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High Court : न्यायिक मजिस्ट्रेट को मैसेज भेज परेशान करने वाले वकील की जमानत निरस्त, मजिस्ट्रेट ने खुद की बहस

Mon, 20 Mar 2023 09:47 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 20 Mar 2023 09:47 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर की एक मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के साथ महाराजगंज में तैनाती के दौरान फेसबुक पर आपत्तिजनक संदेश लिखने व लगातार मैसेज भेजकर परेशान करने वाले वकील अभय प्रताप की जमानत निरस्त कर दी है और उसे अदालत में समर्पण करने का निर्देश दिया है।

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Allahabad High Court: Bail canceled for harassing lawyer by sending messages to Judicial Magistrate
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर की एक मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के साथ महाराजगंज में तैनाती के दौरान फेसबुक पर आपत्तिजनक संदेश लिखने व लगातार मैसेज भेजकर परेशान करने वाले वकील अभय प्रताप की जमानत निरस्त कर दी है और उसे अदालत में समर्पण करने का निर्देश दिया है। इतना ही नहीं कोर्ट ने न्यायिक अधिकारी को मानसिक प्रताड़ना देकर न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने के आरोपी वकील अभय प्रताप के खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्यवाही करने का भी आदेश दिया है।

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कोर्ट ने कहा कि आपत्तिजनक मैसेज भेजकर न्यायिक अधिकारी के मन में भय पैदा कर किया गया। इस स्थिति में कोई भी न्यायिक कार्य नहीं कर सकता। जीरो टालरेंस की नीति अपनाते हुए ऐसे मामले से सख्ती से निपटना चाहिए। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अर्जी पर दिया है।

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याची मजिस्ट्रेट ने खुद की बहस

मालूम हो कि महाराजगंज अदालत के वकील अभय प्रताप ने वहीं पर न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात याची के खिलाफ प्रेम दर्शाने जैसे तमाम आपत्तिजनक संदेश फेसबुक पर डाले और काफी परेशान किया तो याची ने कोतवाली में 11 नवंबर 22 को एफआईआर दर्ज कराई। उसे 23 नवंबर को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। किंतु सत्र अदालत ने 17 दिसंबर 22 को जमानत पर रिहा कर दिया। जिसे निरस्त करने के लिए याची मजिस्ट्रेट ने हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल कर स्वयं बहस की और कहा कि उसकी शादी में ऐसे संदेश खलल डाल कर उसके वैवाहिक जीवन को बर्बाद कर सकते हैं। इसलिए जमानत निरस्त की जाए।

निचली अदालत ने विवेक का सही इस्तेमाल नहीं किया

कोर्ट ने कहा यह सामान्य मामले से अलग मामला है। सत्र अदालत ने जमानत स्वीकार करते समय स्थिति का सही आकलन नहीं किया। न्यायिक विवेक का सही इस्तेमाल नहीं किया। अपराध में सात साल की सजा हो सकती है। एक न्यायिक अधिकारी को परेशान किया गया। भय पैदा किया। ऐसी स्थिति में किसी से न्यायिक कार्य करने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

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