{"_id":"61181ad58ebc3ee08c225b85","slug":"chand-pradeep-and-karmayogi-had-spread-the-fire-of-revolution-across-the-country-from-prayagraj","type":"story","status":"publish","title_hn":"चांद-प्रदीप और कर्मयोगी ने प्रयागराज से देश भर में फैलाई थी क्रांति की आग","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
चांद-प्रदीप और कर्मयोगी ने प्रयागराज से देश भर में फैलाई थी क्रांति की आग
Sun, 15 Aug 2021 01:05 AM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Sun, 15 Aug 2021 01:05 AM IST
सार
- सरदार भगत सिंह, शिव वर्मा, गणेश शंकर विद्यार्थी के लेखों का चांद में काल्पनिक नामों से होता था प्रकाशन
- ढाई साल में बदल गए थे स्वराज के आठ संपादक, सात को मिली थी कालेपानी की सजा
विज्ञापन
गणेश शंकर विद्यार्थी
विस्तार
स्वतंत्रता आंदोलन में प्रयागराज से निकलने वाले अखबारों और पत्रिकाओं के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आजादी की लड़ाई में राष्ट्रीय चेतना मुखर करने में यहां की पत्रकारिता ने समूचे देश में अपनी धाक ही नहीं जमाई, बल्कि अग्रणी भूमिका भी निभाई। संगमनगरी से निकलने वाले अखबारों में तब सरदार भगत सिंह, शिव वर्मा सरीखे क्रांतिकारियों के लेख चांद में काल्पनिक नामों से प्रकाशित होते थे। बाल गंगाधर तिलक और पं गणेश शंकर विद्यार्थी के संपादन में निकले अखबारों ने क्रांति की जो अलख जगाई, वह हमेशा याद रखी जाएगी।
विज्ञापन
इस शहर से दर्जन भर से अधिक ऐसे पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ, जिनके संपादक हमेशा जेल जाने के लिए तैयार रहा करते थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रेरणा से 1877 में पं. बालकृष्ण भट्ट के संपादन में हिंदी प्रदीप का प्रकाशन उन्हीं मील के पत्थरों में एक है। इस पत्रिका में 1908 में माधव की एक रचना बंदर सभा महाकाव्य शीर्षक से प्रकाशित हुई, जिसमें अंग्रेजों को बंदर की तरह बताया गया था। इस कविता के प्रकाशन पर अंग्रेज कलेक्टर ने हिंदी प्रदीप को कार्रवाई के लिए नोटिस जारी कर दिया। तब किसी तरह जवाब देकर इस आरोप से हिंदी प्रदीप को बरी कराया गया। इसी के दो साल बाद माधव की ही दूसरी रचना बम क्या है शीर्षक से प्रकाशित हो गई।
विज्ञापन
इससे नाराज ब्रिटिश प्रशासन ने हिंदी प्रदीप पर तीन हजार रुपये जुर्माना लगा दिया। जुर्माना अदा न करने पर पत्रिका को हमेशा के लिए बंद करने का आदेश दिया गया। अंतत: इस पत्रिका के दफ्तर पर ताला लग गया। इसी तरह एक सितंबर 1909 को अतरसुइया के पं. सुंदरलाल ने कर्मयोगी साप्ताहिक निकाला। इसमें सहायक संपादक के रूप में गणेश शंकर विद्यार्थी सहयोग कर रहे थे। अंग्रेजों के दमन के विरोध में प्रकाशित लेख को लेकर इस पर 1910 में जुर्माना लगा दिया गया। साथ ही संपादक को राष्ट्रद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। इसके बाद कर्मयोगी बंद हो गया।
विज्ञापन
