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बच्चन के बारे में कुछ नहीं भूले अजित, सब किया याद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 18 Aug 2017 01:41 AM IST
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हरिवंश राय बच्चन
- फोटो : self
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‘जो बीत गई, सो बात गई’ लेकिन ऐसा होता कहां है। इन पंक्तियों के रचनाकार सुप्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन के साथ ही ऐसा ही रहा। भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ के अगस्त अंक में प्रकाशित बच्चन जी के अत्यंत करीबी रहे और अब दिवंगत वरिष्ठ कवि-आलोचक अजित कुमार के एक इंटरव्यू में ‘मधुशाला’ के इस कवि की जिंदगी की कई कही-अनकही बातें सामने आई हैं, जिससे एक बार फिर साहित्य जगत में हलचल मच सकती है।
अजित कुमार का यह साक्षात्कार वेंकटेश कुमार ने लिया है, जिसमें बच्चन को लेकर समलैंगिकता सहित उनके प्रेम संबंधों पर खुलकर टिप्पणी की गई है। बच्चन को फिर-फिर पढ़ने, पहचानने की कोशिश में अजित ने चंपा और प्रकाशवती पॉल के साथ बच्चन के प्रेम प्रसंगों का विस्तार से जिक्र किया है।
खासे विवादित मुद्दों पर बेबाकी से तथ्यों को उद्घाटित करते हुए अजित कुमार बच्चन की होमोसेक्सुअल फीलिंग का जिक्र करना भी नहीं भूलते। अजित साफगोई से कहते हैं, संबंध सचमुच में हो या न हो, इसके बारे में दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन यदि कोई व्यक्ति अपने संगी-साथी को प्राणप्रिय समझता है तो कुछ बात तो है ही।
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वह यहीं नहीं रुकते। इलाहाबाद के बारे में बच्चन की पीड़ा को भी बेबाकी से बयां करते हैं। उनकी आत्मकथा का हवाला देते हैं जिसमें बच्चन ने लिखा है कि इलाहाबाद में मेरा बहुत अपमान हुआ है। अजित के मुताबिक, मैंने कई बार बच्चन जी से कहा कि इलाहाबाद के लोगों के प्रति आपके मन में कुछ ज्यादा ही कटुता है तो बच्चन जी ने मुझसे कहा कि अजित! तुम नहीं जानते कि इलाहाबाद के लोगों ने मुझे कितना मानसिक संताप दिया है। मैंने तो उसका दशांश भी नहीं लिखा है।
इस साक्षात्कार के बारे में ‘अमर उजाला’ ने वेंकटेश कुमार से जब बात की तो उन्होंने कहा, मेरी भूमिका तो बस एक साक्षात्कारकर्ता तक है। सब कुछ लिखित है। बच्चन रचनावली पलटिए, उसमें सबकुछ लिखा है। बच्चन पर बात करने के लिए अजित कुमार से ज्यादा प्रामाणिक दूसरा कोई नहीं है। सब कुछ ‘हाईथिकिंग’ है, उन लोगों की। फिर अजित कुमार ने उनके बारे में जो कुछ भी कहा है, सोच-समझकर ही कहा होगा, इसमें आपत्तियों के लिए कोई जगह नहीं है। यह तो एक लेखक की एक लेखक को श्रद्धांजलि है।
बच्चन जी ने कोई बात छुपायी नहीं है। चंपा प्रसंग के बारे में बच्चन जी ने जो कुछ भी लिखा है, वह ठीक लिखा है। यह एक प्रकार की आत्मस्वीकृति है कि उनके मित्र की पत्नी के साथ उनके संबंध थे लेकिन इस संबंध में इतनी गहनता और तीव्रता थी कि वे, उनके दोस्त और उनके दोस्त की पत्नी, सब एकाकार हो गए थे। खुद बच्चन जी मुझसे कहते थे कि देखो दाम्पत्य का मेरा आदर्श ये है कि अगर मैं महसूस करूं कि मेरी पत्नी किसी के बिना रह नहीं पा रही है, तो मैं उसके रास्ते में रुकावट नहीं डालूंगा।
