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UP: 'बीवी और बच्चों को पालने की हैसियत नहीं तो न करें शादी', हाईकोर्ट ने खारिज की दलीलें; ये बात भी कही
Tue, 21 Apr 2026 03:02 PM IST
Sharukh Khan
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: Sharukh Khan
Updated Tue, 21 Apr 2026 03:02 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण के आदेश को चुनौती देने वाली पति की अपील खारिज कर दी है। साथ ही कहा है कि बीवी और बच्चों को पालने की हैसियत नहीं तो शादी न करें।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बीवी और बच्चों को पालने की हैसियत नहीं है तो शादी नहीं करनी चाहिए। शादी के बाद आर्थिक तंगी का उलाहना देकर अपनी जिम्मेदारी से भागा नहीं जा सकता।
इस तल्ख टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने पति की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने प्रयागराज के परिवार न्यायालय की ओर से पत्नी व बच्चों के पक्ष में चार हजार रुपये प्रति महीने भरण-पोषण के आदेश को चुनौती दी थी।
पति ने दलील दी कि वह मजदूर है। उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह चार हजार रुपये महीने भरण-पोषण दे सके। साथ ही एक हलफनामा पेश कर पत्नी पर अवैध रिश्ते का भी आरोप लगाया। हालांकि, कोर्ट ने पति की सभी दलीलें सिरे से खारिज कर दीं।
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कोर्ट ने पाया कि कम पढ़ी लिखी पत्नी से पति ने धोखे से हलफनामा पर हस्ताक्षर भी लिया था। कोर्ट ने पति की अपील खारिज कर कहा कि आज के दौर में महंगाई और जीवनयापन की लागत को देखते हुए चार हजार की राशि किसी भी नजरिये से अत्यधिक नहीं है। मुकदमेबाजी के दौरान आर्थिक तंगी का बहाना बनाकर पत्नियों को उनके हक से वंचित नहीं किया जा सकता।
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इस तल्ख टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने पति की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने प्रयागराज के परिवार न्यायालय की ओर से पत्नी व बच्चों के पक्ष में चार हजार रुपये प्रति महीने भरण-पोषण के आदेश को चुनौती दी थी।
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पति ने दलील दी कि वह मजदूर है। उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह चार हजार रुपये महीने भरण-पोषण दे सके। साथ ही एक हलफनामा पेश कर पत्नी पर अवैध रिश्ते का भी आरोप लगाया। हालांकि, कोर्ट ने पति की सभी दलीलें सिरे से खारिज कर दीं।
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कोर्ट ने पाया कि कम पढ़ी लिखी पत्नी से पति ने धोखे से हलफनामा पर हस्ताक्षर भी लिया था। कोर्ट ने पति की अपील खारिज कर कहा कि आज के दौर में महंगाई और जीवनयापन की लागत को देखते हुए चार हजार की राशि किसी भी नजरिये से अत्यधिक नहीं है। मुकदमेबाजी के दौरान आर्थिक तंगी का बहाना बनाकर पत्नियों को उनके हक से वंचित नहीं किया जा सकता।