क्रांतिकारियों की वीरगाथा और स्वतंत्रता आंदोलन पर कई किताबें लिखने वाले सुधीर विद्यार्थी उस दौर के पत्र-पत्रिकाओं पर विस्तार से रोशनी डालते हैं। वह बताते हैं कि नवंबर 1928 में दिवाली पर चांद पत्रिका के फांसी अंक के प्रकाशन को लेकर अंग्रेज इतने ख्रफा हुए थे, कि संपादक आचार्य चतुरसेन शास्त्री का पुलिस ने घर घेर लिया था। इस पत्रिका का प्रकाशन 1922 में रामरख सिंह सहगल ने आरंभ किया था। इस फांसी अंक से अंग्रेजी सरकार इसलिए नाराज हुई थी कि इसमें 50 से अधिक ऐसे क्रांतिकारियों के जीवन पर रोशनी डाली गई, जिन्हें तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने फांसी पर लटका दिया था।
इस अंक में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारियों को फांसी पर लटकाने की बर्बरता प्रकाशित की गई थी। इस अंक के बाद पूरे देश में राष्ट्रभक्ति की भावना का ज्वार उबलने लगा। इसके अलावा 1907 में शुरू हुए स्वराज अखबार की क्रांति भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है, जिसके ढाई साल में ही आठ संपादक बदल और सात संपादकों को काला पानी की सजा हुई। स्वतंत्रता आंदोलन के समय 1907 में शहर के शांति नारायण भटनागर ने अपनी जमीन बेचकर इस अखबार का प्रकाशन शुरू किया था। भटनागर को तीन वर्ष का सश्रम कारावास हुआ। स्वराज प्रेस जब्त कर लिया गया, लेकिन कुछ दिनों बाद ही नया प्रेस खुला।
विद्यार्थी बताते हैं कि इसके संपादक होती लाल वर्मा को 10 वर्ष और बाबू राम हरि को 11 अंकों के प्रकाशन के बाद 21 वर्षों की सजा हुई थी। मुंशी राम सेवक नए संपादक के रूप में कलेक्टर को अपना घोषणा पत्र ही दे रहे थे कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। तब अंग्रेज कलेक्टर ने चुनौती दी थी कि है कोई और जो इस तख्त पर गद्दीनशीन हो सके। तब देहरादून के नंद गोपाल चोपड़ा आगे आए थे, जिन्हें 12 अंकों के संपादन के बाद 30 वर्ष की सजा दी गई। फिर 12 नामों की सूची संपादक बनने के लिए आई। लेकिन, पंजाब के फील्ड मार्शल कहे जाने वाले लड्ढा राम कपूर संपादक बने। उन्हें तीन सम्पादकीय लिखने पर प्रति सम्पादकीय 10 वर्ष अर्थात कुल 30 वर्षों की सजा हुई। इनके बाद अमीर चंद्र इसके संपादक बने। हर संपादक के जेल जाने के बाद स्वराज में एक विज्ञापन छपता था। उसका मजमून इस तरह होता था-
संपादक चाहिए- वेतन दो सूखे ठिक्कड़, रोटी, एक गिलास ठंडा पानी, हर संपादकीय लिखने पर 10 वर्ष काले पानी की कैद।
इसके अलावा प्रतापगढ़ की कालाकांकर रियासत से हिंदी और अंग्रेजी में हिंदोस्थान नाम से प्रकाशित होने वाले अखबार की गूंज लंदन तक सुनाई देती थी। कालाकांकर से निकले इस अखबार ने अंग्रेजों के देश में ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कई साल तक ऐसा जहर उगला कि ब्रिटिश हुकूमत को तिलमिलाना पड़ा। वर्ष 1885 में हिंदोस्थान अखबार का प्रकाशन आरंभ हुआ। इसके प्रकाशक उस दौर के प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक कालाकांकर नरेश राजाराम पाल सिंह थे। पूर्वजों की भांति बचपन से ही राजा रामपाल सिंह के अंदर अंग्रेजी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का अदम्य संकल्प जन्म ले चुका था। इस अखबार का संपादन महामना मदन मोहन मालवीय ने भी किया था।