ढूंढने वाले यह भी ढूंढ सकते हैं कि चंपा के पति के साथ बच्चन के होमोसेक्सुअल फीलिंग रहे हों। श्रीकृष्ण सूरी के प्रति जो मेंटल मेकअप है, वो होमोसेक्सुअल ही है। इसे तो वह बहुत ही स्वाभाविक मानते थे। इसे वह गुनाह के रूप में नहीं देखते थे। अपने मित्र श्रीकृष्ण सूरी के माध्यम से ही बच्चन जी प्रकाशवती के संपर्क में आए थे, जो यशपाल जी के साथ क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय थीं। बच्चन जी और श्रीकृष्ण सूरी बहुत अच्छे दोस्त थे। दिल्ली में श्रीकृष्ण सूरी ने बच्चन जी को उनसे मिलवाया और कहा कि तुम प्रकाशवती जी को कुछ समय के लिए अपने यहां रख लो। बच्चन जी ने उन्हें अपने यहां टिका लिया।
बच्चन जी का प्रकाशवती जी से एक तरफा स्नेह संबंध विकसित हुआ। बाद में श्रीकृष्ण सूरी भी इलाहाबाद आ गए। प्रकाशवती जी ऐसी महिला थीं कि उनका यशपाल जी से भी गहरा संबंध था, श्रीकृष्ण सूरी से भी गहरा संबंध था और बच्चन जी के प्रति भी बहुत कोमल मनोभाव था। अब इन सबका प्रमाण देने को कहेंगे मुझसे तो मैं नहीं दे पाऊंगा। मधुशाला’ में एक गीत है, ‘यह पगध्वनि मेरी पहचानिए’, यह प्रकाशवती पर ही लिखा है बच्चन जी ने।
बच्चन ने अपने घर के बगल में ही श्रीकृष्ण सूरी के रहने की व्यवस्था करा दी थी। एक दिन एक चिट्ठी छोड़कर श्रीकृष्ण सूरी और प्रकाशवती पाल दोनों बच्चन जी के घर से चले गए। चिट्ठी में यह लिखा था कि हम दोनों मरने जा रहे हैं, हम दोनों तुम्हारे योग्य नहीं हैं। चिट्ठी पढ़कर पागलों की तरह बच्चन गंगा की तरफ भागे। फिर बच्चन ने देखा दोनों घर लौट रहे हैं। बच्चन की पत्नी श्यामा ने पूछा, वे न मिलते तो तुम क्या करते तो उन्होंने कहा, मैं अपने भी प्राण त्याग देता। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि दोनों के प्रति कितनी प्रबल कोमल भावना थी बच्चन के मन में।
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अजित कुमार का यह साक्षात्कार वेंकटेश कुमार ने लिया है, जिसमें बच्चन को लेकर समलैंगिकता सहित उनके प्रेम संबंधों पर खुलकर टिप्पणी की गई है। बच्चन को फिर-फिर पढ़ने, पहचानने की कोशिश में अजित ने चंपा और प्रकाशवती पॉल के साथ बच्चन के प्रेम प्रसंगों का विस्तार से जिक्र किया है।
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खासे विवादित मुद्दों पर बेबाकी से तथ्यों को उद्घाटित करते हुए अजित कुमार बच्चन की होमोसेक्सुअल फीलिंग का जिक्र करना भी नहीं भूलते। अजित साफगोई से कहते हैं, संबंध सचमुच में हो या न हो, इसके बारे में दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन यदि कोई व्यक्ति अपने संगी-साथी को प्राणप्रिय समझता है तो कुछ बात तो है ही।
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वह यहीं नहीं रुकते। इलाहाबाद के बारे में बच्चन की पीड़ा को भी बेबाकी से बयां करते हैं। उनकी आत्मकथा का हवाला देते हैं जिसमें बच्चन ने लिखा है कि इलाहाबाद में मेरा बहुत अपमान हुआ है। अजित के मुताबिक, मैंने कई बार बच्चन जी से कहा कि इलाहाबाद के लोगों के प्रति आपके मन में कुछ ज्यादा ही कटुता है तो बच्चन जी ने मुझसे कहा कि अजित! तुम नहीं जानते कि इलाहाबाद के लोगों ने मुझे कितना मानसिक संताप दिया है। मैंने तो उसका दशांश भी नहीं लिखा है।
