अनशन पर बैठे हैं। इस दौरान छात्रों ने मौन जुलूस, कैंडल मार्च निकाला, अर्धनग्न होकर प्रदर्शन किया और इस पूरे आंदोलन के पीछे उनकी सिर्फ एक मांग है कि कुलपति उनसे मिलें।
इतना कुछ होने के बाद भी कुलपति और आंदोलनकारी छात्रों के बीच अब तक एक मुलाकात नहीं हो सकी है। शुक्रवार को भी छात्र इसी मांग के साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस के सामने धरने पर बैठे थे और कुलपति से मिलने की मांग पर अड़े हुए थे। छात्रों को कुलपति से नहीं मिलने दिया गया और उन्हें बलपूर्वक वहां से हटा दिया गया। हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन शुरू से ही कह रहा है कि आंदोलन करने वाले विश्वविद्यालय के छात्र नहीं हैं लेकिन शुक्रवार को जो कुछ हुआ, उससे हॉस्टल के वैध छात्र भी प्रभावित हुए। हालात पर काबू पाने के लिए हॉस्टलों में जब सुरक्षा बलों की लॉठियां चल रहीं थीं, उस वक्त वैध और अवैध के बीच फर्क कर पाना मुश्किल था।
हॉस्टल के जिन कमरों में बिस्तर, कूलर, बर्तन पलट दिए गए, वे कमरे किसी वैध छात्र के थे या अवैध छात्र के, यह भी सुरक्षा बलों को नहीं मालूम था। उन्हें तो किसी भी तरह से आगजनी, बमबाजी, पथराव पर काबू पाना था ताकि हिंसात्मक हो चुके आंदोलन से आम लोगों को बचाया जा सके। यह स्थिति शायद टल सकती थी, अगर माह भर पहले विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों के बीच एक सकारात्मक मुलाकात हो जाती। ऐसे में विश्वविद्यालय प्रशासन को बवाल के बाद वैध छात्रों से शांत रहने के लिए अपील न करनी पड़ती और न ही वैध छात्रों को इस आंदोलन की आग में जलना पड़ता।
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विश्वविद्यालय के हॉस्टलों में हुए बवाल के बाद छात्रों ने आरोप लगाया है कि कुलपति की तानाशाही ने पूरे विश्वविद्यालय को अराजकता और हिंसा में झोंक दिया है। शांतिपूर्ण क्रमिक अनशन और धरने पर बैठे छात्रों पर लाठीचार्ज कुलपति की संवेदनहीनता को दर्शाता है। छात्रसंघ अध्यक्ष रोहित मिश्र, उपाध्यक्ष अदील हमजा, पूर्व उपाध्यक्ष विक्रांत सिंह का आरोप है कि हॉस्टलों में घुसकर पुलिस ने जो कोहराम मचाया है, उसके लिए कुलपति की अक्षमता और अयोग्यता जिम्मेदार है। उन्हें अपना त्यागपत्र दे देना चाहिए। छात्रों ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को पत्र भेजकर कुलपति को बर्खास्त किए जाने की मांग की है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने छह मई को हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं के अभिभावकों की बैठक बुलाई थी। बैठक में खुद कुलपति को मौजूद रहना था कि अन्य मुद्दों के साथ वॉश आउट पर भी अभिभावकों से बात की जा सके लेकिन शुक्रवार को हुए बवाल के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन को अपना यह निर्णय वापस लेना पड़ा। चीफ प्रॉक्टर प्रो. रामसेवक दुबे ने बताया कि छह मई को प्रस्तावित बैठक निरस्त कर दी गई है।
विश्वविद्यालय में बवाल के दौरान कुछ शिक्षकों के वाहन फूंक दिए गए, वाहनों में तोड़फोड़ हुई, कर्मचारियों के वाहनों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया। चीफ प्रॉक्टर प्रो. राम सेवक दुबे का कहना है कि जिन शिक्षकों एवं कर्मचारियों को नुकसान हुआ है, वे शनिवार को सुबह 11 बजे तक इस बाबत उनके कार्यालय में जानकारी दर्ज करा दें लेकिन नुकसान की भरपाई के लिए आगे की कार्रवाई की जा सके।
