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बांदा जेल में बंदियों से अमानवीय बर्ताव
अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद
Updated Sat, 30 Jan 2016 12:04 AM IST
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बांदा की जिला जेल में निरुद्ध बंदियों से जेल अधिकारियों द्वारा अमानवीय बर्ताव करने का आरोप है। जेल की दशा पर सीजेएम बांदा की रिपोर्ट को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका पर मुख्य न्यायमूर्ति डॉ. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने जिला जज बांदा को निर्देश दिया है कि वह जेल का निरीक्षण कर चार सप्ताह में अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट को दें। जेल अधीक्षक को भी निर्देश दिया है कि वह जिला जज को निरीक्षण में सहयोग प्रदान करें।
पीयूसीएल की ओर से दाखिल याचिका में सीजेएम बांदा की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जेल में रह रहे बंदियों का उत्पीड़न हो रहा है। उनसे दुर्व्यवहार होता है और बंदियों के मानवाधिकारों का हनन किया जा रहा है। एक कैदी को आपसी झगड़े के बाद तन्हाई में रख दिया गया। इसके बाद उसे सामान्य बैरक में नहीं लाया जा रहा है। इसी प्रकार कैदी सोहन लाल को टीबी की बीमारी होने के कारण एकांत में रखा गया है। उसे अधपका भोजन दिया जाता है। बीमार और घायल कैदियों से भी जबरदस्ती काम करवाया जाता है। जेल कर्मी बंदियों को गुटका, तम्बाकू, बीड़ी, माचिस और नशे के दूसरे सामान बेचते हैं।
सरकार की ओर से बचाव में दलील दी गई कि जुलाई माह में हुए निरीक्षण सबकुछ ठीक पाया गया था। उसी मजिस्ट्रेट द्वारा अगस्त और सितंबर माह में जांच गड़बड़ी की रिपोर्ट दे दी गई। दिसंबर 2015 में डीएम, एसएसपी और जिला जज ने संयुक्त रूप से निरीक्षण किया। इसमें भी सबकुछ ठीक पाया गया है। रिपोर्ट की विश्वसनीयता संदिग्ध है। कोर्ट ने एक माह में जिला जज को रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है।
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पीयूसीएल की ओर से दाखिल याचिका में सीजेएम बांदा की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जेल में रह रहे बंदियों का उत्पीड़न हो रहा है। उनसे दुर्व्यवहार होता है और बंदियों के मानवाधिकारों का हनन किया जा रहा है। एक कैदी को आपसी झगड़े के बाद तन्हाई में रख दिया गया। इसके बाद उसे सामान्य बैरक में नहीं लाया जा रहा है। इसी प्रकार कैदी सोहन लाल को टीबी की बीमारी होने के कारण एकांत में रखा गया है। उसे अधपका भोजन दिया जाता है। बीमार और घायल कैदियों से भी जबरदस्ती काम करवाया जाता है। जेल कर्मी बंदियों को गुटका, तम्बाकू, बीड़ी, माचिस और नशे के दूसरे सामान बेचते हैं।
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सरकार की ओर से बचाव में दलील दी गई कि जुलाई माह में हुए निरीक्षण सबकुछ ठीक पाया गया था। उसी मजिस्ट्रेट द्वारा अगस्त और सितंबर माह में जांच गड़बड़ी की रिपोर्ट दे दी गई। दिसंबर 2015 में डीएम, एसएसपी और जिला जज ने संयुक्त रूप से निरीक्षण किया। इसमें भी सबकुछ ठीक पाया गया है। रिपोर्ट की विश्वसनीयता संदिग्ध है। कोर्ट ने एक माह में जिला जज को रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है।
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