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बिना शादी जन्मी संतान और उसकी मां भरण-पोषण की हकदार : हाईकोर्ट
Sun, 12 Jul 2026 02:30 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
Updated Sun, 12 Jul 2026 02:30 AM IST
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना शादी जन्मी संतान और उसकी मां भरण-पोषण की हकदार है। विवाह प्रमाण पत्र के अभाव में उन्हें दर-दर भटकने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। पिता का कर्तव्य है कि वह अपनी वैध या अवैध संतान का पालन पोषण करे।
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति अचल सचदेव की अदालत ने महाराजगंज परिवार न्यायालय के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया जिसमें एक महिला को भरण-पोषण देने से यह कहते इन्कार कर दिया गया कि उसके पास वैध विवाह का कोई कागजी प्रमाण नहीं है।
याची महिला ने गोरखपुर के एक डिग्री कॉलेज में तैनात लैब टेक्नीशियन से अपने लिए 25 हजार व बच्चे के लिए 15 हजार रुपये महीने गुजारे भत्ते की मांग की। दावा किया कि दोनों ने 21 सितंबर 2017 को कोर्ट मैरिज करने के लिए विवाह पंजीकरण के लिए आवेदन किया था। लेकिन, कार्रवाई पूरी किए बिना साथ रहने लगे। आरोप है कि इसकी जानकारी होने पर पति के घर वालों ने दहेज की मांग को लेकर सताने लगे।
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इसी दौरान एक बेटे का जन्म हुआ। 2019 में दोनों को मारपीट कर घर से निकाल दिया गया। वह नाबालिग बेटे संग मायके में रहने लगी। दूसरी ओर, पति ने विवाह की वैधता से इन्कार कर दिया। लेकिन यह स्वीकार किया कि दोनों ने कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन किया था, साथ रहे थे और उनके संबंध से एक बेटे का जन्म हुआ। विवाह प्रमाण पत्र के अभाव में परिवार न्यायालय ने महिला का दावा खारिज कर दिया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
कोर्ट ने पाया कि परिवार न्यायालय ने पति के कबूलनामे पर विचार किए बिना तकनीकी आधार पर पत्नी का दावा खारिज कर दिया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। कहा भरण-पोषण के मामलों में तकनीकी दृष्टिकोण नहीं बल्कि सामाजिक न्याय आधारित उद्देश्यपूर्ण व्याख्या अपनाई जानी चाहिए।
लिहाजा, कोर्ट ने महिला की पुनरीक्षण याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बेटे को पांच हजार रुपये महीना भरण-पोषण के दिए जाने के आदेश को बरकरार रखा। वहीं, महिला के दावे पर नए सिरे से विचार के लिए मामला परिवार न्यायालय वापस भेज दिया।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
भरण-पोषण के प्रावधान कल्याणकारी कानून है। इसका उद्देश्य बेसहारा महिलाओं और बच्चों को सुरक्षा प्रदान करना है। विवाह की तकनीकी परिभाषाओं में उलझा कर उन्हें इससे वंचित करना कानून की मूल भावना के विपरीत है- हाईकोर्ट
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इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति अचल सचदेव की अदालत ने महाराजगंज परिवार न्यायालय के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया जिसमें एक महिला को भरण-पोषण देने से यह कहते इन्कार कर दिया गया कि उसके पास वैध विवाह का कोई कागजी प्रमाण नहीं है।
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याची महिला ने गोरखपुर के एक डिग्री कॉलेज में तैनात लैब टेक्नीशियन से अपने लिए 25 हजार व बच्चे के लिए 15 हजार रुपये महीने गुजारे भत्ते की मांग की। दावा किया कि दोनों ने 21 सितंबर 2017 को कोर्ट मैरिज करने के लिए विवाह पंजीकरण के लिए आवेदन किया था। लेकिन, कार्रवाई पूरी किए बिना साथ रहने लगे। आरोप है कि इसकी जानकारी होने पर पति के घर वालों ने दहेज की मांग को लेकर सताने लगे।
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इसी दौरान एक बेटे का जन्म हुआ। 2019 में दोनों को मारपीट कर घर से निकाल दिया गया। वह नाबालिग बेटे संग मायके में रहने लगी। दूसरी ओर, पति ने विवाह की वैधता से इन्कार कर दिया। लेकिन यह स्वीकार किया कि दोनों ने कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन किया था, साथ रहे थे और उनके संबंध से एक बेटे का जन्म हुआ। विवाह प्रमाण पत्र के अभाव में परिवार न्यायालय ने महिला का दावा खारिज कर दिया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
कोर्ट ने पाया कि परिवार न्यायालय ने पति के कबूलनामे पर विचार किए बिना तकनीकी आधार पर पत्नी का दावा खारिज कर दिया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। कहा भरण-पोषण के मामलों में तकनीकी दृष्टिकोण नहीं बल्कि सामाजिक न्याय आधारित उद्देश्यपूर्ण व्याख्या अपनाई जानी चाहिए।
लिहाजा, कोर्ट ने महिला की पुनरीक्षण याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बेटे को पांच हजार रुपये महीना भरण-पोषण के दिए जाने के आदेश को बरकरार रखा। वहीं, महिला के दावे पर नए सिरे से विचार के लिए मामला परिवार न्यायालय वापस भेज दिया।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
भरण-पोषण के प्रावधान कल्याणकारी कानून है। इसका उद्देश्य बेसहारा महिलाओं और बच्चों को सुरक्षा प्रदान करना है। विवाह की तकनीकी परिभाषाओं में उलझा कर उन्हें इससे वंचित करना कानून की मूल भावना के विपरीत है- हाईकोर्ट