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हाईकोर्ट : तैनाती के लिए लगातार लड़ने वाले अभ्यर्थी की नियुक्ति का अर्थ अधिकार छोड़ना नहीं

Sat, 17 Dec 2022 09:44 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 17 Dec 2022 09:44 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि डिग्री कॉलेजों में प्राचार्य भर्ती में वरीयता कॉलेज मे तैनाती के लिए लगातार लड़ने वाले अभ्यर्थी के दूसरे कॉलेज में ज्वाइन करने से नहीं कहा जा सकता कि उसने अपना अधिकार छोड़ दिया है।

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Appointment of a candidate fighting continuously for posting does not mean giving up the right
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि डिग्री कॉलेजों में प्राचार्य भर्ती में वरीयता कॉलेज मे तैनाती के लिए लगातार लड़ने वाले अभ्यर्थी के दूसरे कॉलेज में ज्वाइन करने से नहीं कहा जा सकता कि उसने अपना अधिकार छोड़ दिया है। उसने मेरिट से वरीयता कॉलेज में तैनाती पाने का अधिकार नहीं छोड़ा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि एक अभ्यर्थी की गलत तैनाती के खिलाफ  नियमानुसार अपनी तैनाती की मांग में याचिका दायर की गई है तो चयनित सभी अभ्यर्थियों को याचिका में पक्षकार बनाना जरूरी नहीं है।

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कोर्ट ने  विनय कुमार केस में पूर्णपीठ के फैसले के अनुसार उच्च शिक्षा निदेशक की ओर से वरीयता सूची से याची को कॉलेज आवंटित नहीं करने के 20 दिसंबर 21 तथा एकलपीठ के आदेश 20 जून 22 को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है। याची को उसकी मेरिट पर वरीयता कॉलेज आवंटित करने का नए सिरे से आदेश पारित करने का निर्देश दिया है। 
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यह आदेश न्यायमूर्ति मनोज मिश्र तथा न्यायमूर्ति विकास बुधवार की खंडपीठ ने डॉ.अंजू चौधरी की विशेष अपील को स्वीकार करते हुए दिया है। अपील पर वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे तथा अधिवक्ता  कौन्तेय सिंह ने बहस की। मालूम हो कि प्रदेश के डिग्री कॉलेजों में प्राचार्य के 296 पदों की भर्ती में याची चयनित हुई। चयन सूची में उसे 200, डॉ.चारू मेहरोत्रा को 205 तथा डॉ. सुनीता आर्या को 218 क्रमांक पर रखा गया है।

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क\लेजों का भी मेरिट क्रमांक है। याची को 20 क्रमांक वाला कॉलेज आवंटित किया जाना चाहिए था। किंतु उसे वहां आवंटित करने के बजाय 41 क्रमांक वाला कॉलेज आवंटित कर दिया। याची की वरीयता वाले कॉलेज में विपक्षी डॉ.चारू मेहरोत्रा को नियुक्ति दे दी गई जबकि उनकी मेरिट याची से कम है। नियमानुसार याची को वरीयता कालेज दिया जाना चाहिए था।


हाईकोर्ट ने निदेशक को दोनों को सुनने के बाद मेरिट पर याची का प्रत्यावेदन तय करने का  आदेश दिया था। गलत तरीके से याची की वैध मांग खारिज कर दी गई। कोर्ट ने प्रत्यावेदन तय होने तक याची को आवंटित कॉलेज में नियुक्त करने के लिए बाध्य करने पर रोक लगा दी थी। इसके बाद ज्वाइन करना पड़ा। इससे उसने अपना चुनौती देने का अधिकार नहीं छोड़ा। एकलपीठ ने बिना पूर्णपीठ के फैसले पर विचार किए याचिका खारिज कर गलती की। इसलिए निदेशक नए सिरे से वरीयता से याची की नियुक्ति करें।

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