Coronavirus : जिंदगी ने छोड़ा साथ, अंतिम यात्रा में अपनों ने भी नहीं लगाया हाथ
- कोरोना संक्रमण से मौत के बाद अंतिम संस्कार के लिए घाट पर आने के लिए तैयार नहीं परिवार के लोग
- अप्रैल-मई में ऐसे तीस से ज्यादा ऐसे मामले आए सामने, जिसमें लावारिस के तौर पर हुआ जलाए गए शव
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फतेहपुर जिले के विनोद कुमार राय की स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय में मौत हो गई। वह कोरोना संक्रमित थे। विनोद का शव पोस्टमार्टम हाउस से 17 मई को फाफामऊ घाट पर ले जाया गया। यहां उनके परिजन अंतिम संस्कार कराए बिना ही चले गए। फाफामऊ स्थित कोविड घाट पर यह अकेले इकलौती घटना नहीं है, आए दिन किसी न किसी का लावारिस में ही अंतिम संस्कार करना पड़ता है। उनके अपने ही घाट नहीं पहुंच रहे हैं। कुछ तो ऐसे भी हैं, जो मौत की सूचना मिलने पर आने में असमर्थता जताते हैं। कुछ को कोरोना से मरने वाले का चेहरा देखना भी गंवारा नहीं। कुछ ने तो फोन ही बंद कर दिया।
कोविड अंतिम संस्कार के नोडल ऑफिसर डॉ. महानंद बताते हैं कि अप्रैल और मई में ऐसे करीब तीस से ज्यादा मामले आ चुके हैं। ऐसे भी मामले हैं, जिनमें संक्रमित की मौत पर परिजनों ने घाट पर आने से ही मना कर दिया। फोन से संपर्क किया गया तो जवाब मिला कि शव जला दिया जाए। उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। डिप्टी सीएमओ राकेश पांडेय कहते हैं कि अप्रैल में इस तरह के मामले अधिक आए। उस दौरान अस्पतालों से लेकर होम आइसोलेशन में भी लोग मर रहे थे। अकेले अप्रैल में ही दो दर्जन के करीब ऐसे शव आए जिनके परिजनों ने अंतिम संस्कार की रस्म नहीं निभाई। मई में भी अब तक 15 मामले आ चुके हैं। इनमें से कई मामलों में घरवालों ने जवाब में न आने को कहा। कुछ में परिजनों ने फोन तक नहीं उठाया।