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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Bajm-e-Virasat: Flute player Pt. Hari Prasad Chaurasia said – Whatever I am today is because of the flute.

बज्म ए विरासत : बांसुरी वादक पं. हरि प्रसाद चौरसिया बोले- आज जो कुछ भी हूं वह बांसुरी की वजह से

Fri, 20 Dec 2024 03:08 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 20 Dec 2024 03:08 PM IST
सार

हरि प्रसाद ने कहा कि मेरा जन्म इलाहाबाद हुआ है, लेकिन यहां आकर लगा कि मेरा जन्म यहां नहीं हुआ है। मुंबई और इलाहाबाद में कोई फर्क नहीं है। अब तीन सुंदर पवित्र नदियां दिखाई दे रही हैं। पहले तो दिखती ही नहीं थी।

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Bajm-e-Virasat: Flute player Pt. Hari Prasad Chaurasia said – Whatever I am today is because of the flute.
पं. हरि प्रसाद चौरसिया, बांसुरी वादक। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

प्रयागराज में जन्मे प्रख्यात बांसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया का मानना है कि इलाहाबाद (अब प्रयागराज) काफी बदल गया है। उन्होंने कहा कि कुछ वर्ष पहले और अब की तुलना की जाए तो अपना इलाहाबाद बहुत ही खूबसूरत हो गया है। शहर की धड़कन कहे जाने वाले लोकनाथ की गलियों में अब अंधेरा नहीं रहा। पहले जब मैं यहां पढ़ाई करता था तो लगता था कि इन गलियों में फंस गया हूं। हरि प्रसाद चौरसिया ने यह संस्मरण शुक्रवार को बिशप जानसन स्कूल एंड कॉलेज में आयोजित बज्म ए विरासत महोत्सव में साझा की। महोत्सव में हरि प्रसाद ने अपनी बांसुरी का भले ही हुनर न दिखाया हो लेकिन उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अंग्रेजी विभाग की प्रोफेसर स्मिता अग्रवाल से चर्चा की।

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स्मिता अग्रवाल ने कहा हम सबके लिए हरि प्रसाद जी एक प्रसाद की तरह हैं। वर्ष 1938-48 तक इलाहाबाद रहे। उस संस्मरण को याद करते हुए क्या कहेंगे? इस पर हरि प्रसाद ने कहा कि मेरा जन्म इलाहाबाद हुआ है, लेकिन यहां आकर लगा कि मेरा जन्म यहां नहीं हुआ है। मुंबई और इलाहाबाद में कोई फर्क नहीं है। अब तीन सुंदर पवित्र नदियां दिखाई दे रही हैं। पहले तो दिखती ही नहीं थी।

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हरि प्रसाद बोले- नहीं लगता था पढ़ाई में मन

सवाल करते हुए पूछा कि आप पहलवानी के माहौल से निकले हैं। अखाड़ों से निकलकर बांसुरी तक खिचांव कैसे हुआ? जवाब में हरि प्रसाद ने कहा कि इलाहाबाद के अग्रवाल कॉलेज में पढ़ाई हुई थी। पढ़ाई में मन नहीं लगता था। स्कूल के प्रधानाचार्य केदारनाथ गुप्ता ऐसे ही पास कर देते थे। इसी तरह बांसुरी बजाने लगा। इसके बाद लूकरगंज में एक टाइपिस्ट के यहां काम करने लगा। जितना बोलता था उतना टाइप कर देता था। फिर काम के दौरान भी बांसुरी बजाया करता था।

18 वर्ष की उम्र में स्टेट गवर्नमेंट की नौकरी मिल गई। उसमें भी मन नहीं लगा। इसके बाद बांसुरी ही मेरी पढ़ाई बन गई। नौकरी की वजह से ओडिशा ट्रांसफर हो गया था। फिर एक रेडियों में बांसुरी बजाया था। धीरे-धीरे लोग जानते गए। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद से ज्यादा सुंदर दूसरा कोई शहर नहीं है। पहले बिजली घर के पास डर लगता था। लेकिन, अब तो लगता है कि मुंबई छोड़कर यहीं वापस आ जाऊं।

स्मिता ने पूछा कि आपने बांसुरी वादन में कुछ संशोधन किए होंगे। तभी इंटरनेशनल तक पहुंच पाएं हैं। आपने क्या-क्या परिवर्तन किए। इस पर उनका जवाब था कि मैं बहुत ही अनपढ़ हूं। भगवान की तरफ से बांसुरी एक क्रिएशन है। बांस का टुकड़ा लेकर बजाता रहता था। कहा कि कृष्णजी बांसुरी बजाते थे तो गोपियां फिदा हो जाती थीं, लेकिन, मेरे बजाने पर कोई घर से बाहर नहीं निकलती थी। इसके बाद सवाल में पूछा कि आपके संगीत में अनुराधा जी का क्या योगदान है। इस पर उन्होंने कहा कि संगीत का आदर करती हैं।

लंतरानी ने लोगों का किया जमकर मनोरंजन

बिशप जॉनसन स्कूल एंड कॉलेज में 20 दिसंबर से तीन दिवसीय बज्म-ए-विरासत में सितारों की महफिल सजी। कार्यक्रम का उद्घाटन प्रख्यात बांसुरी वादक पंडित हरी प्रसाद चौरसिया ने दीप प्रज्ज्वलित करके किया। पहले दिन का मुख्य आकर्षण लंतरानी रहा। जिसमें साहित्यकार यश मालवीय, प्रो. धनंजय चोपड़ा, बाबा अभय अवस्थी, कमर आगा,  इसमें दारागंज, लोकनाथ और पुराने शहर की चर्चाएं होंगी। पुराने इलाहाबाद के किस्से और कहानियां में चर्चा में अभय अवस्थी, प्रो. धनंजय चोपड़ा, कमर आगा और आसिफ उस्मानी आदि ने इलाहाबादी लंतरानी के माध्यम से लोगों का जमकर मनोरंजन किया।

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