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एक चिंगारी मचा सकती है तबाही
Allahabad
Updated Thu, 28 Feb 2013 05:30 AM IST
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इलाहाबाद। कोलकाता में भीषण आग से 19 लोगों की मौत ने एक बार फिर खतरे के मुहाने पर खड़ी शहर की इमारतों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर की इमारतें, अस्पताल और प्रमुख बाजारों में आग और भगदड़ से बचाव के इंतजाम नाकाफी हैं। ऐसे में एक चिंगारी बड़ी तबाही मचा सकती है। हादसों के बाद हर बार इंतजाम और कार्रवाई को लेकर हो हल्ला मचता है लेकिन मौत को दावत देने का यह खेल खत्म नहीं हो रहा है। कई बिल्डिंगें, अस्पताल और कार्यालय ऐसे हैं जहां धुआं भरा तो दम घुटने से कई जिंदगी खत्म हो जाएंगी। हादसे दर हादसे होने के बाद भी सबकुछ भगवान भरोसे ही छोड़ा जा रहा है। खतरों से खेलती ऐसी इमारतों की जांच और कार्रवाई की जिम्मेदारी फायर ब्रिगेड की है लेकिन रसूखवालों के दबाव और ले देकर मामला निपटाने की वजह से सबकुछ जस का तस बना हुआ है।
शहर के 27 नर्सिंग होम-अस्पताल ऐसे हैं जहां आग की लपटों से बड़ी तबाही हो सकती है। अस्पताल में ऐसे संकरे रास्ते हैं जहां से बाहर निकलना मुश्किल है। आग लगने के बाद मरीजों को सकुशल निकाल लेना जंग लड़ने जैसा है। ऐसे अस्पताल एक ही प्रवेश और निकास द्वार से चल रहे हैं। इन अस्पताल को एनओसी कैसे मिली, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। कई अस्पताल तो आबादी के बीच हैं जहां हादसे के बाद आसपास के मकान और इमारतें भी जद में आएंगी। अकेले जार्जटाउन इलाके में एक दर्जन छोटे-छोटे मकानों को नर्सिंग होम में तब्दील कर दिया गया है। सिविल लाइंस, मुट्ठीगंज, कीडगंज, कटरा, दारागंज, करेली, धूमनगंज और चौक में संकरी गलियों में अस्पताल खोल मौत को दावत देने का खेल चल रहा है। शहर की बड़ी इमारतों का भी ऐसा ही हाल है। मानकों को दरकिनार कर खड़ी की गई बिल्डिंगें हादसे को खुद दावत दे रही हैं। छोटे प्लाटों को अपार्टमेंट की शक्ल दे दी गई है, ऐसे में आग लग जाए तो लोगों को अपार्टमेंट से बाहर निकालना मुश्किल है। पुराने शहर की इमारतों का तो और बुरा हाल है। चौक, लोकनाथ, घंटाघर, रानीमंडी, नखासकोहना, मुट्ठीगंज, कीडगंज, नुरुल्ला रोड, रोशनबाग, अकबरपुर आदि इलाकों में कई दर्जन ऐसी बिल्डिंगें हैं जो जर्जर हो चली हैं। इन इमारतों में आग से बवाच के मामूली इंतजाम भी नहीं हैं। छोटी सी चिंगारी उस इमारत के साथ आसपास के कई मकानों को तबाह कर सकती है। हर इमारत में कम से कम आठ से दस सिलेंडर होते हैं, चिंगारी से लगी आग गैस सिलेंडर से भयावह होगी और मौत का आंकड़ा बढ़ता ही जाएगा। चौक और सिविल लाइंस में कई बार आग लगने के बाद हो हल्ला मचा लेकिन अफसरों की फिक्र महज एक हफ्ते तक ही चली।
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दो साल में 34 इमारत और नर्सिंग होम को नोटिस
इलाहाबाद। बड़ी इमारतों और बाजारों में आग लगने के बाद हमेशा हाथ मलने वाले फायर ब्रिगेड कार्रवाई के नाम पर महज खानापूर्ती ही करता रहा है। दो सालों में फायर सर्विस की तरफ से शहर की 34 इमारतों और नर्सिंग होमों को नोटिस जारी किया गया। कई इमारतों के मालिकों ने तो नोटिस का जवाब देना भी मुनासिब नहीं समझा। कुछ ने फायर उपकरण लगाने के बाद जवाब दाखिल कर दिए। करीब एक दर्जन नोटिसें अभी भी जवाब का इंतजार कर रही हैं। फायर सर्विस का हाल यह है कि आग लगने के बाद विभाग को पता चलता है कि फलां इमारत, फैक्ट्री, गोदाम में तो आग से बचाव के साधन ही नहीं किए गए थे।
