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नमन : समतामूलक समाज निर्माण ही शहीदों का सपना था, जयंती पर याद किए गए अमर शहीद सुखदेव

Mon, 15 May 2023 05:04 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 15 May 2023 05:04 PM IST
सार

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ‘सुखदेव’ एक ऐसा नाम है जो न सिर्फ़ देशभक्ति बल्कि साहस और कुर्बानी का भी प्रतीक है। 23 मार्च 1931 के दिन सुखदेव अपने दो क्रान्तिकारी साथियों भगत सिंह और राजगुरू के साथ खुशी खुशी फांसी के तख्ते पर लटककर शहीद होना स्वीकार किया था।

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Building an egalitarian society was the dream of the martyrs, immortal martyr Sukhdev remembered
अमर शहीद सुखदेव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ‘सुखदेव’ एक ऐसा नाम है जो न सिर्फ़ देशभक्ति बल्कि साहस और कुर्बानी का भी प्रतीक है। 23 मार्च 1931 के दिन सुखदेव अपने दो क्रान्तिकारी साथियों भगत सिंह और राजगुरू के साथ खुशी खुशी फांसी के तख्ते पर लटककर शहीद होना स्वीकार किया था। यह बातें प्रबुद्ध फाउंडेशन और डॉ. अम्बेडकर वेलफेयर एसोसिएशन (दावा) के अध्यक्ष उच्च न्यायालय के अधिवक्ता आईपी रामबृज ने अलोपीबाग स्थित दावा के कार्यालय पर सादगीपूर्ण ढंग से अमर शहीद वीर सुखदेव की 116 वीं जयन्ती मनाते हुये कही।

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आईपी रामबृज ने आगे बताया कि शहादत के पच्चासी साल बाद भी भारत के ऐसे शहीद भारत की जनता के दिलों में अब भी ज़िन्दा हैं। भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव को अंग्रेजी सरकार ने 23 मार्च 1931 को लाहौर षड़यंत्र केस में फांसी दी थी। इन वीरों को फांसी की सजा देकर अंग्रेज सरकार इस मुगालते में थी कि भारत की जनता इस कार्रवाई से डर जायेगी और स्वतंत्रता की भावना को भूलकर विद्रोह नहीं करेगी लेकिन उनके मंसूबों पर पानी फिर गया और इन शहीदों की कुर्बानी ने देश की जनता में आज़ादी के प्रति ऐसी भावना भर दी कि हज़ारों देशवासी सर पर कफ़न बाँधकर अंग्रेजी सत्ता के ख़िलाफ़ जंग में कूद पड़े।

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लुधियाना में हुआ था जन्म
उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता शुकदेव राम ने बताया कि सुखदेव का जन्म 15 मई 1907 को लुधियाना में हुआ था। इनके पिता का नाम रामलाल और माता का नाम लल्ली देवी था। तीन वर्ष की आयु में ही पिता का साया सुखदेव के सर से उठ गया। इनका पालन-पोषण इनके ताऊ जी ने किया था। बचपन से ही अंग्रेजी सरकार के जुल्मों को सुखदेव ने देखा था, जिसके चलते गुलामी से कराहती जनता को मुक्ति दिलाने के लिए वे क्रांतिकारी बन गए।


डॉ. एसपी सिद्धार्थ ने बताया कि सुखदेव बहुत ही हसमुख, हाज़िरजवाब, ज़िन्दादिल और यारों के यार थे। वे सदैव अपने कॉमरेडों की ज़रूरतों का ख्याल रखते थे। गोरी हुकूमत से आज़ादी के लिए वे सदैव चिन्तित रहते थे। सुखदेव हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) की दूसरी पीढ़ी तो हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) के पहली पीढ़ी के क्रांतिकारी नेता थे। सुखदेव पार्टी के प्रति सदैव समर्पित रहे और उसूलों के लिए जान की बाजी लगाने में भी नहीं हिचकिचाये।

रिटायर्ड डिप्टी एसपी बहादुर राम ने बताया कि फांसी से तीन दिन पहले पंजाब के गवर्नर को लिखे पत्र में सुखदेव, भगतसिंह और राजगुरू ने यह ऐलान कर दिया था कि युद्ध छिड़ चुका है। यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी जब तक कि शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है। चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति या सर्वथा भारतीय ही क्यों न हों, ये दोनों मिले हुए, इस स्थिति में कोई अंतर नहीं पड़ता।

 

रिटायर्ड. प्रधानाचार्य एलके अहेरवार ने बताया कि शहीद सुखदेव और उनके साथियों के सपनों का समतामूलक समाज बनना अभी बाकी है। इसके लिए मेहनतकश जनता व खासकर नौजवानों को आगे आना होगा। उनके जन्मदिवस पर यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जयंती समारोह में बीआर दोहरे, बलवन्त गौतम, भारत सिंह, जीयुत प्रसाद, जीडी गौतम,, आरआर गौतम, उमाशंकर मणि, माता प्रसाद, निशा, हिमांशु, प्रियांशु, मनीषा, गायत्री आदि उपस्थित रहे।

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