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अतीक के सियासी भविष्य पर सवाल
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Mon, 02 Jan 2017 01:36 AM IST
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मीडिया से बातचीत करते सपा नेता अतीक अहमद
- फोटो : अमर उजाला, कानपुर
सपा में बदले समीकरणों के बीच मुलायम सिंह यादव के सहारे अपनी राजनीति की गाड़ी खींच रहे पूर्व सांसद बहुबली अतीक अहमद को नई मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। उनके सियासी भविष्य को लेकर भी कयासबाजी शुरू हो गई है। सपा के चुनाव चिह्न के बगैर अतीक को नए क्षेत्र से चुनाव लड़ना पड़ा तो उन्हें अपने संपर्कों पर कितने वोट मिल सकेंगे, क्या फिर उनकी अपने पुराने क्षेत्र शहर पश्चिमी में वापसी होगी या वह पार्टी सिंबल के लिए किसी दूसरे दल का दरवाजा खटखटाएंगे? ऐसे तमाम सवालों ने सियासी गलियारे में उथल-पुथल मचा रखी है।
मुलायम सिंह यादव के करीबी होने के नाते अतीक अहमद को इस बार कानपुर कैंट से टिकट दिया गया लेकिन सीएम अखिलेश यादव की सूची में अतीक का नाम नहीं है। नए राजनीतिक समीकरणों में अखिलेश यादव का पलड़ा भारी पड़ रहा है। ऐसे में अतीक अहमद के टिकट पर संकट मंडराता नजर आ रहा है। अगर टिकट कटता है तो अतीक के सामने दो ही रास्ते होंगे, निर्दलीय चुनाव लड़ें या किसी दूसरी पार्टी का दामन थाम लें। अतीक पार्टी बदलते हैं तो कोई नई बात नहीं होगी। 1996 में शहर पश्चिमी से सपा के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद 2002 का विधानसभा चुनाव उन्होंने अपना दल के सिंबल पर ही जीता था।
हालांकि इसके बाद अतीक की सपा में वापसी हुई। 2004 का लोकसभा चुनाव सपा के टिकट से लड़े और फूलपुर से सांसद चुने गए। यहां तक कि 2005 में शहर पश्चिमी के तत्कालीन विधायक राजू पाल की हत्या के प्रमुख आरोपी रहे अतीक के छोटे भाई खालिद अजीम उर्फ अशरफ को मुलायम सिंह यादव ने उप चुनाव में इसी सीट से सपा का टिकट दिया। हत्याकांड में अतीक अहमद भी आरोपी थे लेकिन मुलायम ने 2014 के लोकसभा चुनाव में अतीक को सुल्तानपुर से चुनाव लड़ने के लिए सपा से टिकट दिया, पर अतीक को हार का मुंह देखना पड़ा। 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी अतीक को मुलायम का साथ मिला और वह कानपुर कैंट से सपा का टिकट हासिल करने में सफल रहे लेकिन नए राजनीतिक समीकरण में वह अब पार्टी से अलग-थलग दिखाई पड़ रहे हैं।
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अगर अतीक अहमद को सपा का सिंबल नहीं मिलता है तो उन्हें सपा के वोट बैंक से भी हाथ धोना पड़ेगा। ऐसे में कानपुर कैंट जैसे नए क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ना घाटे का सौदा साबित हो सकता है। अतीक शहर पश्चिमी से वर्ष 1989, 1991 और 1993 का विधानसभा चुनाव बतौर निर्दलीय प्रत्याशी जीत चुके हैं। ऐसे में बदले समीकरणों में शहर पश्चिमी में उनकी वापसी के कयास भी लगाए जा रहे हैं। चर्चा यह भी है कि अतीक के लिए अगर सपा के दरवाजे बंद हुए तो वह दूसरे दल में जाने का विकल्प चुन सकते हैं। ऐसे में कृष्णा पटेल के गुट वाला अपना दल भी विकल्प बन सकता है।
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मुलायम सिंह यादव के करीबी होने के नाते अतीक अहमद को इस बार कानपुर कैंट से टिकट दिया गया लेकिन सीएम अखिलेश यादव की सूची में अतीक का नाम नहीं है। नए राजनीतिक समीकरणों में अखिलेश यादव का पलड़ा भारी पड़ रहा है। ऐसे में अतीक अहमद के टिकट पर संकट मंडराता नजर आ रहा है। अगर टिकट कटता है तो अतीक के सामने दो ही रास्ते होंगे, निर्दलीय चुनाव लड़ें या किसी दूसरी पार्टी का दामन थाम लें। अतीक पार्टी बदलते हैं तो कोई नई बात नहीं होगी। 1996 में शहर पश्चिमी से सपा के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद 2002 का विधानसभा चुनाव उन्होंने अपना दल के सिंबल पर ही जीता था।
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हालांकि इसके बाद अतीक की सपा में वापसी हुई। 2004 का लोकसभा चुनाव सपा के टिकट से लड़े और फूलपुर से सांसद चुने गए। यहां तक कि 2005 में शहर पश्चिमी के तत्कालीन विधायक राजू पाल की हत्या के प्रमुख आरोपी रहे अतीक के छोटे भाई खालिद अजीम उर्फ अशरफ को मुलायम सिंह यादव ने उप चुनाव में इसी सीट से सपा का टिकट दिया। हत्याकांड में अतीक अहमद भी आरोपी थे लेकिन मुलायम ने 2014 के लोकसभा चुनाव में अतीक को सुल्तानपुर से चुनाव लड़ने के लिए सपा से टिकट दिया, पर अतीक को हार का मुंह देखना पड़ा। 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी अतीक को मुलायम का साथ मिला और वह कानपुर कैंट से सपा का टिकट हासिल करने में सफल रहे लेकिन नए राजनीतिक समीकरण में वह अब पार्टी से अलग-थलग दिखाई पड़ रहे हैं।
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अगर अतीक अहमद को सपा का सिंबल नहीं मिलता है तो उन्हें सपा के वोट बैंक से भी हाथ धोना पड़ेगा। ऐसे में कानपुर कैंट जैसे नए क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ना घाटे का सौदा साबित हो सकता है। अतीक शहर पश्चिमी से वर्ष 1989, 1991 और 1993 का विधानसभा चुनाव बतौर निर्दलीय प्रत्याशी जीत चुके हैं। ऐसे में बदले समीकरणों में शहर पश्चिमी में उनकी वापसी के कयास भी लगाए जा रहे हैं। चर्चा यह भी है कि अतीक के लिए अगर सपा के दरवाजे बंद हुए तो वह दूसरे दल में जाने का विकल्प चुन सकते हैं। ऐसे में कृष्णा पटेल के गुट वाला अपना दल भी विकल्प बन सकता है।