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माघ मेला खतम, अब सफाई बजट होगा हजम!
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Thu, 25 Feb 2016 12:41 AM IST
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माघ मास समाप्त होने के साथ ही मेले का तकरीबन समापन हो गया है। कल्पवासी अपने घरों को लौट गए हैं। वहीं, साधु-संन्यासियों के भी लौटने का सिलसिला शुरू हो गया है। मेले के लिए 28 करोड़ का बजट जारी हुआ। बाद में सवा करोड़ का अतिरिक्त बजट भी जारी किया गया। करोड़ों की लागत से कराए गए अस्थायी कार्यों का मेला पूरा होने के बाद नामोनिशान मिट जाएगा।
इसके साथ खर्च किए गए करोड़ों रुपये भी मेले के साथ खत्म हो जाएंगे। हालांकि इस बार प्रशासन ने मेले के बाद भी दस लाख रुपये का अतिरिक्त बजट आवंटित किया है। यह बजट साफ-सफाई के नाम पर आवंटित किया गया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि साफ-सफाई की आड़ में कहीं यह बजट भी हजम न कर लिया जाए।
मेला तो हर साल होता है और मेले के बाद सफाई भी कराई जाती है। ऐसे में इस बार प्रशासन ऐसी कौन सी विशेष सफाई कराने जा रहा है, जिसके लिए अलग से दस लाख रुपये आवंटित किए गए हैं। सवाल उठने लाजिमी भी हैं, क्योंकि साफ-सफाई के लिए प्रशासन के पास मशीनरी पहले से मौजूद है। सफाई कर्मियों को साल भर नियमित रूप से वेतन दिया जाता है। ऐसे में दस लाख रुपये आखिर कहां खर्च होंगे।
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मेला क्षेत्र से सटे दारागंज इलाके में रहने वाले राजेश पाठक, शोभित और वीरेंद्र कुमार बताते हैं कि हर साल मेला समाप्त होने के बाद कड़ी धूप में नमी गायब हो जाती है। कुछ दिनों के बाद दुर्गंध भी खत्म हो जाती है। कूड़े पर रेत डालकर उसे दबा दिया जाता है। कुछ माह बाद बाढ़ आती है और वह अपने साथ रेत में दबी गंदगी बहा ले जाती है। ऐसे में मेले के बाद सफाई के नाम पर बजट के उपयोग से ज्यादा दुरुपयोग की आशंका है।
मेले में गंदगी होने से मच्छर, मक्खियों ने पांव पसार लिए हैं। दारागंज, अल्लापुर, बैरहना, कीडगंज, झूंसी, अरैल(नैनी) सहित आसपास इलाकों में संक्रामक बीमारियों का खतरा भी फैलने लगा है। मेले में गंदगी से बदबू आ रही है। कई स्थान तो ऐसे हैं कि उधर से गुजरना भी मुश्किल है। दारागंज के रमेश पाठक, अल्लापुर के शिवेश का कहना है कि बेहतर होता कि प्रशासन मेला क्षेत्र के आसपास के इलाकों में रहने वालों को बीमारी से बचाने के लिए बजट आवंटित कराता। वहां दवाओं का छिड़काव कराता और स्वास्थ्य शिविर लगाता।
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इसके साथ खर्च किए गए करोड़ों रुपये भी मेले के साथ खत्म हो जाएंगे। हालांकि इस बार प्रशासन ने मेले के बाद भी दस लाख रुपये का अतिरिक्त बजट आवंटित किया है। यह बजट साफ-सफाई के नाम पर आवंटित किया गया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि साफ-सफाई की आड़ में कहीं यह बजट भी हजम न कर लिया जाए।
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मेला तो हर साल होता है और मेले के बाद सफाई भी कराई जाती है। ऐसे में इस बार प्रशासन ऐसी कौन सी विशेष सफाई कराने जा रहा है, जिसके लिए अलग से दस लाख रुपये आवंटित किए गए हैं। सवाल उठने लाजिमी भी हैं, क्योंकि साफ-सफाई के लिए प्रशासन के पास मशीनरी पहले से मौजूद है। सफाई कर्मियों को साल भर नियमित रूप से वेतन दिया जाता है। ऐसे में दस लाख रुपये आखिर कहां खर्च होंगे।
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मेला क्षेत्र से सटे दारागंज इलाके में रहने वाले राजेश पाठक, शोभित और वीरेंद्र कुमार बताते हैं कि हर साल मेला समाप्त होने के बाद कड़ी धूप में नमी गायब हो जाती है। कुछ दिनों के बाद दुर्गंध भी खत्म हो जाती है। कूड़े पर रेत डालकर उसे दबा दिया जाता है। कुछ माह बाद बाढ़ आती है और वह अपने साथ रेत में दबी गंदगी बहा ले जाती है। ऐसे में मेले के बाद सफाई के नाम पर बजट के उपयोग से ज्यादा दुरुपयोग की आशंका है।
मेले में गंदगी होने से मच्छर, मक्खियों ने पांव पसार लिए हैं। दारागंज, अल्लापुर, बैरहना, कीडगंज, झूंसी, अरैल(नैनी) सहित आसपास इलाकों में संक्रामक बीमारियों का खतरा भी फैलने लगा है। मेले में गंदगी से बदबू आ रही है। कई स्थान तो ऐसे हैं कि उधर से गुजरना भी मुश्किल है। दारागंज के रमेश पाठक, अल्लापुर के शिवेश का कहना है कि बेहतर होता कि प्रशासन मेला क्षेत्र के आसपास के इलाकों में रहने वालों को बीमारी से बचाने के लिए बजट आवंटित कराता। वहां दवाओं का छिड़काव कराता और स्वास्थ्य शिविर लगाता।