इलाहाबाद हाईकोर्ट : अभियुक्त को सम्मन कोर्ट की असाधारण शक्ति, अदालतें सावधानी करें इस्तेमाल
यह आदेश न्यायमूर्ति आर एमएन मिश्र ने रेहान, फैजान,सर्फू, सलाउद्दीन व हिलाल की याचिका की सुनवाई करते हुए दिया है। याचिका पर वरिष्ठ अधिवक्ता डीएस मिश्र व सीके मिश्र ने बहस की। मालूम हो कि शिकायतकर्ता हत्या के चश्मदीद गवाह ने 17 जुलाई 17 को नामजद एफआईआर दर्ज कराई ।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी अभियुक्त को ट्रायल के लिए सम्मन करने की शक्ति कोर्ट की असाधारण शक्ति है। इसका इस्तेमाल सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा -319 में किसी अभियुक्त को सम्मन करना कोर्ट की विवेकाधीन शक्ति है। इसे मैकेनिकल तौर पर पारित नहीं किया जा सकता। बहुत जरूरी होने पर साक्ष्य की उपलब्धता पर ही किसी को अन्य अभियुक्तों के साथ विचारण के लिए सम्मन किया जाना चाहिए।
इसी के साथ कोर्ट ने मुरादाबाद के मुगलपुरा थाना क्षेत्र में 16 फरवरी 2017 को जहांगीर की गोली मारकर हुई हत्या के आरोपियों के साथ ट्रायल के लिए याचियों को जारी सम्मन के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका आंशिक रूप से स्वीकार कर ली है। कोर्ट ने तीन याचियों फैजान, सलाउद्दीन व हिलाल के खिलाफ जारी सम्मन रद कर दिया है, किंतु रेहान और सर्फू के खिलाफ जारी सम्मन पर हस्तक्षेप से इंकार कर दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति आर एमएन मिश्र ने रेहान, फैजान,सर्फू, सलाउद्दीन व हिलाल की याचिका की सुनवाई करते हुए दिया है। याचिका पर वरिष्ठ अधिवक्ता डीएस मिश्र व सीके मिश्र ने बहस की। मालूम हो कि शिकायतकर्ता हत्या के चश्मदीद गवाह ने 17 जुलाई 17 को नामजद एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस विवेचना में सीसीटीवी फुटेज व मोबाइल लोकेशन से भाड़े के अपराधियों द्वारा हत्या का खुलासा हुआ और दो अन्य अभियुक्तों को गिरफ्तार कर चार्जशीट दायर की गई। एफआईआर का कथन सही नहीं पाया गया।
ट्रायल के दौरान दाखिल धारा -319 की अर्जी पर कोर्ट ने एफआईआर के कथन व गवाहों के बयान के आधार पर याची नामजद अभियुक्तों को साथ में ट्रायल के लिए सम्मन किया। चश्मदीद बयान में कहा गया है कि बिजली की रोशनी में फायर करते नामजद अभियुक्तों को देखा है। जिसकी वैधता को चुनौती दी गई थी।
याची अधिवक्ता ने कई नजीरें पेश की और कहा कि बिना साक्ष्य के कोर्ट मैकेनिकल तरीके से किसी को सम्मन जारी नहीं कर सकती। याचीगण मृतक के नजदीकी संबंधी हैं। अभियोजन की ओर से अन्य चश्मदीद गवाहों का ट्रायल में परीक्षण नहीं कराया गया। एक मात्र चश्मदीद के बयान को साक्ष्यों का समर्थन नहीं है। इसलिए वह विश्वसनीय साक्ष्य नहीं है जिसके आधार पर सम्मन जारी किया जा सके।