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केंइ्र की आयुष्मान योजना को हाईकोर्ट ने सराहा
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केंद्र की ‘आयुष्मान भारत’ योजना को हाईकोर्ट ने सराहा
0 किसानों की दशा पर जताई चिंता, कहा किसान नहीं कर पाता अपने उत्पाद की कीमत
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गरीबों के निशुल्क इलाज के लिए लागू केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना की सराहना की है। भूमि अधिग्रहण के एक मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने देश में किसानों की दशा पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि किसानों का जीवन लगातार नए प्रयोग और वजूद के लिए संघर्ष में बीत रहा है। उन्हें सूखा, बाढ़ और लागत तथा मूल्यों में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है। दूसरे उद्योगों की तरह किसान को अपने उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार नहीं होता। बिचौलिए उनकी मेहनत की कमाई का फायदा उठाते हैं। सरकार किसानों को सामान रूप से लाभ देने में नाकाम रही है। इसलिए उनकी जीविका के मूल अधिकार से जुड़ी जमीन के अधिग्रहण पर उन्हें उचित मुआवजा मिलना चाहिए।
न्यायमूर्ति एसपी केशरवानी ने गरीबों और किसानों के लिए केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना की तारीफ करते हुए कहा कि सरकार ने नि:शुल्क स्वास्थ्य सुविधाएं देकर संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। कोर्ट ने कहा किसान अभी भी दशकों पहले की स्थिति में हैं। किसानी से होने वाली आमदनी से परिवार की न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी हो सकती हैं। ऐसे तमाम मामले प्रकाश में आते रहते हैं, जब देश के विभिन्न हिस्सों में किसान आर्थिक परेशानी के चलते अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं। कोर्ट ने कहा है कि किसानों की जमीन विकास के लिए जबरदस्ती ले ली जाती है और उन्हें उचित मुआवजे के लिए सालों मुकदमेबाजी में उलझना पड़ता है।
मुआवजे के लिए वर्षों लगाते पड़ते हैं कोर्ट के चक्कर
28 साल पहले अधिगृहीत जमीन के मुआवजे के लिए किसानों को 16 साल कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े। कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण मुआवजे को लेकर दाखिल सैकड़ों किसानों की अपीलें मंजूर कर ली है। और प्रत्येक को बतौर हर्जाना 5 हजार रूपये दिए जाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने नोएडा अथॉरिटी को किसानों को 355 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजे का भुगतान 3 माह में करने का निर्देश दिया है।
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क्या था मामला
1989 से 1992 तक गौतमबुद्धनगर के चार गावों छलेरा, आगाहपुर, मोरना और कोशियार पुर की जमीनें अधिगृहीत की गईं। मुआवजे के भुगतान राशि में अंतर को लेकर मोरना गांव के रामपाल और सैकड़ों किसानों ने अपर जिला जज गाजियाबाद के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। कोर्ट ने आसपास के गांवों की भूमि की कीमत के आधार मुआवजा देने का आदेश दिया है।
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केंद्र की ‘आयुष्मान भारत’ योजना को हाईकोर्ट ने सराहा
0 किसानों की दशा पर जताई चिंता, कहा किसान नहीं कर पाता अपने उत्पाद की कीमत
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गरीबों के निशुल्क इलाज के लिए लागू केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना की सराहना की है। भूमि अधिग्रहण के एक मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने देश में किसानों की दशा पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि किसानों का जीवन लगातार नए प्रयोग और वजूद के लिए संघर्ष में बीत रहा है। उन्हें सूखा, बाढ़ और लागत तथा मूल्यों में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है। दूसरे उद्योगों की तरह किसान को अपने उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार नहीं होता। बिचौलिए उनकी मेहनत की कमाई का फायदा उठाते हैं। सरकार किसानों को सामान रूप से लाभ देने में नाकाम रही है। इसलिए उनकी जीविका के मूल अधिकार से जुड़ी जमीन के अधिग्रहण पर उन्हें उचित मुआवजा मिलना चाहिए।
न्यायमूर्ति एसपी केशरवानी ने गरीबों और किसानों के लिए केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना की तारीफ करते हुए कहा कि सरकार ने नि:शुल्क स्वास्थ्य सुविधाएं देकर संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। कोर्ट ने कहा किसान अभी भी दशकों पहले की स्थिति में हैं। किसानी से होने वाली आमदनी से परिवार की न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी हो सकती हैं। ऐसे तमाम मामले प्रकाश में आते रहते हैं, जब देश के विभिन्न हिस्सों में किसान आर्थिक परेशानी के चलते अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं। कोर्ट ने कहा है कि किसानों की जमीन विकास के लिए जबरदस्ती ले ली जाती है और उन्हें उचित मुआवजे के लिए सालों मुकदमेबाजी में उलझना पड़ता है।
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मुआवजे के लिए वर्षों लगाते पड़ते हैं कोर्ट के चक्कर
28 साल पहले अधिगृहीत जमीन के मुआवजे के लिए किसानों को 16 साल कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े। कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण मुआवजे को लेकर दाखिल सैकड़ों किसानों की अपीलें मंजूर कर ली है। और प्रत्येक को बतौर हर्जाना 5 हजार रूपये दिए जाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने नोएडा अथॉरिटी को किसानों को 355 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजे का भुगतान 3 माह में करने का निर्देश दिया है।
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क्या था मामला
1989 से 1992 तक गौतमबुद्धनगर के चार गावों छलेरा, आगाहपुर, मोरना और कोशियार पुर की जमीनें अधिगृहीत की गईं। मुआवजे के भुगतान राशि में अंतर को लेकर मोरना गांव के रामपाल और सैकड़ों किसानों ने अपर जिला जज गाजियाबाद के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। कोर्ट ने आसपास के गांवों की भूमि की कीमत के आधार मुआवजा देने का आदेश दिया है।