फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   By bursting balloons in the fair, someone became a shooter by playing marbles

परचम : मेले में गुब्बारे फोड़कर तो कोई कंचे खेलकर बन गया निशानेबाज, छोटे हाथों से बड़े लक्ष्य पर निशाना

Sat, 26 Aug 2023 05:39 PM IST
विनोद सिंह मशाहिद अब्बास, प्रयागराज
मशाहिद अब्बास, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 26 Aug 2023 05:39 PM IST
सार

मेरठ की रहने वाली सोनिया पाल पिछले दो साल से तेलियरगंज में एक छोटे से कमरे में किराये पर रह रही हैं। उनका सपना है कि निशानेबाजी में देश के लिए सोना जीतें और माता-पिता का ख्वाब पूरा करें। भोर में तीन बजे से रेंज में अभ्यास शुरू करने वाली सोनिया रोजाना 12 घंटे अभ्यास करती हैं।

विज्ञापन
By bursting balloons in the fair, someone became a shooter by playing marbles
निशानेबाज दीक्षा वैश्य, अमित देवज, तारणी व प्रेक्षा और सोनिया पाल। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

खुली आंखों से जो सपने देखे जाएं, उन्हें पूरा करने के लिए इंसान क्या नहीं करता। निशानेबाजी का खेल आसान नहीं है और यह तब और मुश्किल हो जाता है, जब आर्थिक स्थिति डावांडोल हो। लेकिन, इन बातों को धता करते हुए शहर में कई बच्चे न सिर्फ निशानेबाजी की कला को सीख रहे हैं बल्कि परचम भी लहरा रहे हैं।

विज्ञापन


अपने सपने को पूरा करने के लिए कोई किस हद तक मेहनत कर सकता है, इसकी नजीर ये खिलाड़ी हैं, जो सुविधाओं के अभावों के बावजूद अर्जुन बनकर लक्ष्य भेद रहे हैं। अमर उजाला की ओर से खेल दिवस की कड़ी में शूटिंग के खिलाड़ियों की मेहनत, लगन और उनकी चुनौतियों पर खास पेशकश -
विज्ञापन


पिता पशुपालक, बेटी साध रही लक्ष्य पर निशाना

मेरठ की रहने वाली सोनिया पाल पिछले दो साल से तेलियरगंज में एक छोटे से कमरे में किराये पर रह रही हैं। उनका सपना है कि निशानेबाजी में देश के लिए सोना जीतें और माता-पिता का ख्वाब पूरा करें। भोर में तीन बजे से रेंज में अभ्यास शुरू करने वाली सोनिया रोजाना 12 घंटे अभ्यास करती हैं। पिता फेरू सिंह पशुपालक हैं। सोनिया का कहना है कि उन्हें शूटिंग का चस्का मेले में गुब्बारे फोड़ने से लगा। उन्हें बंदूक चलाने और लक्ष्य को भेदने का शुरू से जुनून था। एनसीसी से जुड़ने के बाद सोनिया शूटिंग के खेल से परिचित हुईं।
विज्ञापन
विज्ञापन


एक दिन कर्नल अरुणवीर सिंह ने कैंप में सोनिया की निशानेबाजी की कला देखी तोे मंत्रमुग्ध हो गए। इसके बाद उन्होंने सोनिया को प्रोत्साहित किया। सोनिया की आर्थिक स्थिति के बारे में पता लगने पर कर्नल ने उसकी मदद करने का आश्वासन दिया। इसके बाद कर्नल से जानकारी मिलने पर सोनिया प्रयागराज पहुंची और यहां रेंज में अभ्यास शुरू किया। अब उनके सहयोग से सोनिया रोज यहां अभ्यास कर रही हैं। सोनिया को परिवार से भी पूरा सहयोग मिल रहा है। सोनिया निशानेबाजी में राष्ट्रीय स्तर तक की स्पर्धा का हिस्सा बन चुकी हैं और राज्य स्तर पर वह रजत पदक हासिल कर चुकी हैं।

