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कॅरियर के तनाव ने दे दिया दर्द, बीमारियां
अविनाशी श्रीवास्तव. अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद
Updated Wed, 10 Feb 2016 01:02 AM IST
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काउंसलर के साथ मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों के यहां किशोर एवं युवाओं की कतार लंबी हो गई है। शोध परिणामों में लगातार ऐसी बातें सामने आ रही हैं कि सपनों का बोझ कम नहीं किया गया तो समस्या और गंभीर होगी। अच्छे कॅरियर की चाहत ने शरीर के जोड़ों को भी हिला दिया है। बचपन में ही ऊंचे सपने और उसे पूरा करने के दबाव की वजह से आत्महत्या जैसी घटनाएं बढ़ी हैं।
अवसाद और तनाव खुद में एक बीमारी है, जिसकी वजह से हो रहे रासायनिक और हार्मोनल बदलाव ने शरीर को कई अन्य बीमारियाें का घर भी बना दिया है। कम उम्र में ही दिल और शुगर के मरीजों की संख्या बढ़ गई है। किशोरावस्था में त्वचा संबंधी रोगों सहित बाल झड़ने एवं सफेद होने की शिकायतें भी आम हैं। चिकित्सक तनाव से शरीर में होने वाले बदलावों को इसकी बड़ी वजह मान रहे हैं। उनका कहना है कि अवसादग्रस्त युवाओं की चाहतें तो शून्य हो ही जाती हैं, उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी जवाब दे जाती है।
मोतीलाल नेहरू मेडिकल कालेज के डॉ.अनुराग वर्मा कहते हैं, अवसाद और तनाव में कॉर्टिसेल बढ़ जाते हैं। शरीर में नुकसान पहुंचाने वाली कोशिकाएं लगातार बनती है लेकिन शरीर में उन्हें नष्ट करने की क्षमता होती है। कॉर्टिसेल इसी क्षमता को कम कर देता है। रासायनिक और हार्मोनल बदलावों से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता घटने लगती है। शोध में मिला कि तनाव का हार्टअटैक और मधुमेह में सीधा संबंध है। तनाव में इन बीमारियों का खतरा दोगुना बढ़ जाता हैं। यही कारण है कि अब हार्टअटैक और शुगर के किशोर मरीज बढ़ गए हैं जबकि, पहले 35 वर्ष से अधिक उम्र के मरीज आते थे।
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जाने-माने त्वचा रोग विशेषज्ञ उप जिला कुष्ठ अधिकारी डॉ. शक्ति बसु के मुताबिक तनाव की वजह से शरीर में होने वाले रासायनिक बदलाव होते हैं। इससे लाइकेन सिम्पलेक्स क्रॉनिकस बीमारी हो जाती है। जिससे जगह-जगह खुजली शुरू हो जाती है, चकत्ते पड़ जाते हैं। खुजली से त्वचा मोटी पड़ जाती है। तनाव की वजह से लाइकेन प्लानस, सोरयाटिस आदि का खतरा भी बढ़ जाता है। इसमें गर्दन के पीछे खुजली, त्वचा में रूखापन होना, त्वचा के सामान्य स्वास्थ्य में गिरावट जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। इसके अलावा बाल झड़ने, सफेद होने के साथ सिर में खुजली, रूसी और पपड़ी आदि की शिकायतें भी बढ़ जाती हैं। डॉ.बसु का कहना है कि अवसाद में गया युवा खुद शरीर का ध्यान नहीं रखता। इससे भी उसे त्वचा तथा अन्य कई बीमारियां घेर लेती हैं।
दो स्तरों पर इलाज की जरूरत
अवसाद तथा इसकी वजह से अन्य बीमारियों की चपेट में आए मरीजों को दो स्तरों पर इलाज की जरूरत होती है। एक बीमारी के लक्षण के अनुसार इलाज, दूसरा मानसिक इलाज। डॉ.अनुराग के मुताबिक मानसिक अवसाद के लिए काउंसलिंग की जाती है लेकिन कभी-कभी इससे बात नहीं बनती। ऐसे में दवाइयों का सहारा लिया जाता है। अब बिना साइड इफेक्ट की दवाइयां भी आने लगती हैं। आम धारणा है कि अवसाद की दवाइयों से नींद आने या शरीर ढीला पड़ने की शिकायत बढ़ जाती है जोकि सच नहीं है। ऐसी दवाइयां आने लगी हैं जिनका कोई नकारात्मक असर नहीं होता। काउंसलिंग में मरीज के भीतर बैठी नकारात्मक सोच को बाहर निकालने और दुनिया को नए नजरिए से दिखाने की कोशिश की जाती है। परिवार का माहौल भी इसमें काफी मददगार होता है।
