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विभागीय जांच के बिना नहीं दी सकती अनिवार्य सेवानिवृति

Mon, 17 Dec 2018 08:15 PM IST
Updated Mon, 17 Dec 2018 08:15 PM IST
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विभागीय जांच के बिना नहीं दी सकती अनिवार्य सेवानिवृति
विभागीय जांच के बिना नहीं दी
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जा सकती अनिवार्य सेवानिवृत्ति
- बिना जांच पड़ताल कर्मचारी को सूखी लकड़ी बता रिटायर करना गलत
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। बिना विभागीय जांच के कर्मचारी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अवैधानिक माना है। कहा है कि विभागीय जांच के बजाय शार्ट कट तरीके से अनिवार्य सेवानिवृत्ति नहीं दी जा सकती। कर्मचारी के सर्विस रिकार्ड पर विचार करके ही अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी जा सकती। बिना तथ्यों के यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कर्मचारी अपनी उपयोगिता खोने के कारण ‘सूखी लकड़ी’ हो गया है।
न्यायमूर्ति गोविन्द माथुर तथा न्यायमूर्ति सीडी सिंह की खंडपीठ ने रिजवान अहमद की विशेष अपील को स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने कहा है कि यदि शुरुआती दौर की लापरवाही को कर्मचारी ने बाद में सुधार लिया हो और उसकी 10 वर्षों की सेवा में सात वर्ष का रिकार्ड इंट्री नहीं किया गया है तो कर्मचारी को सूखी लकड़ी नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने आबकारी विभाग मुजफ्फरनगर के इंस्पेक्टर याची की अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को रद्द कर दिया है और सभी परिलाभों सहित उनकी सेवा बहाली का निर्देश दिया है। कोर्ट ने बकाया वेतन भुगतान पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
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विभाग ने स्क्रीनिंग कमेटी गठित की थी, जिसने 102 आबकारी निरीक्षकों की कार्य में लापरवाही, निष्ठा संदिग्ध होने पर विचार किया। याची की सत्यनिष्ठा संदिग्ध पाई गई। उसकी अनिवार्य सेवानिवृति की संस्तुति की गई। विभाग ने याची को अनुपयोगी और सूखी लकड़ी मानते हुए सेवानिवृत्त कर दिया । एकलपीठ ने याचिका खारिज कर दी, जिसे विशेष अपील में चुनौती दी गई थी। याची का कहना था कि बिना दोष के उसे दंडित नहीं किया जा सकता। उसके विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई की गई है। कोर्ट ने कहा कि सर्विस रिकार्ड की प्रविष्टि न होने पर कर्मचारी को दंडित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि स्क्रीनिंग कमेटी को सही तथ्यों की जानकारी नहीं दी गई। याची के आवास से भारी मात्रा में शराब की बरामदगी केस में सीजेएम मुजफ्फरनगर ने उसे बरी कर दिया है। इसे भी कमेटी को नहीं बताया गया, जबकि विभाग को जानकारी थी। कोर्ट ने कहा है कि विभाग की कार्रवाई कानून की दृष्टि में सही नहीं है।
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