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इतना कुछ होने के बाद भी कुलपति और आंदोलनकारी छात्रों के बीच अब तक एक मुलाकात नहीं हो सकी है। शुक्रवार को भी छात्र इसी मांग के साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस के सामने धरने पर बैठे थे और कुलपति से मिलने की मांग पर अड़े हुए थे। छात्रों को कुलपति से नहीं मिलने दिया गया और उन्हें बलपूर्वक वहां से हटा दिया गया। हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन शुरू से ही कह रहा है कि आंदोलन करने वाले विश्वविद्यालय के छात्र नहीं हैं लेकिन शुक्रवार को जो कुछ हुआ, उससे हॉस्टल के वैध छात्र भी प्रभावित हुए। हालात पर काबू पाने के लिए हॉस्टलों में जब सुरक्षा बलों की लॉठियां चल रहीं थीं, उस वक्त वैध और अवैध के बीच फर्क कर पाना मुश्किल था।
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हॉस्टल के जिन कमरों में बिस्तर, कूलर, बर्तन पलट दिए गए, वे कमरे किसी वैध छात्र के थे या अवैध छात्र के, यह भी सुरक्षा बलों को नहीं मालूम था। उन्हें तो किसी भी तरह से आगजनी, बमबाजी, पथराव पर काबू पाना था ताकि हिंसात्मक हो चुके आंदोलन से आम लोगों को बचाया जा सके। यह स्थिति शायद टल सकती थी, अगर माह भर पहले विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों के बीच एक सकारात्मक मुलाकात हो जाती। ऐसे में विश्वविद्यालय प्रशासन को बवाल के बाद वैध छात्रों से शांत रहने के लिए अपील न करनी पड़ती और न ही वैध छात्रों को इस आंदोलन की आग में जलना पड़ता।
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विश्वविद्यालय के हॉस्टलों में हुए बवाल के बाद छात्रों ने आरोप लगाया है कि कुलपति की तानाशाही ने पूरे विश्वविद्यालय को अराजकता और हिंसा में झोंक दिया है। शांतिपूर्ण क्रमिक अनशन और धरने पर बैठे छात्रों पर लाठीचार्ज कुलपति की संवेदनहीनता को दर्शाता है। छात्रसंघ अध्यक्ष रोहित मिश्र, उपाध्यक्ष अदील हमजा, पूर्व उपाध्यक्ष विक्रांत सिंह का आरोप है कि हॉस्टलों में घुसकर पुलिस ने जो कोहराम मचाया है, उसके लिए कुलपति की अक्षमता और अयोग्यता जिम्मेदार है। उन्हें अपना त्यागपत्र दे देना चाहिए। छात्रों ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को पत्र भेजकर कुलपति को बर्खास्त किए जाने की मांग की है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने छह मई को हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं के अभिभावकों की बैठक बुलाई थी। बैठक में खुद कुलपति को मौजूद रहना था कि अन्य मुद्दों के साथ वॉश आउट पर भी अभिभावकों से बात की जा सके लेकिन शुक्रवार को हुए बवाल के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन को अपना यह निर्णय वापस लेना पड़ा। चीफ प्रॉक्टर प्रो. रामसेवक दुबे ने बताया कि छह मई को प्रस्तावित बैठक निरस्त कर दी गई है।
विश्वविद्यालय में बवाल के दौरान कुछ शिक्षकों के वाहन फूंक दिए गए, वाहनों में तोड़फोड़ हुई, कर्मचारियों के वाहनों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया। चीफ प्रॉक्टर प्रो. राम सेवक दुबे का कहना है कि जिन शिक्षकों एवं कर्मचारियों को नुकसान हुआ है, वे शनिवार को सुबह 11 बजे तक इस बाबत उनके कार्यालय में जानकारी दर्ज करा दें लेकिन नुकसान की भरपाई के लिए आगे की कार्रवाई की जा सके।