इस साक्षात्कार के बारे में ‘अमर उजाला’ ने वेंकटेश कुमार से जब बात की तो उन्होंने कहा, मेरी भूमिका तो बस एक साक्षात्कारकर्ता तक है। सब कुछ लिखित है। बच्चन रचनावली पलटिए, उसमें सबकुछ लिखा है। बच्चन पर बात करने के लिए अजित कुमार से ज्यादा प्रामाणिक दूसरा कोई नहीं है। सब कुछ ‘हाईथिकिंग’ है, उन लोगों की। फिर अजित कुमार ने उनके बारे में जो कुछ भी कहा है, सोच-समझकर ही कहा होगा, इसमें आपत्तियों के लिए कोई जगह नहीं है। यह तो एक लेखक की एक लेखक को श्रद्धांजलि है।
बच्चन जी ने कोई बात छुपायी नहीं है। चंपा प्रसंग के बारे में बच्चन जी ने जो कुछ भी लिखा है, वह ठीक लिखा है। यह एक प्रकार की आत्मस्वीकृति है कि उनके मित्र की पत्नी के साथ उनके संबंध थे लेकिन इस संबंध में इतनी गहनता और तीव्रता थी कि वे, उनके दोस्त और उनके दोस्त की पत्नी, सब एकाकार हो गए थे। खुद बच्चन जी मुझसे कहते थे कि देखो दाम्पत्य का मेरा आदर्श ये है कि अगर मैं महसूस करूं कि मेरी पत्नी किसी के बिना रह नहीं पा रही है, तो मैं उसके रास्ते में रुकावट नहीं डालूंगा।
ढूंढने वाले यह भी ढूंढ सकते हैं कि चंपा के पति के साथ बच्चन के होमोसेक्सुअल फीलिंग रहे हों। श्रीकृष्ण सूरी के प्रति जो मेंटल मेकअप है, वो होमोसेक्सुअल ही है। इसे तो वह बहुत ही स्वाभाविक मानते थे। इसे वह गुनाह के रूप में नहीं देखते थे। अपने मित्र श्रीकृष्ण सूरी के माध्यम से ही बच्चन जी प्रकाशवती के संपर्क में आए थे, जो यशपाल जी के साथ क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय थीं। बच्चन जी और श्रीकृष्ण सूरी बहुत अच्छे दोस्त थे। दिल्ली में श्रीकृष्ण सूरी ने बच्चन जी को उनसे मिलवाया और कहा कि तुम प्रकाशवती जी को कुछ समय के लिए अपने यहां रख लो। बच्चन जी ने उन्हें अपने यहां टिका लिया।
बच्चन जी का प्रकाशवती जी से एक तरफा स्नेह संबंध विकसित हुआ। बाद में श्रीकृष्ण सूरी भी इलाहाबाद आ गए। प्रकाशवती जी ऐसी महिला थीं कि उनका यशपाल जी से भी गहरा संबंध था, श्रीकृष्ण सूरी से भी गहरा संबंध था और बच्चन जी के प्रति भी बहुत कोमल मनोभाव था। अब इन सबका प्रमाण देने को कहेंगे मुझसे तो मैं नहीं दे पाऊंगा। मधुशाला’ में एक गीत है, ‘यह पगध्वनि मेरी पहचानिए’, यह प्रकाशवती पर ही लिखा है बच्चन जी ने।
बच्चन ने अपने घर के बगल में ही श्रीकृष्ण सूरी के रहने की व्यवस्था करा दी थी। एक दिन एक चिट्ठी छोड़कर श्रीकृष्ण सूरी और प्रकाशवती पाल दोनों बच्चन जी के घर से चले गए। चिट्ठी में यह लिखा था कि हम दोनों मरने जा रहे हैं, हम दोनों तुम्हारे योग्य नहीं हैं। चिट्ठी पढ़कर पागलों की तरह बच्चन गंगा की तरफ भागे। फिर बच्चन ने देखा दोनों घर लौट रहे हैं। बच्चन की पत्नी श्यामा ने पूछा, वे न मिलते तो तुम क्या करते तो उन्होंने कहा, मैं अपने भी प्राण त्याग देता। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि दोनों के प्रति कितनी प्रबल कोमल भावना थी बच्चन के मन में।