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जुबां पर एक सवाल, कौन होगा फूलपुर से उम्मीदवार
Sat, 06 Apr 2019 12:57 AM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Sat, 06 Apr 2019 12:57 AM IST
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प्रयागराज की फूलपुर और इलाहाबाद संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव के प्रत्याशियों का नामांकन 16 अप्रैल से शुरू हो जाएगा। अब नामांकन के दस दिन और मतदान के महज 37 दिन का ही वक्त रह गया है। लेकिन, भाजपा ने अब तक फूलपुर संसदीय सीट से प्रत्याशी घोषित नहीं किया है। ऐसे में पार्टी के तमाम नेता एवं कार्यकर्ता भी हैरत में हैं, जबकि इलाहाबाद संसदीय सीट से पार्टी ने 11 दिन पूर्व ही डॉ. रीता बहुगुणा जोशी को उम्मीदवार घोषित कर दिया है।
पिछले वर्ष हुए उपचुनाव में पार्टी प्रत्याशी प्रवीण पटेल की हार के बाद से ही माना जा रहा है कि फूलपुर से पार्टी इस बार स्थानीय प्रत्याशी को ही मैदान में उतारेगी। इस बीच फूलपुर से काफी नेताओं ने टिकट का दावा भी किया है। इसमें कुछ दिग्गज नेताओें के भी नाम शामिल हैं। भीतर खाने इस बात की भी चर्चा है कि पार्टी अभी सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी की घोषणा का इंतजार कर रही है। इसके बाद ही भाजपा अपने पत्ते खोलेगी। इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व के पास तीन नाम भी पहुंचे हैं। एक नाम अगड़ी जाति के नेता का और बाकी दो पिछड़ी जाति के नेता के हैं। फूलपुर में हुए अब तक के चुनाव को देखते हुए संभावना इसी बात की है कि पार्टी पिछड़ी जाति के नेता के नाम पर ही अपनी मुहर लगा सकती है। क्योंकि, यहां पिछड़ी जाति के नेताओं का चुनाव जीतने का प्रतिशत ज्यादा है।
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पिछले वर्ष हुए उपचुनाव में पार्टी प्रत्याशी प्रवीण पटेल की हार के बाद से ही माना जा रहा है कि फूलपुर से पार्टी इस बार स्थानीय प्रत्याशी को ही मैदान में उतारेगी। इस बीच फूलपुर से काफी नेताओं ने टिकट का दावा भी किया है। इसमें कुछ दिग्गज नेताओें के भी नाम शामिल हैं। भीतर खाने इस बात की भी चर्चा है कि पार्टी अभी सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी की घोषणा का इंतजार कर रही है। इसके बाद ही भाजपा अपने पत्ते खोलेगी। इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व के पास तीन नाम भी पहुंचे हैं। एक नाम अगड़ी जाति के नेता का और बाकी दो पिछड़ी जाति के नेता के हैं। फूलपुर में हुए अब तक के चुनाव को देखते हुए संभावना इसी बात की है कि पार्टी पिछड़ी जाति के नेता के नाम पर ही अपनी मुहर लगा सकती है। क्योंकि, यहां पिछड़ी जाति के नेताओं का चुनाव जीतने का प्रतिशत ज्यादा है।
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