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Allahabad High Court: एसआई को तलब करने के बजाए मुकदमा खारिज करने का आदेश रद्द
Sun, 27 Sep 2020 12:01 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Sun, 27 Sep 2020 12:01 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिवक्ता द्वारा दाखिल परिवाद पर तलब किए दरोगा की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चत कराने के बजाए परिवाद ही खारिज करने पर नाराजगी जताते हुए सीजेएम मुरादाबाद का 13 अगस्त 2018 का आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह आदेश बताता है कि आरोपी दरोगा परिवाद के खिलाफ निगरानी खारिज होने और गैरजमानती वारंट जारी होने के बावजूद अदालत में हाजिर होने से बच गया। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि मजिस्ट्रेट ने उसकी कोर्ट में हाजिरी सुनिश्चत कराने के बजाए केस ही खारिज कर दिया।
मुरादाबाद के वकील राजबीर सिंह की निगरानी याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति डा. केजे ठाकर ने दिया है। कोर्ट ने एसपी मुरादाबाद को आदेश की प्रति भेजने का निर्देश देते हुए कहा है कि एसपी इस अदालत को बताएं कि मजिस्ट्रेट द्वारा दरोगा की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चत कराने के लिए उनको भेजे गए नोटिस पर उन्होंने ने क्या कार्रवाई की है। अदालत को कहना है कि एसपी ने दरोगा को संरक्षण दिया क्योंकि उन्होने मजिस्ट्रेट के नोटिस पर कोई कार्रवाई नहीं की।
वकील राजबीर सिंह ने सब इंस्पेक्टर जय भगवान के खिलाफ सीजेएम मुरादाबाद के समक्ष एक परिवाद दर्ज कराया था जिस पर सीजेएम ने चोरी, झूठे तथ्य प्रचारित करने आदि आरोपों में परिवाद पर सुनवाई करते हुए दरोगा ने समन भेजा। इस समन के खिलाफ दरोगा ने सेशन कोर्ट में निगरानी में दाखिल की जो खारिज हो गई। इसके बाद भी अदालत में बयान दर्ज कराने के लिए हाजिर नहीं हुए।
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सीजेएम ने गैरजमानती वारंट जारी करते हुए एसपी मुुरादाबाद को नोटिस भेज कर दरोगा की उपस्थिति सुनिश्चत कराने के लिए कहा। मगर इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस दौरान परिवादी वकील बीमार हो गए। मजिस्ट्रेट ने प्रोसेस फीस जमा न करने और परिवादी के हाजिर न होने के आधार पर परिवाद 13 अगस्त 2018 को खारिज कर दिया। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
कोर्ट ने निगरानी याचिका स्वीकार करते हुए मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत का कहना था कि मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी है कि कोई न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग न करने पाए, मगर इस मामले में साफ तौर पर न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किया गया है। एक बार जब कोर्ट फीस जमा हो गई तो समन तामील कराने की जिम्मेदारी पुलिस की है। इस स्टेज पर परिवादी के हाजिर होने की भी जरूरत नहीं थी।
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मुरादाबाद के वकील राजबीर सिंह की निगरानी याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति डा. केजे ठाकर ने दिया है। कोर्ट ने एसपी मुरादाबाद को आदेश की प्रति भेजने का निर्देश देते हुए कहा है कि एसपी इस अदालत को बताएं कि मजिस्ट्रेट द्वारा दरोगा की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चत कराने के लिए उनको भेजे गए नोटिस पर उन्होंने ने क्या कार्रवाई की है। अदालत को कहना है कि एसपी ने दरोगा को संरक्षण दिया क्योंकि उन्होने मजिस्ट्रेट के नोटिस पर कोई कार्रवाई नहीं की।
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वकील राजबीर सिंह ने सब इंस्पेक्टर जय भगवान के खिलाफ सीजेएम मुरादाबाद के समक्ष एक परिवाद दर्ज कराया था जिस पर सीजेएम ने चोरी, झूठे तथ्य प्रचारित करने आदि आरोपों में परिवाद पर सुनवाई करते हुए दरोगा ने समन भेजा। इस समन के खिलाफ दरोगा ने सेशन कोर्ट में निगरानी में दाखिल की जो खारिज हो गई। इसके बाद भी अदालत में बयान दर्ज कराने के लिए हाजिर नहीं हुए।
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सीजेएम ने गैरजमानती वारंट जारी करते हुए एसपी मुुरादाबाद को नोटिस भेज कर दरोगा की उपस्थिति सुनिश्चत कराने के लिए कहा। मगर इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस दौरान परिवादी वकील बीमार हो गए। मजिस्ट्रेट ने प्रोसेस फीस जमा न करने और परिवादी के हाजिर न होने के आधार पर परिवाद 13 अगस्त 2018 को खारिज कर दिया। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
कोर्ट ने निगरानी याचिका स्वीकार करते हुए मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत का कहना था कि मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी है कि कोई न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग न करने पाए, मगर इस मामले में साफ तौर पर न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किया गया है। एक बार जब कोर्ट फीस जमा हो गई तो समन तामील कराने की जिम्मेदारी पुलिस की है। इस स्टेज पर परिवादी के हाजिर होने की भी जरूरत नहीं थी।