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वक्फ संपत्ति पर अवैध कब्जे के लिए प्रशासन भी दोषी

Mon, 14 Oct 2019 01:24 AM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Mon, 14 Oct 2019 01:24 AM IST
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Administration also guilty for illegal possession of Waqf property
Administration also guilty for illegal possession of Waqf property
 शिया-सुन्नी वक्फ बोर्ड में संपत्तियों की खरीद-फरोख्त की सीबीआई जांच की सिफारिश के बाद जिले में भी हड़कंप मचा हुआ है। दरसअल सीबीआई जांच की सिफारिश के लिए प्रदेश सरकार ने जिन दो मुकदमों को आधार बनाया है, उनमें से एक शहर कोतवाली का भी है। इस संबंध में पुलिस के साथ ही प्रशासन व एडीए की भी भूमिका भी संदेह के घेरे में है। ऐसे मेें इस बात की भी पूरी संभावना है कि सीबीआई तत्कालीन अफसरों से भी पूछताछ कर सकती है।
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मामला कोतवाली के पुराना जीटी रोड स्थित गुलाम हैदर त्रिपोलिया इमामबाड़े, जो वक्फ संपत्ति है, में अवैध निर्माण से जुड़ा है। जिसमें 26 अगस्त 2016 को शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी पर रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इस मामले में जितने दोषी इमामबाड़े में अवैध निर्माण करने वाले हैं, उससे कहीं ज्यादा दोष पुलिस, प्रशासन व एडीए के उन तत्कालीन अफसरों का है, जो सब कुछ देखते व जानते हुए भी चुपचाप बैठे रहे। शिकायतों पर बहुत दबाव पड़ने पर भी उनकी कार्रवाई महज खानापूरी तक ही सीमित रही।
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पुलिस ने नामजद आरोपी को दे दी क्लीन चिट
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मामले में पुलिस की भूमिका चौंकाने वाली रही। पहले तो तमाम सबूत होने के बावजूद उचित धाराओं में मामला नहीं दर्ज किया गया। इसके बाद विवेचना के दौरान नामजद आरोपी वसीम रिजवी को क्लीन चिट देकर खानापूरी करते हुए महज इमामबाड़े के मुतवल्ली के ही खिलाफ न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल किया। विवेचना में पुलिस का खेल इस बात से ही समझ आता है कि अल्पसंख्यक आयोग के आदेश के बाद हुई इस मामले की पुनर्विवेचना के दौरान पर्याप्त साक्ष्य पाए जाने पर वसीम रिजवी का नाम फिर सामने आया।
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इसके साथ ही मामले में पूर्व में लगी धाराओं के अलावा किसी वर्ग के धर्म का अपमान करने के आशय से उपासना के स्थान की क्षति करना (295ए), विभिन्न समुदायों के बीच शत्रुता, घृणा, या वैमनस्य की भावना पैदा करना (505बी), आपराधिक साजिश (120बी), 51 वक्फ बोर्ड एक्ट व पूजा स्थल विधेयक 1991 के तहत भी अपराध का होना पाया गया। जिसके बाद ये धाराएं बढ़ाने के लिए शासन से अनुमति मांगी गई है। पुलिस की भूमिका संदिग्ध होने की एक वजह यह भी है कि मुकदमा वादी एडीए जेई सुधाकर मिश्रा ने भी तहरीर में आरोप लगाया था कि कई बार पत्राचार करने के बावजूद पुलिस ने इस मामले में उचित कार्रवाई नहीं की। यहां तक कि पूर्व में ही तहरीर देने के बावजूद रिपोर्ट तक नहीं दर्ज की।
प्रशासन: जांच में शिकायत सही पाई लेकिन रिपोर्ट में घालमेल
