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विडंबना : स्पॉट लाइट की जगह मोबाइल की रोशनी में रेस्क्यू

Tue, 11 Dec 2018 01:16 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज
अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज Updated Tue, 11 Dec 2018 01:16 AM IST
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Ironically, instead of spot light, rescue in mobile light
प्रयागराज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो,प्रयागराज
जनवरी में लगने जा रहे कुंभ मेले के नाम पर सरकार भले ही हजारों करोड़ रुपये पानी की तरह बहा रही हो, लेकिन सरकारी इंतजाम की सोमवार को कीडगंज स्थित मनकामेश्वर मंदिर के पीछे यमुना में हुए हादसे ने पोल खोलकर रख दी। बदइंतजामी का आलम यह था कि मोबाइल की रोशनी में बचाव कार्य किया गया। जाल न होने पर जल पुलिस तमाशबीन बनकर खड़ी रही। एंबुलेंस में स्ट्रेचर न होने से बचाए गए लोगों को कंधे पर रखकर ले जाना पड़ा।
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यमुना में नाव दुर्घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस कई घंटे बाद भी सर्च अथवा स्पॉट लाइट का इंतजाम नहीं कर सकी। वहां मौजूद लोगों के मोबाइल फोन के टार्च की रोशनी में रेस्क्यू के नाम पर पुलिस अधिकारी मौका मुआयना कर रहे थे। घुप्प अंधेरा होने से नदी में कोई भी हलचल नहीं पहचानी जा सकी, जबकि प्रकाश होने पर मामूली हलचल से किसी की जान बचाई जा सकती थी। पुलिस के पास राहत कार्य शुरू करने के भी कोई संसाधन नहीं थे। हादसे के करीब आधे-पौन घंटे बाद जल पुलिस मौके पर पहुंची लेकिन उसके पास भी जाल नहीं था। जल पुलिस की एक नाव घटना स्थल का एक चक्कर लगाकर करीब पंद्रह मिनट में वापस लौट आई। जल पुलिस के पास उस समय कोई गोताखोर भी नहीं थे। हादसे के बाद जो एंबुलेंस मौके पर पहुंची, उसमें स्ट्रेचर भी पर्याप्त नहीं थे। मौके पर मौजूद युवकों ने घायलों को कंधे पर रखकर किसी तरह ऊपर पहुंचाया।
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 इसके बाद करीब पौने आठ बजे एसएसपी नितिन तिवारी मौके पर पहुंचे। तब तक दुर्घटना के करीब सवा घंटे बीत चुके थे। एसएसपी भी जल पुलिस की नाव पर बैठकर थोड़ी दूर तक गए लेकिन कोई हलचल न देखकर वापस लौट आए। इसके बाद कुंभ एसएसपी केपी सिंह भी मौके पर पहुुंचे। उन्होंने महाजाल डलवाने को कहा, लेकिन महाजाल किसके पास है, यह किसी को नहीं पता था। एसएसपी ने कई बार पूछा लेकिन कोई महाजाल के बारे में नहीं बता सका। उनके लौटने के बाद जिलाधिकारी समेत अन्य प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे। एनडीआरएफ की टीम ने भी पहुंचकर रेस्क्यू अभियान में हिस्सा लिया।
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प्रत्यक्षदर्शी आलोक दुबे की दुर्घटना स्थल से कुछ दूर पर दुकान है। उसने बताया कि करीब साढ़े छह बजे चीख पुकार शुरू होते ही उन्होंने मदद के लिए डॉयल-100 और 108 नंबर को फोन किया लेकिन डॉयल 108 में करीब पंद्रह मिनट तक सिर्फ कॉल ट्रांसफर करने में ही लग गए। इसके बाद भी उसकी तरफ से कोई रिस्पांस नहीं आया। एक कोचिंग संस्थान में शिक्षक ने भी बताया कि उन्होंने घटना की सूचना पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों को देनी चाही, लेकिन कहीं भी फोन नहीं उठा। उसके बाद सीओ आलोक मिश्र को उन्होंने घटना के बारे में बताया।

नाव हादसे में बाल-बाल बचीं मीनाक्षी (38) पत्नी रोशन पटवार आपबीती सुनाते समय कांप रही थीं। उनके चेहरे पर हादसे से उत्पन्न सिहरन को आसानी से पढ़ा जा सकता था। मीनाक्षी ने बताया कि सभी लोग प्रयागराज आकर बेहद खुश थे। कर्मकांड पूरा करके वापस लौट रहे थे। अचानक से नाव दो मिनट के भीतर पलट गई। किसी को कुछ समझने का मौका नहीं मिला। नदी में गिरते ही उन लोगों ने मदद के लिए चीख पुकार शुरू कर दी लेकिन आसपास काफी अंधेरा होने से कोई भी मदद के लिए नजर नहीं आ रहा था। बाहर निकलने के बाद वह बार-बार परिवार के लोगोें के बारे में पूछ रही थीं। उनके साथ मनोहर की भी जान बच गई थी। बाकी लोगों की हालत खराब होने से उनको अस्पताल भेजा गया लेकिन यह दोनों सामान्य थे।   

नाव के रास्ते रोजाना हजारों लोग संगम स्नान के लिए पहुंचते हैं लेकिन इनकी निगरानी की कोई भी व्यवस्था अमल में नहीं आई जाती। गऊघाट और किलाघाट से कोई भी आदमी सूर्य अस्त होने के बाद भी नाव से नदी में जा सकता है। ठंड में अंधेरा जल्दी होने के बावजूद शाम सात बजे तक बड़ी संख्या में नाविक किलाघाट पर मौजूद रहते हैं। बड़ी नाव में बारह लोग से अधिक किसी कीमत में नहीं बिठाए जाने चाहिए, लेकिन नाविक 18 यात्रियों से कम कभी नहीं बिठाते। इसी तरह छोटी नाव में भी तयशुदा से अधिक तीर्थयात्रियों को बिठाया जाता है, इसकी भी कोई रोकटोक नहीं होती।   


नाव हादसे में दिगंबर (72) पुत्र रामराव वैश्य, बालाजी (40) पुत्र दिंगबर, देवीदास (55)पुत्र नारायण एवं भोजराज (70) अभी तक लापता हैं। उनकी तलाश में पुलिस जुटी हुई है, हालांकि अंधेरा होने की वजह से जाल नहीं डलवाया जा सका। सुबह भोर में इनकी तलाश फिर से शुरू की जाएगी।


पांच लोग अभी तक लापता हैं। उनकी तलाश के लिए अभियान चलाया जा रहा है। हादसे की सूचना उनके परिजनों को दे दी गई है।
नितिन तिवारी, एसएसपी प्रयागराज
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