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फायर ब्रिगेड की तरफ से चेकिंग और कार्रवाई होती रहती है। फायर सर्विस के नियम न फालो करने वालों को नोटिस भी भेजी जाती है। सिविल लाइंस और जार्जटाउन की तमाम बिल्डिंगों में आधुनिक उपकरण लगवाए गए हैं। लापरवाही के जो मामले संज्ञान में आते हैं उन पर कार्रवाई के लिए प्रशासन को भी लिखा जाता है।
सतीश चंद, सीएफओ
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शहर के 27 नर्सिंग होम-अस्पताल ऐसे हैं जहां आग की लपटों से बड़ी तबाही हो सकती है। अस्पताल में ऐसे संकरे रास्ते हैं जहां से बाहर निकलना मुश्किल है। आग लगने के बाद मरीजों को सकुशल निकाल लेना जंग लड़ने जैसा है। ऐसे अस्पताल एक ही प्रवेश और निकास द्वार से चल रहे हैं। इन अस्पताल को एनओसी कैसे मिली, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। कई अस्पताल तो आबादी के बीच हैं जहां हादसे के बाद आसपास के मकान और इमारतें भी जद में आएंगी। अकेले जार्जटाउन इलाके में एक दर्जन छोटे-छोटे मकानों को नर्सिंग होम में तब्दील कर दिया गया है। सिविल लाइंस, मुट्ठीगंज, कीडगंज, कटरा, दारागंज, करेली, धूमनगंज और चौक में संकरी गलियों में अस्पताल खोल मौत को दावत देने का खेल चल रहा है। शहर की बड़ी इमारतों का भी ऐसा ही हाल है। मानकों को दरकिनार कर खड़ी की गई बिल्डिंगें हादसे को खुद दावत दे रही हैं। छोटे प्लाटों को अपार्टमेंट की शक्ल दे दी गई है, ऐसे में आग लग जाए तो लोगों को अपार्टमेंट से बाहर निकालना मुश्किल है। पुराने शहर की इमारतों का तो और बुरा हाल है। चौक, लोकनाथ, घंटाघर, रानीमंडी, नखासकोहना, मुट्ठीगंज, कीडगंज, नुरुल्ला रोड, रोशनबाग, अकबरपुर आदि इलाकों में कई दर्जन ऐसी बिल्डिंगें हैं जो जर्जर हो चली हैं। इन इमारतों में आग से बवाच के मामूली इंतजाम भी नहीं हैं। छोटी सी चिंगारी उस इमारत के साथ आसपास के कई मकानों को तबाह कर सकती है। हर इमारत में कम से कम आठ से दस सिलेंडर होते हैं, चिंगारी से लगी आग गैस सिलेंडर से भयावह होगी और मौत का आंकड़ा बढ़ता ही जाएगा। चौक और सिविल लाइंस में कई बार आग लगने के बाद हो हल्ला मचा लेकिन अफसरों की फिक्र महज एक हफ्ते तक ही चली।
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दो साल में 34 इमारत और नर्सिंग होम को नोटिस
इलाहाबाद। बड़ी इमारतों और बाजारों में आग लगने के बाद हमेशा हाथ मलने वाले फायर ब्रिगेड कार्रवाई के नाम पर महज खानापूर्ती ही करता रहा है। दो सालों में फायर सर्विस की तरफ से शहर की 34 इमारतों और नर्सिंग होमों को नोटिस जारी किया गया। कई इमारतों के मालिकों ने तो नोटिस का जवाब देना भी मुनासिब नहीं समझा। कुछ ने फायर उपकरण लगाने के बाद जवाब दाखिल कर दिए। करीब एक दर्जन नोटिसें अभी भी जवाब का इंतजार कर रही हैं। फायर सर्विस का हाल यह है कि आग लगने के बाद विभाग को पता चलता है कि फलां इमारत, फैक्ट्री, गोदाम में तो आग से बचाव के साधन ही नहीं किए गए थे।
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फायर ब्रिगेड की तरफ से चेकिंग और कार्रवाई होती रहती है। फायर सर्विस के नियम न फालो करने वालों को नोटिस भी भेजी जाती है। सिविल लाइंस और जार्जटाउन की तमाम बिल्डिंगों में आधुनिक उपकरण लगवाए गए हैं। लापरवाही के जो मामले संज्ञान में आते हैं उन पर कार्रवाई के लिए प्रशासन को भी लिखा जाता है।
सतीश चंद, सीएफओ