{"_id":"9364a974226c6d392461e78448e6f3ea","slug":"allahabad-news-hindi-news-966","type":"story","status":"publish","title_hn":"यादों में अमर अमरकांत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यादों में अमर अमरकांत
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Wed, 17 Feb 2016 12:31 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार अमरकांत को हमसे विदा हुए आज पूरे दो बरस हो गए। अमरकांत का रचना संसार इतना समृद्ध और उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावपूर्ण है कि अपनी शाब्दिक उपस्थित से हमेशा हमारे बीच रहते हैं। अमरकांत की दूसरी पुण्यतिथि पर उनकी स्मृतियों को सहेजते हुए प्रस्तुत है उनके लिखे कुछ अंश व उनकी पुत्रवधु रीता वर्मा की जुबानी।
लेखक से दोस्ती
लेखक की दोस्ती के संबंध में कुछ लिखने से पहले यह बताना दिलचस्प है कि एक पराठानुमा पकवान का नाम भी ‘दोस्ती’ है। गूंधे हुए आटे की दो सुडौल लोइयों को थोड़ा-थोड़ा बेलने के बाद दोनों ओर घी लगाकर आपस में जोड़ दिया जाता है और अन्तत: पूरा तवे पर बेलकर तवे पर हल्केघी या तेल से सेंक लिया जाता है। मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि मेरे घर में सेवई बनाने का जब प्रोग्राम बनता था तो मां अनिवार्य रूप से ‘दोस्ती’ ही क्यों पकाती थीं। वैसे खाद्य वस्तुओं केभी दोस्त तो होते ही हैं, जैसे ‘खिचड़ी के चार यार’
इंसानी और सामाजिक जरूरतों की वजह से लेखकों की भी दोस्ती जुड़ती है, और समय के चाक पर घूमती हुई भिन्न आकार, रूप, रंग धारण कर लेती है। समय ही दोस्तियों को बेलता, सेंकता और पकाता है और समय ही इनको खा भी लेता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि व्यक्तिवादी लोगों की दोस्ती के भी किस्से मशहूर हैं। रेशम के पतले धागे से भी कोमल है दोस्ती, लेकिन कभी-कभी जूट के रस्से से भी अधिक मजबूत। शायद सबसे कमजोर होती है नादानी, निजी महत्वाकांक्षा, अहंकार और लापरवाही और स्वार्थ के घी-तेल से सेंकी हुई दोस्ती। संक्षेप में, चावल की जातियों की तरह दोस्ती की किस्में भी अनंत हैं।
विज्ञापन
लेखकों की दोस्ती की इस दुनिया से अलग या ऊपर नहीं है। अमूमन दो लेखकों या दो लेखिकाओं की दोस्ती परिस्थिति विशेष, निज की जरूरत, आत्मपरक उत्साह, हवाई भावना व महत्वाकांक्षा पर आधारित होने के कारण जमीनी, ठोस और स्थिर नहीं होती। सिद्धांत पर आधारित दोस्तियों को मजबूत कहा जाता है, इसमें सच्चाई तो है, लेकिन सिद्धांत जिस तरह जल्दी-जल्दी छोड़े और तोड़े जाते हैं, उसी तरह सैद्धांतिक दोस्तियां टूट जाती हैं और कभी-कभी खतरनाक भी हो जाती है। कुछ लोग कहते हैं कि एक लेखक हवा से प्यार करता है और हवा से लड़ता भी है और कभी-कभी वह दृश्य भी देखने में आता है, जब कोई अंधा कुत्ता तेज वाताश से ही आशंकित होकर भौकने लगता है। जब मैं 1951 में आगरा से इलाहाबाद आया तो यहां के वातावरण में कई लेखकीय दोस्तियों की मिश्रित गंध व्याप्त थी।
चिरनिद्रा में सो गए बाबू जी
0 रीता वर्मा
आज से पूरे दो वर्ष पहले, 17 फरवरी 2014 की सुबह एक अजीब सी ठंड। साढ़े नौ बजे ही बाबूजी सोकर उठ जाते हैं। आमतौर पर ठंड के दिनों में दस-ग्यारह से पहले नहीं उठते थे।
