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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Confirmation petition cannot be held against the custody of the minor on the order of the magistrate

मजिस्ट्रेट के आदेश पर नाबालिग की अभिरक्षा के खिलाफ नहीं हो सकती बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका

Mon, 08 Mar 2021 07:42 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 08 Mar 2021 07:42 PM IST
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नाबालिग को यदि मजिस्ट्रेट या बाल कल्याण समिति के आदेश से किसी संरक्षण गृह या बाल गृह में रखा जाता है तो ऐसे को आदेश अवैध निरुद्धि मानते हुए उसे बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में चुनौती नहीं दी जा सकती है। एक महत्वपूर्ण विधि प्रश्न पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन जजों की पूर्ण पीठ ने यह निर्णय दिया है।
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पूर्णपीठ ने यह भी कहा है कि किशोर न्याय बोर्ड या बाल कल्याण समिति या मजिस्ट्रेट नाबालिग की देखभाल व सुरक्षा जरूरतों के अनुसार किशोर न्याय अधिनियम की धारा 37 के उपबंध के तहत सामाजिक विवेचना रिपोर्ट व नाबालिग की इच्छा को देखते हुए उचित आदेश जारी कर सकेंगे। इस आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण या अपील दाखिल की जा सकती है, मगर इसे बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर चुनौती नहीं दी जा सकती है। पूर्ण पीठ ने कहा कि बोर्ड, मजिस्ट्रेट या कल्याण समिति का वैधानिक दायित्व है कि वह नाबालिग की सुरक्षा व हित में उचित आदेश जारी करे।
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यह फैसला न्यायमूर्ति संजय यादव ,न्यायमूर्ति एम सी त्रिपाठी तथा न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा की पूर्णपीठ ने सहारनपुर की एक किशोरी व अन्य की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर उठे वैधानिक प्रश्नों का निस्तारण करते हुए दिया है। मामले के अनुसार 17 वर्षीय किशोरी ने माता पिता पर प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए घर छोड़ दिया था।
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वह साथ में नकदी और जेवर भी ले गई। पुलिस ने जब उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया तो उसने माता पिता के साथ जाने से इनकार कर दिया। इस पर मजिस्ट्रेट के आदेश पर किशोरी को बाल संरक्षण गृह सहारनपुर में रखा गया है। इसे बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर यह कहते हुए चुनौती दी गई कि किशोरी बाल संरक्षण गृह में अवैध निरुद्धि में है। 

लड़की ने कोर्ट को बताया कि मां ने उसे पीटा, इसलिए वह अपनी मर्जी से अपनी सहेली के घर रहने चली गई। जब कि परिवार की तरफ से दर्ज प्राथमिकी में सहेली के भाई अर्जुन व उसके  परिवार पर लड़की के घर से भाग जाने के लिए उकसाने और  सहयोग देने का आरोप लगाया गया है।

तीन प्रश्नों पर कोर्ट ने दिया जवाब

याचिका में तीन महत्वपूर्ण विधि प्रश्न उठे। पहला यह कि क्या मजिस्ट्रेट या बाल संरक्षण समिति के आदेश से किसी संरक्षण गृह में रखे जाने के आदेश को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में चुनौती दी जा सकती है। दूसरा यह कि मजिस्ट्रेट के न्यायिक आदेश से संरक्षण गृह में रखना क्या अवैध निरुद्धि मानी जाएगी । और क्या किशोर न्याय अधिनियम के तहत मजिस्ट्रेट और बाल कल्याण समिति का नाबालिग का संरक्षण करना वैधानकि दायित्व है और क्या नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध नारी संरक्षण गृह या बाल संरक्षण गृह भेजने का आदेश दिया जा सकता है।

पूर्णपीठ ने कहा कि किशोर न्याय कानून के तहत न्याय बोर्ड, मजिस्ट्रेट  या बाल कल्याण कमेटी पर नाबालिग की सुरक्षा व देखभाल का वैधानिक दायित्व है। ऐसे में यदि नाबालिग लड़की अपने माता-पिता या रिश्तेदार के साथ जाने से इनकार करे तो मजिस्ट्रेट उसे संरक्षण प्रदान करेगा। यदि वह परिपक्व है तो उसकी इच्छा के अनुसार स्वतंत्र भी कर सकता है। ऐसे आदेश के खिलाफ अपील की व्यवस्था दी गई है। ऐसे में  बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल नहीं की जा सकती।


कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट या कमेटी के आदेश से अभिरक्षा में रखना अवैध निरुद्धि नहीं है। यदि ऐसा आदेश देते समय अधिकारिता या प्रक्रियात्मक खामी है तो भी निरुद्धि अवैध नहीं होगी और मजिस्ट्रेट या कमेटी को नाबालिग की सुरक्षा व हित में उचित संरक्षण आदेश जारी करने का अधिकार है। वह संरक्षण देने की व्यवस्था करेगा।
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