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अवसाद और तनाव खुद में एक बीमारी है, जिसकी वजह से हो रहे रासायनिक और हार्मोनल बदलाव ने शरीर को कई अन्य बीमारियाें का घर भी बना दिया है। कम उम्र में ही दिल और शुगर के मरीजों की संख्या बढ़ गई है। किशोरावस्था में त्वचा संबंधी रोगों सहित बाल झड़ने एवं सफेद होने की शिकायतें भी आम हैं। चिकित्सक तनाव से शरीर में होने वाले बदलावों को इसकी बड़ी वजह मान रहे हैं। उनका कहना है कि अवसादग्रस्त युवाओं की चाहतें तो शून्य हो ही जाती हैं, उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी जवाब दे जाती है।
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मोतीलाल नेहरू मेडिकल कालेज के डॉ.अनुराग वर्मा कहते हैं, अवसाद और तनाव में कॉर्टिसेल बढ़ जाते हैं। शरीर में नुकसान पहुंचाने वाली कोशिकाएं लगातार बनती है लेकिन शरीर में उन्हें नष्ट करने की क्षमता होती है। कॉर्टिसेल इसी क्षमता को कम कर देता है। रासायनिक और हार्मोनल बदलावों से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता घटने लगती है। शोध में मिला कि तनाव का हार्टअटैक और मधुमेह में सीधा संबंध है। तनाव में इन बीमारियों का खतरा दोगुना बढ़ जाता हैं। यही कारण है कि अब हार्टअटैक और शुगर के किशोर मरीज बढ़ गए हैं जबकि, पहले 35 वर्ष से अधिक उम्र के मरीज आते थे।
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जाने-माने त्वचा रोग विशेषज्ञ उप जिला कुष्ठ अधिकारी डॉ. शक्ति बसु के मुताबिक तनाव की वजह से शरीर में होने वाले रासायनिक बदलाव होते हैं। इससे लाइकेन सिम्पलेक्स क्रॉनिकस बीमारी हो जाती है। जिससे जगह-जगह खुजली शुरू हो जाती है, चकत्ते पड़ जाते हैं। खुजली से त्वचा मोटी पड़ जाती है। तनाव की वजह से लाइकेन प्लानस, सोरयाटिस आदि का खतरा भी बढ़ जाता है। इसमें गर्दन के पीछे खुजली, त्वचा में रूखापन होना, त्वचा के सामान्य स्वास्थ्य में गिरावट जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। इसके अलावा बाल झड़ने, सफेद होने के साथ सिर में खुजली, रूसी और पपड़ी आदि की शिकायतें भी बढ़ जाती हैं। डॉ.बसु का कहना है कि अवसाद में गया युवा खुद शरीर का ध्यान नहीं रखता। इससे भी उसे त्वचा तथा अन्य कई बीमारियां घेर लेती हैं।
दो स्तरों पर इलाज की जरूरत
अवसाद तथा इसकी वजह से अन्य बीमारियों की चपेट में आए मरीजों को दो स्तरों पर इलाज की जरूरत होती है। एक बीमारी के लक्षण के अनुसार इलाज, दूसरा मानसिक इलाज। डॉ.अनुराग के मुताबिक मानसिक अवसाद के लिए काउंसलिंग की जाती है लेकिन कभी-कभी इससे बात नहीं बनती। ऐसे में दवाइयों का सहारा लिया जाता है। अब बिना साइड इफेक्ट की दवाइयां भी आने लगती हैं। आम धारणा है कि अवसाद की दवाइयों से नींद आने या शरीर ढीला पड़ने की शिकायत बढ़ जाती है जोकि सच नहीं है। ऐसी दवाइयां आने लगी हैं जिनका कोई नकारात्मक असर नहीं होता। काउंसलिंग में मरीज के भीतर बैठी नकारात्मक सोच को बाहर निकालने और दुनिया को नए नजरिए से दिखाने की कोशिश की जाती है। परिवार का माहौल भी इसमें काफी मददगार होता है।