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अपराजिताः राजनीति में दखल बढ़ा, पर नीति निर्धारण में अब भी पीछे

Sat, 09 Mar 2019 12:27 AM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 09 Mar 2019 12:27 AM IST
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Aparajita: Increase in interference in politics, but still in determining policy
अपराजिता कार्यक्रम में शपथ पत्रों के साथ छात्राएं व शिक्षिकाएं - फोटो : amar ujala

पिछले कुछ वर्षों में राजनीति में महिलाओं का दखल भले ही बढ़ा हो लेकिन, नीति निर्धारण में उनकी भागीदारी नाममात्र की ही है। राजनीति में अभी भी महिलाओं को शोपीस की तरह देखा जाता है। सीट महिलाओं की होती है और काम उनके पति या परिवार के लोग करते हैं। लोकतंत्र में महिलाओं की भूमिका सशक्त तौर पर तय करने के लिए जरूरी है कि वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों। उन्हें पता हो कि उनके सामाजिक, आर्थिक, कानूनी और कानूनी अधिकार क्या हैं। इसी तरह के विचार वक्ताओं ने शुक्रवार को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ‘अमर उजाला अपराजिता’ अभियान के कार्यक्रम में साझा किए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास में वक्ताओं ने ‘लोकतंत्र में महिलाओं की भूमिका’ विषय पर केंद्रित संगोष्ठी में विचारों को रेखांकित किया।

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इविवि के राजनीति विभाग की अध्यक्ष प्रो. अनुराधा अग्रवाल ने कहा कि राजनीति को लेकर महिलाओं में जागरूकता आई है। चुनाव में महिलाओं का मतदान प्रतिशत भी बढ़ा है, फिर भी यह नाकाफी है। महिलाएं वोट जरूर डालती हैं लेकिन वह वोट तो सिर्फ नाम का होता है। परिवार का मुखिया जिसे वोट देने को कहते हैं कि वह उसके नाम के आगे बटन दबा देती हैं। वहीं जो महिलाएं राजनीति में हैं, उसमें भी उनका परिवार हावी होता है। गांव की प्रधान भले ही महिला लेकिन काम प्रधान पति ही करते हैं। हालांकि कुछ महिला प्रधान ऐसी हैं, जो अपने अधिकारों का प्रयोग कर रही हैं। महिला सांसदों की संख्या 12 प्रतिशत है, लेकिन यह कम है।
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आर्य कन्या डिग्री कॉलेज की प्राचार्य डॉ. रमा सिंह ने कहा कि निश्चित रूप से महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत बढ़ा है। अगर हम वोट देते हैं तो हमें आरक्षण भी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि महिलाएं खुद अपने अंदर राजनीतिक सोच विकसित करें। अपनी आवाज उठाएं। दिल से नहीं दिमाग से सोचे। आज की हकीकत यह है कि महिलाओं के लिए उनके सीट का प्रयोग सिर्फ नाम के लिए होता है। नीति निर्धारण और निर्णय लेने में उन्हें दूर रखा जाता है। नीति निर्धारण और निर्णय लेने के अधिकार का संघर्ष अभी बाकी है। ईसीसी के राजनीति विभाग की अध्यक्ष डॉ. असीमा घोष ने विषय को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अगर हम अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं तो अपने बिना आरक्षण के भी हम अपनी पहचान बना सकते हैं। लोकतंत्र में अपनी भूमिका हमें खुद तय करनी होगी। यह तभी संभव है जब हम जागरूक होंगे।

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