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जीएसटी अधिकरण के मामले में भारत सरकार के अपर वित्त सचिव हाईकोर्ट में पेश
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Additional Finance Secretary to the Government of India presented in the case of GST Tribunal
भारत सरकार के अपर वित्त सचिव हाईकोर्ट में तलब
प्रयागराज। जीएसटी अपीलीय अधिकरण का गठन न हो पाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने भारत सरकार के अपर वित्त सचिव को इस मामले में जवाब देने के लिए तलब कर लिया है। उनको 25 फरवरी को हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा गया है। पूछा है कि केंद्र सरकार कब तक प्रदेश में अधिकरण की स्थापना कर देगी। यह आदेश न्यायमूर्ति आलोक माथुर ने मैसर्स जय बाबा अमरनाथ लिमिटेड और सैकड़ों अन्य याचिकाओं की सुनवाई करते हुए दिया है ।
कोर्ट ने हलफनामे के साथ अपर सचिव स्तर के अधिकारी को तलब किया था। जिस पर सीजीएसटी लखनऊ के प्रमुख आयुक्त महेंद्र रंगा ने हलफनामा दाखिल किया। हफनामे में अधिकरण के गठन की कोई जानकारी नहीं दी गई थी। कोर्ट ने इसे संतोषजनक नहीं माना। और 25 फरवरी को अपर सचिव वित्त को हलफनामे के साथ उपस्थित होने का आदेश दिया है।
मालूम हो कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में फार्मास्यूटिकल कंपनी ने याचिका दाखिल कर अधिकरण गठित करने की मांग की है। कोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकार से जवाब मांगा। राज्य सरकार ने 21 फरवरी 2019 को एक प्रस्ताव जीएसटी काउंसिल को भेजा, जिसमें राज्य अधिकरण की पीठ लखनऊ एवं 16 जिलों में 20 एरिया पीठ गठित करने का सुझाव दिया गया। कोर्ट ने राज्य सरकार को यह कहते हुए पुनर्विचार करने का आदेश दिया कि मद्रास बार एसोसिएशन केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जहां हाईकोर्ट की प्रधान पीठ हो, अधिकरण वहीं बनना चाहिए। जिस पर राज्य सरकार ने 15 मार्च 2019 को संशोधित प्रस्ताव जीएसटी काउंसिल को भेजा। जिसमें इलाहाबाद में प्रधान पीठ और विभिन्न शहरों में चार एरिया पीठ गठित करने का सुझाव दिया गया। इसके बाद लखनऊ पीठ में एक जनहित याचिका दाखिल की गई ।
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अवध बार एसोसिएशन की इस जनहित याचिका को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 31 मई 2019 के आदेश से इलाहाबाद में अधिकरण की पीठ गठन करने के राज्य सरकार के प्रस्ताव को रद्द कर दिया और 21 फरवरी 2019 के पूर्व प्रस्ताव के तहत निर्णय लेने का आदेश दिया। दो पीठों के आदेशों में भिन्नता के कारण अधिकरण गठन का मामला अभी लटका है।
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प्रयागराज। जीएसटी अपीलीय अधिकरण का गठन न हो पाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने भारत सरकार के अपर वित्त सचिव को इस मामले में जवाब देने के लिए तलब कर लिया है। उनको 25 फरवरी को हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा गया है। पूछा है कि केंद्र सरकार कब तक प्रदेश में अधिकरण की स्थापना कर देगी। यह आदेश न्यायमूर्ति आलोक माथुर ने मैसर्स जय बाबा अमरनाथ लिमिटेड और सैकड़ों अन्य याचिकाओं की सुनवाई करते हुए दिया है ।
कोर्ट ने हलफनामे के साथ अपर सचिव स्तर के अधिकारी को तलब किया था। जिस पर सीजीएसटी लखनऊ के प्रमुख आयुक्त महेंद्र रंगा ने हलफनामा दाखिल किया। हफनामे में अधिकरण के गठन की कोई जानकारी नहीं दी गई थी। कोर्ट ने इसे संतोषजनक नहीं माना। और 25 फरवरी को अपर सचिव वित्त को हलफनामे के साथ उपस्थित होने का आदेश दिया है।
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मालूम हो कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में फार्मास्यूटिकल कंपनी ने याचिका दाखिल कर अधिकरण गठित करने की मांग की है। कोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकार से जवाब मांगा। राज्य सरकार ने 21 फरवरी 2019 को एक प्रस्ताव जीएसटी काउंसिल को भेजा, जिसमें राज्य अधिकरण की पीठ लखनऊ एवं 16 जिलों में 20 एरिया पीठ गठित करने का सुझाव दिया गया। कोर्ट ने राज्य सरकार को यह कहते हुए पुनर्विचार करने का आदेश दिया कि मद्रास बार एसोसिएशन केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जहां हाईकोर्ट की प्रधान पीठ हो, अधिकरण वहीं बनना चाहिए। जिस पर राज्य सरकार ने 15 मार्च 2019 को संशोधित प्रस्ताव जीएसटी काउंसिल को भेजा। जिसमें इलाहाबाद में प्रधान पीठ और विभिन्न शहरों में चार एरिया पीठ गठित करने का सुझाव दिया गया। इसके बाद लखनऊ पीठ में एक जनहित याचिका दाखिल की गई ।
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अवध बार एसोसिएशन की इस जनहित याचिका को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 31 मई 2019 के आदेश से इलाहाबाद में अधिकरण की पीठ गठन करने के राज्य सरकार के प्रस्ताव को रद्द कर दिया और 21 फरवरी 2019 के पूर्व प्रस्ताव के तहत निर्णय लेने का आदेश दिया। दो पीठों के आदेशों में भिन्नता के कारण अधिकरण गठन का मामला अभी लटका है।