उस वक्त मैं स्नान की तैयारी में थी। मुझे देखकर उन्होंने पूछा- नहाने जा रही हो क्या, मैंने हामी भरी और बोली अगर आपको जाना है तो होे लें, मैं उसके बाद नहा लूंगी। पहले कहा- नहा लो, फिर बोले रुको मैं आता हूं। मैं अंदर बिस्तर के करीब बैठ गई। वे अंदर गए, दरवाजा सिर्फ सटा दिया जाता है। अंदर से कुंडी बंद नहीं दिया जाता था।
स्नान की बाल्टी में पानी गिर रहा था, टायलेट के नल का पानी तेज रफ्तार से गिर रहा था। जब कुछ देर हुई तो मैं घबराई। आख्रिर इतनी देर तक ठंड में क्या कर रहे हैं। दरवाजा खोलने की कोशिश की। अंदर की स्थिति देखकर मैं दंग रह गई। वह मुंह के बल गिरे हुए थे। तब मैंने सबको आवाज लगाई। मैं, पति अरविंद बिंदु और मेरा बड़ा बेटा निखिल तीनों उन्हें उठाकर बिस्तर पर लेटाते हैं। अरविंद जी और निखिल उनके ठंडे हो चुके हाथ-पैर को गर्म करने की कोशिश में मसाज करते हैं, मैं उनके गाल और चेहरे को थपथपा कर कानों में बाबूजी-बाबूजी आंखें खोलिए कहकर उन्हें जगाने का प्रयास करती हूं। आंखें अंतिम बार फड़फड़ाईं और चेहरा मेरे हाथों में एक ओर लटक गया। पानी की कुछ बूंदे मुंह से निकलकर मेरी हथेली में फैल गईं।
डॉक्टर को तुरंत बुलाया गया, परीक्षण के बाद पता चला कि गंभीर हार्ट अटैक आया था, जिससे हार्ट फेल हो गया। यह उनका तीसरा हार्ट अटैक था। दो अटैक उन्हें 25 और 28 वर्ष की उम्र में ही आ चुके थे।
बाबूजी स्वभाव से जितने शांतिप्रिय थे, उतने ही शांतिपूर्ण ढंग से इस नश्वर संसार को अलविदा कह गए। कहीं कोई हलचल नहीं, कोई आभास नहीं दिया। उनके इस तरह चुपचाप हम लोगों को अकेला छोड़, अचानक चले जाने से मेरा घर संत बिना सूना मंदिर हो गया। मेरी दिनचर्या बाबूजी के जगने के बाद से लेकर सोने तक उनके इर्द-गिर्द ही रहती। मुझे 30 वर्षों तक उनका सानिध्य एवं सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लिखने के लिए उन पर बहुत कुछ है जो जारी है, विशाल समुद्र की तरह।
(अमरकांत जी की पुत्रवधू)
विज्ञापन
लेखक से दोस्ती
लेखक की दोस्ती के संबंध में कुछ लिखने से पहले यह बताना दिलचस्प है कि एक पराठानुमा पकवान का नाम भी ‘दोस्ती’ है। गूंधे हुए आटे की दो सुडौल लोइयों को थोड़ा-थोड़ा बेलने के बाद दोनों ओर घी लगाकर आपस में जोड़ दिया जाता है और अन्तत: पूरा तवे पर बेलकर तवे पर हल्केघी या तेल से सेंक लिया जाता है। मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि मेरे घर में सेवई बनाने का जब प्रोग्राम बनता था तो मां अनिवार्य रूप से ‘दोस्ती’ ही क्यों पकाती थीं। वैसे खाद्य वस्तुओं केभी दोस्त तो होते ही हैं, जैसे ‘खिचड़ी के चार यार’
विज्ञापन
इंसानी और सामाजिक जरूरतों की वजह से लेखकों की भी दोस्ती जुड़ती है, और समय के चाक पर घूमती हुई भिन्न आकार, रूप, रंग धारण कर लेती है। समय ही दोस्तियों को बेलता, सेंकता और पकाता है और समय ही इनको खा भी लेता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि व्यक्तिवादी लोगों की दोस्ती के भी किस्से मशहूर हैं। रेशम के पतले धागे से भी कोमल है दोस्ती, लेकिन कभी-कभी जूट के रस्से से भी अधिक मजबूत। शायद सबसे कमजोर होती है नादानी, निजी महत्वाकांक्षा, अहंकार और लापरवाही और स्वार्थ के घी-तेल से सेंकी हुई दोस्ती। संक्षेप में, चावल की जातियों की तरह दोस्ती की किस्में भी अनंत हैं।
