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करोड़ों लगाए, अब कमाने की बारी
अमित सरन, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Thu, 11 Feb 2016 01:55 AM IST
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कहने को पंचायत चुनाव अब पांच साल बाद होंगे लेकिन उठापटक का दौर अभी थमने वाला नहीं। कब किसकी कुर्सी छिन जाए, भरोसा नहीं। ऐसे में पैसे के बल पर मलाईदार पद हथियाने वालों को अब पैसा डूबने की चिंता खाए जा रही है। इन परिस्थितियों में अगले एक साल तक तक काम कम और लूटखसोट ज्यादा हो तो हैरत की बात नहीं।
जिला पंचायत और ब्लॉकों में बनी सरकार का साल भर बाद क्या होगा, यह आगामी विधानसभा चुनाव के परिणाम तय करेंगे। अगर 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश में सत्ता परिवर्तन होता है तो जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुखों की कुर्सी भी खतरे में पड़ जाएगी। सत्ता के साथ पंचायत के मुखिया के चेहरे भी बदल जाते हैं, ऐसे उदाहरणों की भरमार है। प्रदेश में सपा से पहले बसपा का शासनकाल था तो जिला पंचायत से लेकर ब्लॉकों तक की कमान बसपा नेताओं के हाथ में थी। सत्ता बदली तो नियम-कानून खंगाले जाने लगे। अविश्वास प्रस्ताव की आड़ में बसपा को जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी गंवानी पड़ी। कई ब्लॉकों में भी प्रमुख पद पर सपा नेताओं का कब्जा हो गया।
सूत्रों के मुताबिक ब्लॉक प्रमुख के चुनाव में वोट के लिए एक-एक क्षेत्र पंचायत सदस्य को दो से तीन लाख रुपये तक का ऑफर दिया गया। यानी जीत के लिए अगर 50 वोटों की भी जरूरत थी। प्रत्याशियों ने इसके लिए एक से डेढ़ करोड़ रुपचे खर्च कर दिए। दूसरे प्रत्याशियों को बैठाने या नाम वापस लेने के लिए तीन से पांच लाख रुपये दिए गए। निरक्षर वोटरों की मदद के लिए बनाए गए सहायकों को भी खुश करना था और अफसरों को भी इस बात के लिए तैयार करना था कि वे सहायक नियुक्त करने में आनाकानी न करें। यह काम भी बिना खर्च किए पूरा नहीं होने वाला।
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पद हथियाने की मशक्कत में खर्च लाखों से बढ़कर करोड़ों रुपये तक पहुंच गया। ऐसे में कोई भी प्रत्याशी अपनी जीत जाया नहीं होने देगा और न ही नुकसान उठाएगा। साल भर क्या होगा, भरोसा नहीं। इन परिस्थितियों में लूटखसोट के बिना काम नहीं बनने वाला। बीती पंचायत में घपलों, घोटालों के मामलों में दर्जनों प्रधानों के खिलाफ कार्रवाई हुई, उनके अधिकार सीज कर दिए गए, रिपोर्ट दर्ज कराई गई, कई ब्लॉक प्रमुखों के खिलाफ जांच हुई। इस बार भी संकेत यही मिल रहे हैं कि लूटखसोट का सिलसिला थमने वाला नहीं।
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जिला पंचायत और ब्लॉकों में बनी सरकार का साल भर बाद क्या होगा, यह आगामी विधानसभा चुनाव के परिणाम तय करेंगे। अगर 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश में सत्ता परिवर्तन होता है तो जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुखों की कुर्सी भी खतरे में पड़ जाएगी। सत्ता के साथ पंचायत के मुखिया के चेहरे भी बदल जाते हैं, ऐसे उदाहरणों की भरमार है। प्रदेश में सपा से पहले बसपा का शासनकाल था तो जिला पंचायत से लेकर ब्लॉकों तक की कमान बसपा नेताओं के हाथ में थी। सत्ता बदली तो नियम-कानून खंगाले जाने लगे। अविश्वास प्रस्ताव की आड़ में बसपा को जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी गंवानी पड़ी। कई ब्लॉकों में भी प्रमुख पद पर सपा नेताओं का कब्जा हो गया।
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सूत्रों के मुताबिक ब्लॉक प्रमुख के चुनाव में वोट के लिए एक-एक क्षेत्र पंचायत सदस्य को दो से तीन लाख रुपये तक का ऑफर दिया गया। यानी जीत के लिए अगर 50 वोटों की भी जरूरत थी। प्रत्याशियों ने इसके लिए एक से डेढ़ करोड़ रुपचे खर्च कर दिए। दूसरे प्रत्याशियों को बैठाने या नाम वापस लेने के लिए तीन से पांच लाख रुपये दिए गए। निरक्षर वोटरों की मदद के लिए बनाए गए सहायकों को भी खुश करना था और अफसरों को भी इस बात के लिए तैयार करना था कि वे सहायक नियुक्त करने में आनाकानी न करें। यह काम भी बिना खर्च किए पूरा नहीं होने वाला।
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पद हथियाने की मशक्कत में खर्च लाखों से बढ़कर करोड़ों रुपये तक पहुंच गया। ऐसे में कोई भी प्रत्याशी अपनी जीत जाया नहीं होने देगा और न ही नुकसान उठाएगा। साल भर क्या होगा, भरोसा नहीं। इन परिस्थितियों में लूटखसोट के बिना काम नहीं बनने वाला। बीती पंचायत में घपलों, घोटालों के मामलों में दर्जनों प्रधानों के खिलाफ कार्रवाई हुई, उनके अधिकार सीज कर दिए गए, रिपोर्ट दर्ज कराई गई, कई ब्लॉक प्रमुखों के खिलाफ जांच हुई। इस बार भी संकेत यही मिल रहे हैं कि लूटखसोट का सिलसिला थमने वाला नहीं।