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आखिर नीम का पेड़ ‘आजाद’
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 11 Aug 2017 02:05 AM IST
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इलाहाबाद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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अगस्त क्रांति दिवस के एक दिन बाद ही सही, प्रशासन चेता और चौक स्थित ऐतिहासिक नीम का पेड़ अतिक्रमण से आजाद हो गया। पेड़ से सटकर लगी पान की दुकान वहां से हटा दी गई। आमतौर पर दोपहर बारह बजे के बाद पान की दुकान खुलती है लेकिन बृहस्पतिवार को यह नौबत ही नहीं आई। प्रशासन की सख्ती के बाद पेड़ से सटी दुकान हटा दी गई। चाय की दुकान भी नीम के पेड़ के पास बने चबूतरे से हटाकर ठेले पर आ गई है। कभी शिलापट से सटाकर ही चायवाले ने छोटी से आलमारी रखी थी, जिस पर वह पानी और दूध उबालकर रखता था। इसी तरह पेड़ पर कील ठोंककर रस्सियां, प्लास्टिक की डोरियां भी लटकाई जाती रहीं।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की शहादत के साक्षी प्रतीकों में चौक स्थित नीम का पेड़ अहम है। कभी सात पेड़ों के समूह में से अब एक ही बचा है। 1857 की क्रांति को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने इन्हीं नीम के पेड़ों से आठ सौ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को फांसी पर लटका दिया था। चौक के व्यस्त बाजार का असर नीम के पेड़ पर भी पड़ा और चाय-पान, झोला-रस्सी आदि की दुकानों ने इसे घेर लिया। कई वर्षों पहले पेड़ की कई डालें कटवा दी गई थीं तो इसे रेतते हुए बिजली के तार भी लगाए गए।
इलाहाबाद में क्रांति का बिगुल बजने के बाद शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर तलाशी ली गई और धर-पकड़ के बाद बड़ी संख्या में लोगों को जेलों में बंद कर दिया गया। बाद में फांसी की सजा सुना दी गई। अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को सबक सिखाने के उद्देश्य से उन्हें मौत के घाट उतारना ही बेहतर समझा। सो नीम के पेड़ों से ही उन्हें लटकाकर फांसी दे दी गई। एक-एक को गाड़ी में बिठाकर लाया जाता, फिर गाड़ी हटा ली जाती और वह व्यक्ति पेड़ पर लटककर शहीद हो जाता। बाद में इन शहीदों की लाशों को सामने एक कुंए में फेंक दिया गया था।
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प्रोविजनल सिविल कमिश्नर सर जार्ज कैंपवेल ने कहा था, ‘मैं जानता हूं कि इलाहाबाद में बड़ी बेदर्दी के साथ कत्लेआम किया गया। वास्तविकता यह है कि अंग्रेजों ने वह काम किए हैं जो कत्लेआम से भी भयंकर थे।’ इसी तरह जनरल हैवलाक की सेना के एक अधिकारी ने लिखा, ‘हमें याद रखना चाहिए कि जिन लोगों को ऐसी फांसी दी गई, वे कोई सशस्त्र बागी नहीं बल्कि आसपास के गांवों के निरीह नागरिक थे, जिन्हें संदेह के आधार पर पकड़ने के बाद फांसी दी गई।’
नीम के पेड़ से सटी पान की दुकान के मालिक विजय श्रीवास्तव ने चार जून 1957 की दुकान के किराए की रसीद दिखाते हुए दावा किया कि यह दुकान लगाने का लाइसेंस तत्कालीन मंत्री सालिगराम जायसवाल ने दिलाया था। तभी से यह दुकान वहां पर लगती आई है, अब प्रशासन ने बिना कुछ सुने उसे हटवा दिया।
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की शहादत के साक्षी प्रतीकों में चौक स्थित नीम का पेड़ अहम है। कभी सात पेड़ों के समूह में से अब एक ही बचा है। 1857 की क्रांति को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने इन्हीं नीम के पेड़ों से आठ सौ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को फांसी पर लटका दिया था। चौक के व्यस्त बाजार का असर नीम के पेड़ पर भी पड़ा और चाय-पान, झोला-रस्सी आदि की दुकानों ने इसे घेर लिया। कई वर्षों पहले पेड़ की कई डालें कटवा दी गई थीं तो इसे रेतते हुए बिजली के तार भी लगाए गए।
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इलाहाबाद में क्रांति का बिगुल बजने के बाद शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर तलाशी ली गई और धर-पकड़ के बाद बड़ी संख्या में लोगों को जेलों में बंद कर दिया गया। बाद में फांसी की सजा सुना दी गई। अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को सबक सिखाने के उद्देश्य से उन्हें मौत के घाट उतारना ही बेहतर समझा। सो नीम के पेड़ों से ही उन्हें लटकाकर फांसी दे दी गई। एक-एक को गाड़ी में बिठाकर लाया जाता, फिर गाड़ी हटा ली जाती और वह व्यक्ति पेड़ पर लटककर शहीद हो जाता। बाद में इन शहीदों की लाशों को सामने एक कुंए में फेंक दिया गया था।
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प्रोविजनल सिविल कमिश्नर सर जार्ज कैंपवेल ने कहा था, ‘मैं जानता हूं कि इलाहाबाद में बड़ी बेदर्दी के साथ कत्लेआम किया गया। वास्तविकता यह है कि अंग्रेजों ने वह काम किए हैं जो कत्लेआम से भी भयंकर थे।’ इसी तरह जनरल हैवलाक की सेना के एक अधिकारी ने लिखा, ‘हमें याद रखना चाहिए कि जिन लोगों को ऐसी फांसी दी गई, वे कोई सशस्त्र बागी नहीं बल्कि आसपास के गांवों के निरीह नागरिक थे, जिन्हें संदेह के आधार पर पकड़ने के बाद फांसी दी गई।’
नीम के पेड़ से सटी पान की दुकान के मालिक विजय श्रीवास्तव ने चार जून 1957 की दुकान के किराए की रसीद दिखाते हुए दावा किया कि यह दुकान लगाने का लाइसेंस तत्कालीन मंत्री सालिगराम जायसवाल ने दिलाया था। तभी से यह दुकान वहां पर लगती आई है, अब प्रशासन ने बिना कुछ सुने उसे हटवा दिया।