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High Court: घरेलू हिंसा की कार्यवाही के खिलाफ कोर्ट कर सकता है अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग, यह है पूरा मामला

Fri, 29 Nov 2024 11:44 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 29 Nov 2024 11:44 AM IST
सार

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की अदालत ने बुलंदशहर के देवेंद्र अग्रवाल व इसके साथ छह अन्य याचिकाओं की एक साथ सुनवाई करते हुए की है। अलीगढ़ के पंकज गर्ग, बरेली की नेहा गोयल, बरेली की शिल्पी शर्मा, आजमगढ़ के अरविंद गुप्ता, मुजफ्फरनगर के अनिल, बलिया की पूजा राय ने घरेलू हिंसा से जुड़ी कार्यवाही को लेकर याचिका दाखिल की है।

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Court can use inherent powers against domestic violence proceedings, this is the whole matter
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा की कार्यवाही के खिलाफ हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग कर सकता है। घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत किसी कार्यवाही को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत चुनौती दी जा सकती है।

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यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की अदालत ने बुलंदशहर के देवेंद्र अग्रवाल व इसके साथ छह अन्य याचिकाओं की एक साथ सुनवाई करते हुए की है। अलीगढ़ के पंकज गर्ग, बरेली की नेहा गोयल, बरेली की शिल्पी शर्मा, आजमगढ़ के अरविंद गुप्ता, मुजफ्फरनगर के अनिल, बलिया की पूजा राय ने घरेलू हिंसा से जुड़ी कार्यवाही को लेकर याचिका दाखिल की है।

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इन सभी याचिकाओं में सुमन मिश्रा के मामले में निर्धारित विधि व्यवस्था के मुताबिक, याचिका की पोषणीयता को लेकर उठे प्रश्नों पर विचार किया गया। कोर्ट ने सभी याचिकाओं को पोषणीय माना। कहा कि आपराधिक प्रक्रिया की शुद्धता और पीड़ितों के संरक्षण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। याची की अधिवक्ता प्रीति सिंह ने दलील दी कि सुमन मिश्रा का निर्णय सुप्रीम कोर्ट के कामाची के मामले पर आधारित था, जो घरेलू हिंसा की कार्यवाही को धारा 482 के तहत चुनौती देने पर नहीं, बल्कि समय-सीमा की प्रासंगिकता से जुड़ा था।

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सतीश चंद्र आहूजा के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम की कार्यवाही दंड प्रकिया संहिता के तहत भरण-पोषण जैसा ही मामला है। लिहाजा, घरेलू हिंसा के खिलाफ हाईकोर्ट धारा 482 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग कर सकता है। कोर्ट सभी मामलों को धारा 482 के अंतर्गत पोषणीय मानते हुए निस्तारित करने की संस्तुति की दी। कहा कि न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने और न्याय की सुरक्षा के लिए धारा 482 के तहत याचिकाएं स्वीकार्य है।

क्या था सुमन मिश्रा का मामला

बाराबंकी की सुमन मिश्रा ने घरेलू हिंसा संबंधी मामले में बाराबंकी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश (वर्ष 2012) और बाराबंकी के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (ईसी अधिनियम) आदेश (2013) को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। सुमन की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी गई है कि मद्रास हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने अरुल डेनियल और सुप्रीम कोर्ट के कामाची मामले के मुताबिक, घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत कार्यवाही को रद्द करने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत कार्यवाही स्वीकार्य नहीं है।

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