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UP: इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला- 18 की उम्र पूरी करने पर बेटा पिता से भरण-पोषण का हकदार नहीं, यह भी कहा
Wed, 21 Jan 2026 01:23 AM IST
दुष्यंत शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 21 Jan 2026 01:23 AM IST
सार
कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद पाया कि बेटा बालिग हो चुका है। इस आधार पर कोर्ट ने उसके संबंध में जारी भरण-पोषण का आदेश रद्द कर दिया।
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Allahabad High Court
- फोटो : एएनआई
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बेटे के बालिग (18 वर्ष) होने पर पिता से भरण-पोषण का अधिकार खत्म हो जाता है। कोर्ट ने इस आधार पर बेटे के पक्ष में परिवार न्यायालय की ओर से जारी भरण-पोषण के आदेश को रद्द कर दिया। वहीं, पत्नी के लिए बढ़ाई गई भरण-पोषण राशि को उचित ठहराते हुए बरकरार रखा। यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने मोअज्जम अली की ओर से दायर याचिका पर दिया है।
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याची पति ने परिवार न्यायालय भदोही के चार अगस्त 2023 के आदेश से पत्नी और बेटे के पक्ष में भरण-पोषण की राशि में की गई बढ़ोतरी को हाईकोर्ट में दी चुनौती दी थी। याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि आवेदक को परिवार न्यायालय से कोई नोटिस या समन कानूनी प्रक्रिया के अनुसार प्राप्त नहीं हुआ था। यह भी दलील दी कि बेटा जन्म प्रमाणपत्र के अनुसार पांच जनवरी 2023 को ही वयस्क हो चुका था। अतः उसके लिए भरण-पोषण का आदेश अवैध है। याची पर पांच बच्चों की जिम्मेदारी है। ऐसे में गुजारा-भत्ता राशि पत्नी के लिए 1,000 से बढ़ाकर 6,000 और बेटे के लिए 500 से अब 4,000 रुपये देना उसकी क्षमता से बाहर है।
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कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद पाया कि बेटा बालिग हो चुका है। इस आधार पर कोर्ट ने उसके संबंध में जारी भरण-पोषण का आदेश रद्द कर दिया। हालांकि, पत्नी के लिए बढ़ाई गई राशि 6,000 रुपये को कोर्ट ने आज के समय के अनुसार अत्यधिक नहीं माना। कहा कि पति ने अपनी आय के स्रोतों के संबंध में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किए हैं, जिससे उसकी असमर्थता सिद्ध हो सके। कोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मामले का निस्तारण कर दिया।
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आय का विवरण छिपाने पर पति को नहीं मिली राहत, गुजारा-भत्ता देने का आदेश बरकरार
एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पति भरण-पोषण के मामले में अपनी आय और संपत्ति का हलफनामा दाखिल करने में विफल रहता है तो अदालत उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकती है। यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति गरिमा प्रशांत की एकल पीठ ने परिवार न्यायालय की ओर से पत्नी के पक्ष में दिए गए गुजारा-भत्ता के आदेश को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी।
पीलीभीत निवासी श्याम लाल की पत्नी ने परिवार न्यायालय में गुजारा-भत्ता की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। 14 जून 2020 को उनका विवाह श्याम लाल के साथ हुआ था। आरोप लगाया कि दहेज की मांग के कारण उन्हें 14 मार्च 2022 को ससुराल से निकाल दिया गया था। तब से वह माता-पिता के साथ रह रही हैं। उन्हें कोई भरण-पोषण नहीं दिया जा रहा था। परिवार न्यायालय ने 12 अगस्त 2024 को पति को 3,500 रुपये प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। इस फैसले को पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।