विज्ञापन
लेखकों की दोस्ती की इस दुनिया से अलग या ऊपर नहीं है। अमूमन दो लेखकों या दो लेखिकाओं की दोस्ती परिस्थिति विशेष, निज की जरूरत, आत्मपरक उत्साह, हवाई भावना व महत्वाकांक्षा पर आधारित होने के कारण जमीनी, ठोस और स्थिर नहीं होती। सिद्धांत पर आधारित दोस्तियों को मजबूत कहा जाता है, इसमें सच्चाई तो है, लेकिन सिद्धांत जिस तरह जल्दी-जल्दी छोड़े और तोड़े जाते हैं, उसी तरह सैद्धांतिक दोस्तियां टूट जाती हैं और कभी-कभी खतरनाक भी हो जाती है। कुछ लोग कहते हैं कि एक लेखक हवा से प्यार करता है और हवा से लड़ता भी है और कभी-कभी वह दृश्य भी देखने में आता है, जब कोई अंधा कुत्ता तेज वाताश से ही आशंकित होकर भौकने लगता है। जब मैं 1951 में आगरा से इलाहाबाद आया तो यहां के वातावरण में कई लेखकीय दोस्तियों की मिश्रित गंध व्याप्त थी।
चिरनिद्रा में सो गए बाबू जी
0 रीता वर्मा
आज से पूरे दो वर्ष पहले, 17 फरवरी 2014 की सुबह एक अजीब सी ठंड। साढ़े नौ बजे ही बाबूजी सोकर उठ जाते हैं। आमतौर पर ठंड के दिनों में दस-ग्यारह से पहले नहीं उठते थे।
उस वक्त मैं स्नान की तैयारी में थी। मुझे देखकर उन्होंने पूछा- नहाने जा रही हो क्या, मैंने हामी भरी और बोली अगर आपको जाना है तो होे लें, मैं उसके बाद नहा लूंगी। पहले कहा- नहा लो, फिर बोले रुको मैं आता हूं। मैं अंदर बिस्तर के करीब बैठ गई। वे अंदर गए, दरवाजा सिर्फ सटा दिया जाता है। अंदर से कुंडी बंद नहीं दिया जाता था।
स्नान की बाल्टी में पानी गिर रहा था, टायलेट के नल का पानी तेज रफ्तार से गिर रहा था। जब कुछ देर हुई तो मैं घबराई। आख्रिर इतनी देर तक ठंड में क्या कर रहे हैं। दरवाजा खोलने की कोशिश की। अंदर की स्थिति देखकर मैं दंग रह गई। वह मुंह के बल गिरे हुए थे। तब मैंने सबको आवाज लगाई। मैं, पति अरविंद बिंदु और मेरा बड़ा बेटा निखिल तीनों उन्हें उठाकर बिस्तर पर लेटाते हैं। अरविंद जी और निखिल उनके ठंडे हो चुके हाथ-पैर को गर्म करने की कोशिश में मसाज करते हैं, मैं उनके गाल और चेहरे को थपथपा कर कानों में बाबूजी-बाबूजी आंखें खोलिए कहकर उन्हें जगाने का प्रयास करती हूं। आंखें अंतिम बार फड़फड़ाईं और चेहरा मेरे हाथों में एक ओर लटक गया। पानी की कुछ बूंदे मुंह से निकलकर मेरी हथेली में फैल गईं।
डॉक्टर को तुरंत बुलाया गया, परीक्षण के बाद पता चला कि गंभीर हार्ट अटैक आया था, जिससे हार्ट फेल हो गया। यह उनका तीसरा हार्ट अटैक था। दो अटैक उन्हें 25 और 28 वर्ष की उम्र में ही आ चुके थे।
बाबूजी स्वभाव से जितने शांतिप्रिय थे, उतने ही शांतिपूर्ण ढंग से इस नश्वर संसार को अलविदा कह गए। कहीं कोई हलचल नहीं, कोई आभास नहीं दिया। उनके इस तरह चुपचाप हम लोगों को अकेला छोड़, अचानक चले जाने से मेरा घर संत बिना सूना मंदिर हो गया। मेरी दिनचर्या बाबूजी के जगने के बाद से लेकर सोने तक उनके इर्द-गिर्द ही रहती। मुझे 30 वर्षों तक उनका सानिध्य एवं सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लिखने के लिए उन पर बहुत कुछ है जो जारी है, विशाल समुद्र की तरह।
(अमरकांत जी की पुत्रवधू)