कंचे और गुलेर से निशानेबाजी तक का सफर किया तय

देवरिया के रहने वाले अमित देवज बचपन से ही कंचे और गुलेर के शौकीन रहे। निशाना लगाने के शौक ने ही उनके अंदर निशानेबाजी का हुनर पैदा किया। भाई पवन पासवान सेना में हैं। अमित बताते हैं कि वे बचपन में भाई के साथ खूब कंचे खेलते थे। निशाना इतना सधा हुआ था कि दूर के कंचे पर भी आराम से निशाना लगता था। इसके साथ ही गुलेर से भी लक्ष्य को भेदने में अमित माहिर थे। उन्होंने बताया कि शूटिंग करने का अरमान तो बचपन से ही रहा, लेकिन देवरिया में रेंज न होने से और दिल्ली में महंगाई की वजह से जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

भाई की सेना में नौकरी लगी तो निशानेबाजी करने की इच्छा जाहिर की। भाई ने फौरन ही पता किया और प्रयागराज की रेंज में दाखिला दिला दिया। अब प्रयागराज में रहकर ही निशानेबाजी का अभ्यास कर रहे हैं। कई बार आर्थिक स्थिति बिगड़ी तो घर जाने का फैसला किया, लेकिन भाई ने हर बार यह कहकर प्रोत्साहित किया कि तब तक वापस न लौटना जब तक तुम्हारी झोली में पदक न आ जाए। अमित राज्य स्तर तक की स्पर्धा में खेल चुके हैं, जिसमें वे मामूली अंतर से पदक जीतने से चूक गए थे।

ट्यूशन पढ़ाकर और 15 किलोमीटर की दूरी तय कर सीख रहीं निशानेबाजी

यमुनापार के महेवा में स्थित गंगोत्रीनगर की रहने वाली दीक्षा वैश्य रोजना 15 किलोमीटर की दूरी तय कर महेवा से तेलियरगंज आती हैं और निशाना साधती हैं। दीक्षा के पिता फेरी लगाने का काम करते हैं। दीक्षा बताती हैं कि वे एक बार मेले में गुब्बारे पर निशाना लगाने वाली दुकान पर पहुंचीं। 20 में से 18 गोली से गुब्बारे फोड़ दिए। इस पर दुकान वाले ने कहा कि निशाना इतना अच्छा है तो निशानेबाज क्यों नहीं बन जाती। इसी एक शब्द ने निशानेबाजी के क्षेत्र में जाने के लिए प्रेरित कर दिया। पिता की मामूली सी कमाई को देखकर कभी घर पर कहने की हिम्मत नहीं हुई।

हालांकि, निशानेबाजी का इतना जुनून था कि खुद ही रेंज के बारे में पता किया। रेंज घर से 15 किलोमीटर दूर होने और फीस ज्यादा होने के चलते अरमान को दिल में ही संजो कर रह गईं। इसके बाद दीक्षा ने फैसला किया कि खुद कमाएंगी और इसके जरिये ही रेंज में अभ्यास करेंगी।इसके लिए घर-घर जाकर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। कुछ धन इकट्ठा हुआ तो पिता के सहयोग से रेंज में दाखिला ले लिया।

15 किलोमीटर दूर रेंज में सुबह चार बजे पहुंचना आसान नहीं था, लेकिन दृढ़शक्ति इतनी मजबूत थी कि मौसम की हर मार झेलते हुए सुबह चार बजे स्कूटी से गंगोत्रीनगर से तेलियरगंज का सफर तय करने लगीं। कई बार उतार-चढ़ाव की स्थिति आई, पैसे की व्यवस्था नहीं हो पाने के कारण कई बार रेंज को छोड़ना पड़ा, लेकिन फिर पैसों की व्यवस्था कर रेंज को दोबारा ज्वाइन किया।

लक्ष्य सिर्फ एक है कि निशानेबाजी में इतना माहिर हो जाना है कि देश के लिए पदक जीत सकें। दीक्षा का कहना है कि यह बेहद महंगा और बड़ा सपना है, लेकिन यह सपना उन्हें कभी सोने नहीं देता है। ट्यूशन पढ़ाकर निशानेबाजी की फीस ही अदा हो सकती है, किट की व्यवस्था किसी तरह कर पाई हैं। पिता का कहना है कि बेटी के सपने में ही उनका सपना है। बेटी की हर संभव मदद कर रहे हैं और वह जरूर देश के लिए पदक जीतेगी। दीक्षा राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी हैं और प्री-स्टेट में स्वर्ण व रजत पदक भी जीत चुकी हैं।

