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संस्कृत विभाग के प्रवक्ता की नियुक्ति रद्द

Thu, 27 Apr 2017 01:52 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Thu, 27 Apr 2017 01:52 AM IST
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Appointment of the spokesman of the Sanskrit Department
मुकदमा - फोटो : demo pic
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में कार्यरत प्रवक्ता अमिय मिश्र के विभाग में नियमितीकरण को हाईकोर्ट ने अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है, कोर्ट ने गलत तरीके से नियमित करने तथा याची डा. रामसेवक दुबे को बेवजह मुकदमेबाजी में उलझाने पर विश्वविद्यालय पर 50 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है। हर्जाने की राशि डा. दुबे को देने का निर्देश दिया है। संस्कृत विभाग के प्रवक्ता डा. दुबे की याचिका पर न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति केजे ठाकर की पीठ ने सुनवाई की।
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याचिका में डा. अमिय मिश्र को संस्कृत विभाग में प्रवक्ता के तौर पर नियमित करने के 29 मई 1998 केआदेश को चुनौती दी गई थी। कहा गया कि इस आदेश से अमिय मिश्र को एक अप्रैल 1989 से विभाग में प्रवक्ता के पद पर नियमित कर दिया गया। इससे वह वैद्य रूप से नियुक्त होने के बावजूद उनसे जूनियर हो गए जबकि डा. मिश्र की नियुक्ति पत्राचार विभाग में लेसन राइटर के पद पर 500 रुपये प्रतिमाह के मानदेय पर की गई थी। यह नियुक्ति बिना किसी प्रक्रिया को अपनाए और बिना विज्ञापन के की गई थी। उनकी नियुक्ति को रामेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी, इसके बाद विश्वविद्यालय द्वारा उनको पद से हटा देने पर कोर्ट ने याचिका अर्थहीन मानते हुए निस्तारित कर दी थी।
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याची का कहना है कि इसके बाद एक्जीक्यूटिव काउंसिल में अपने रिश्तेदारों की मदद से 1996 में अमिय मिश्र पुन: पत्राचार विभाग में नियुक्त कर दिए गए। याची को पता चला कि अमिय मिश्र को 29 मई 1998 के आदेश से संस्कृत विभाग में प्रवक्ता के पद एक अप्रैल 1989 से नियमित कर दिया गया है। जबकि इस संबंध में न तो कुलपति और एक्जीक्यूटिव काउंसिल द्वारा कोई निर्णय लिया गया और न ही संस्कृत विभाग में कोई पद विज्ञापित किया गया। उन्होंने प्रवक्ता के पद पर नियुक्त होने की कोई प्रक्रिया भी पूरी नहीं की है।
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कोर्ट ने इस मामले में अमिय मिश्र का नियुक्ति पत्र भी तलब किया था। कुलपति प्रो. हांगलू कोर्ट के समक्ष उपस्थित हुए मगर वह संस्कृत विभाग में प्रवक्ता के पद पर उनकी नियुक्ति का पत्र नहीं दिखा सके। उन्होंने कुछ प्रपत्रों की फोटो स्टेट प्रति दी जिसका मूल रिकार्ड भी विश्वविद्यालय के पास नहीं था। कोर्ट ने विपक्षी की इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि वह दशकों से पढ़ा रहा है और इस स्थिति में उसकी नियुक्ति को रद्द करने का कोई औचित्य नहीं है। पीठ ने 29 मई 1998 के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि याची बेवजह की मुकदमेबाजी में उलझाने के कारण विश्वविद्यालय से 50 हजार रुपये हर्जाना पाने का हकदार है।
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