इस मामले में तत्कालीन प्रशासनिक अफसरों की कार्यप्रणाली पर भी कई तरह के सवाल खड़े हुए। दरअसल शिकायतकर्ताओं ने बताया कि इमामबाड़े मेें अवैध निर्माण की शिकायत अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री के साथ ही जिला प्रशासन के तत्कालीन अफसरों से भी की गई थी। जिसके बाद तत्कालीन जिलाधिकारी की ओर से मामले की जांच के लिए एडीएम सिटी की अध्यक्षता में छह सदस्यीय कमेटी गठित की गई थी। इनमेें तत्कालीन एसपी सिटी, एडीए सचिव, अपर नगर आयुक्त, नगर मजिस्ट्रेट व सीओ कोतवाली भी शामिल थे। कमेटी ने जांच रिपोर्ट में अपने अंतिम व अतिमहत्वपूर्ण बिंदु में यह माना था कि ‘अध्यक्ष शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड से स्वीकृत मानचित्र के आधार पर हुए निर्माण में इमामबाड़े की लगभग 80 फीसदी जमीन पर दुकानें बनी हैं जबकि महज 15-20 प्रतिशत जमीन ही धार्मिक कार्य के लिए शेष है, जिससे पुराने इमामबाड़े का अस्तित्व समाप्त हो गया है।’ इसके बावजूद रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मामले में प्रशासनिक स्तर पर कोई अन्य कार्रवाई प्रथम दृष्टया आवश्यक नहीं है।
एडीए: कार्रवाई के नाम पर चलती रही सिर्फ खानापूरी
शिकायतकर्ताओं ने इस मामले में तत्कालीन एडीए अफसरों की मंशा पर भी सवाल खड़े किए। उनका आरोप है कि दिसंबर 2015 में मामले की शिकायत के बावजूद पांच महीनों तक ठोस एडीए महज कागजी कार्यवाही कर खानापूरी में लगा रहा। अफसर केवल पुलिस को पत्र भेजकर अवैध निर्माण रोकने की मांग करते रहे। बढ़ते जनाक्रोश को देखते हुए मई 2016 में निर्माण सील करने की कार्रवाई की लेकिन वह भी महज दिखावा ही साबित हुई। क्योंकि निर्माण कार्य अपनी गति से चलता रहा। लोगों का दबाव बढ़ता देख दो महीने बाद अभियोजन व ध्वस्तीकरण आदेश भी पारित किया लेकिन दोनों में से एक भी कार्रवाई नहीं हुई और निर्माण होता रहा।
खास बात यह है कि 26 अगस्त को एक बार फिर सीलिंग की कार्रवाई हुई लेकिन निर्माण बदस्तूर जारी रहा। इस दौरान मामले की शिकायत जिला प्रशासन के साथ ही पीएमओ में भी की गई। जिसे देखते हुए आननफानन मेें 26 अगस्त 2016 को जेई की ओर से मामले की रिपोर्ट दर्ज कराई गई। चौंकाने वाली बात यह भी है कि जिस एडीए ने अवैध निर्माण को लेकर रिपोर्ट दर्ज कराई, उसी की ओर से ठीक चार दिन बाद मुतवल्ली को पत्र भेजकर कहा गया कि वह शमन मानचित्र दाखिल कर दे, जिसके परीक्षण के बाद आगे की कार्रवाई प्रस्तावित की जाएगी। एडीए की यह कार्यवाही भी उसे सवालों के घेरे में खड़ी करने के लिए काफी है।

शिकायत पर पीएमओ ने भी कराई थी जांच
शिकायतकर्ता असर फाउंडेशन के अध्यक्ष एसएस शौकत आब्दी का दावा है कि मामले की सीबीआई जांच तो तभी तय हो गई थी, जब 21 अगस्त 2016 को उनकी शिकायत पर प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से इस प्रकरण समेत प्रदेश भर की वक्फ संपत्तियों की जांच कराई गई। बताया कि आदेश के बाद सेंट्रल वक्फ काउंसिल ने मामले की जांच की। जिसने जांच में शिकायतों को सही पाते हुए उसने अपनी 36 पन्नों की रिपोर्ट पीएमओ को सौंपी थी। जिसमें मामले की उच्चस्तरीय जांच की सिफारिश भी की गई थी। उन्होंने यह भी बताया कि जिला प्रशासन, एडीए से शिकायत के बाद भी अवैध निर्माण नहीं रुकने पर उन्होंने पीआईएल दाखिल की जिस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने थर्ड पार्टी ट्रांसफर यानी इमामबाड़े की जमीन पर बनी दुकानों के बैनामे या अन्य किसी तरह की खरीद फरोख्त पर रोक लगा दी थी। शौकत का कहना है कि मामले की जांच ठीक ढंग से हुुई तो इस खेल में शामिल कई बड़े चेहरे भी सामने आ जाएंगे।
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