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पारिवारिक विवादों के निस्तारण में तकनीकी पहलू पर जोर न दें अदालतें
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Court should focus on technical issues in hearing family dispute cases
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हाईकोर्ट ने कहा वादी की जरूरत का ध्यान में रख कर दें आदेश
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि परिवार न्यायालयों को सिविल कोर्ट की तरह तकनीकी औपचारिकताओं पर जोर देने की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। इसके बजाए परिवार न्यायालय का प्रयास आपसी सहमति और समझौते से विवाद को सुलझाने का होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर याची के पास आय का कोई साधन नहीं है और उसे स्थायी गुजारा भत्ता की सख्त जरूरत है तो ऐसे मामलों में कानून की तकनीकियों पर जाने के बजाए मामले को सौहार्दपूर्ण तरीके से निस्तारित करना चाहिए।
यह आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति विवेक वर्मा की खंडपीठ ने दीप्ति शर्मा की याचिका पर सुनवाई के बाद दिया। कोर्ट ने कहा हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता और रखरखाव का दावा करने में समय सीमा की बाधा नहीं है। इसका दावा कभी भी दावा किया जा सकता है। न्यायालय को यह देखने की आवश्यकता है कि गुजारा भत्ता या रखरखाव का दावा करने वाला व्यक्ति हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अधिनियम की धारा 25 (1) की आवश्यकता को पूरा करता है या नहीं। इसमें पारिवारिक न्यायालयों अधिनियम-1984 के प्रावधानों को भी देखने की जरूरत है, जो पारिवारिक मामलों से संबंधित विवादों के सुलह और समझौते को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किया गया है।
मामले में परिवार न्यायालय ने गुजारा भत्ता देने का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि याची ने वाद हेतु उत्पन्न होने संदर्भ नहीं दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ यह देखा जाना चाहिए कि याची के पास आय का कोई स्रोत नहीं है और उसे गुजारा भत्ता की जरूरत है। हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के निर्णय को रद्द करते हुए परिवार न्यायालय, आगरा को आदेश दिया कि वह मामले को तीन महीने में निस्तारित करें। याचिका के पक्षकारों को छह जनवरी को आगरा परिवार न्यायालय में उपस्थित होने को कहा।
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि परिवार न्यायालयों को सिविल कोर्ट की तरह तकनीकी औपचारिकताओं पर जोर देने की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। इसके बजाए परिवार न्यायालय का प्रयास आपसी सहमति और समझौते से विवाद को सुलझाने का होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर याची के पास आय का कोई साधन नहीं है और उसे स्थायी गुजारा भत्ता की सख्त जरूरत है तो ऐसे मामलों में कानून की तकनीकियों पर जाने के बजाए मामले को सौहार्दपूर्ण तरीके से निस्तारित करना चाहिए।
यह आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति विवेक वर्मा की खंडपीठ ने दीप्ति शर्मा की याचिका पर सुनवाई के बाद दिया। कोर्ट ने कहा हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता और रखरखाव का दावा करने में समय सीमा की बाधा नहीं है। इसका दावा कभी भी दावा किया जा सकता है। न्यायालय को यह देखने की आवश्यकता है कि गुजारा भत्ता या रखरखाव का दावा करने वाला व्यक्ति हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अधिनियम की धारा 25 (1) की आवश्यकता को पूरा करता है या नहीं। इसमें पारिवारिक न्यायालयों अधिनियम-1984 के प्रावधानों को भी देखने की जरूरत है, जो पारिवारिक मामलों से संबंधित विवादों के सुलह और समझौते को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किया गया है।
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मामले में परिवार न्यायालय ने गुजारा भत्ता देने का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि याची ने वाद हेतु उत्पन्न होने संदर्भ नहीं दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ यह देखा जाना चाहिए कि याची के पास आय का कोई स्रोत नहीं है और उसे गुजारा भत्ता की जरूरत है। हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के निर्णय को रद्द करते हुए परिवार न्यायालय, आगरा को आदेश दिया कि वह मामले को तीन महीने में निस्तारित करें। याचिका के पक्षकारों को छह जनवरी को आगरा परिवार न्यायालय में उपस्थित होने को कहा।
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