कान से सुनने में दिक्कत, लेकिन लक्ष्य भेदने में कोई सानी नहीं

फाफामऊ की रहने वाली दो बहनें तारणी व प्रेक्षा सक्सेना कम उम्र में ही निशाना साधना सीख रही हैं। दोनों बहनों को कान से सुनाई नहीं देता है और वे मशीन का सहारा भी लेती हैं। हालांकि, निशाना साधने में उनका कोई सानी नहीं है। महज आठ महीने पहले निशानेबाजी सीखना शुरू करने वाली दोनों बहनें रोजाना पांच से छह घंटे रेंज में बिताती हैं। एलआईसी में कार्यरत पिता आशीष सक्सेना का सपना है कि उनकी दोनों बेटियां देश के लिए पदक जीतें। केवी ओल्ड कैंट में जहां तारणी कक्षा दो की छात्रा हैं, वहीं प्रेक्षा कक्षा नौ में पढ़ रही हैं। दोनों बहनें इस साल होने वाली प्री-स्टेट प्रतियोगिता के लिए क्वालीफाई कर चुकी हैं। निशानेबाजी का जुनून दोनों बहनों में इस कद्र है कि दोनों आपस में प्रतिस्पर्धा करती हैं और एक दूसरे को गलती से आगाह कराती हैं।

डीएम बना तो जिला, मेडल जीता तो देश करेगा सलाम


शूटिंग रेंज के संस्थापक शरद नाथ के बेटे भाविन जीत महज 12 वर्ष की आयु में ही रिनॉल्ट शूटर बन गए हैं। वह राष्ट्रीय प्रतियोगिता के सब यूथ, यूथ, जूनियर एवं सीनियर वर्ग के लिए क्वालीफाई कर चुके हैं। नार्थ जोन की प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीतने के साथ ही भाविन दो बार प्री-स्टेट और एक बार राज्य स्तरीय प्रतियोगिता का हिस्सा बन चुके हैं। पिता शरद बताते हैं कि बेटे को पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए कहते हैं तो उसका जवाब होता है कि पापा पढ़ लिखकर डीएम बनूंगा तो सिर्फ एक जिला ही सम्मान करेगा, अगर ओलंपिक में पदक जीत लिया तो पूरा देश सलाम करेगा।

शरद कहते हैं कि बेटे के इन शब्दों ने उनके दिल पर गहरा प्रभाव छोड़ा और अब वे खुद बेटे के साथ रेंज में दिनभर पसीना बहाते हैं। बेटे के इस सपने को पूरा करने में वह सबसे अधिक योगदान देना चाहते हैं। भाविन का कहना है कि उन्हें निशानेबाजी का क्रेज इस कद्र है कि वह सुबह तीन बजे रेंज पर पहुंचते हैं और अपनी स्कूल ड्रेस साथ लेकर जाते हैं। रेंज से ही तैयार होकर स्कूल जाते हैं। उन्हें मैदान, पार्क, मॉल और अन्य शहरों में घूमने के बजाय रेंज में समय बिताना पसंद है।

शहर के प्रतिभावान लोगों ने हर क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम किया है और शहर का नाम वैश्विक स्तर पर बुलंद किया है। निशानेबाजी ऐसा खेल है, जहां प्रयागराज का प्रतिनिधित्व अभी उस तरह का नहीं है, जैसा होना चाहिए। अब जो बच्चे निकल रहे हैं, उनकी प्रतिभा आश्चर्यचकित करने वाली है। महज तीन साल में 12 खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर तक का सफर तय कर चुके हैं। हमें इंतजार है कि शहर से पहला अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी भी जल्द निकले। कई निशानेबाजों ने राज्य स्तरीय स्पर्धा में मेडल जीतकर शहर का मान बढ़ाया है। - शरद नाथ, प्रशिक्षक व सचिव प्रयाग शूटिंग एसोसिएशन

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed