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पाक के हालात से युद्ध बंदी भी थे त्रस्त
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पाक के हालात से युद्धबंदी भी थे त्रस्त
0 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान चैथम लाइन और इरादतगंज में बनी थी अस्थायी जेल
0 एजी ब्रदरहुड के नेताओं ने की थी युद्धबंदियों से मुलाकात, खाने के साथ पहुंचाए थे कपड़े
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। पुलवामा हमले के बाद सोमवार रात हुई जवाबी कार्रवाई पर बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि पाकिस्तान के हालात आज भी वैसे हैं, जैसे करीब 50 वर्ष पहले थे। पुरनियों ने भारत-पाक युद्ध 1971 से जुड़ी घटनाओं को याद करते हुए कई संस्मरण साझा किए। बताया कि उस वक्त प्रयागराज (इलाहाबाद) में पाक के युद्धबंदी लाए गए थे। अस्थायी जेलों में उन्हें रखा गया था। वहां युद्धबंदियों ने खुद को पाकिस्तान के हालात से त्रस्त बताया था। वे रिहा होकर दोबारा पाक जाना ही नहीं चाहते थे।
एजी ब्रदरहुड के बुजुर्ग नेता कृपाशंकर श्रीवास्तव बताते हैं कि वर्ष 1971 में भारत पाक युद्ध के दौरान हर भारतीय विजय कामना से सड़क पर उतरा था। रात में ब्लैक आउट फिर दिन में हर तरफ युद्ध की स्थिति पर ही चर्चा होती थी। बताते हैं कि उस दौरान पाक के युद्धबंदियों को यहां लाया गया था। चैथम लाइन के साथ इरादतगंज में अस्थायी जेल बनाकर युद्धबंदियों को रखा गया था।
जहां युद्धबंदियों को रखा गया था, वहां कंटीले तार लगाए गए थे। उन तारों में करंट प्रवाहित कर चारों तरफ सुरक्षा का घेरा कसा गया था। उस समय युद्धबंदियों को देखने के लिए हुजूम उमड़ा था लेकिन, आम लोगों को जाने की मनाही थी। हाथ में तिरंगा लेकर लोग भारत माता की जय बोलते सड़कों पर निकले थे। हर तरफ देश प्रेम की गूंज थी।
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पाक के युद्ध बंदियों से एयरफोर्स अफसरों की अनुमति से मुलाकात करने वालों में तत्कालीन एजी ब्रदरहुड के महामंत्री कृपा शंकर श्रीवास्तव भी शामिल थे। उनके मुताबिक युद्धबंदियों ने उन्हें बताया था कि वे पाक में जनरल अयूब के अत्याचार से त्रस्त थे। उनके साथ भेदभाव कर उत्पीड़न किया जाता था। लगभग सभी युद्धबंदी आत्मसमर्पण की घटना को सही करार दे रहे थे। युद्धबंदियों ने कहा था, अच्छा हुआ मेजर जनरल ने आत्मसमर्पण कर दिया, नहीं तो वहां उनका क्या होता, सोच कर रूह कांप जाती है। उन्हें दोबारा पाकिस्तान न जाना पड़े, भले ही वे भारत की जेलों में पड़े रहें।
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युद्ध बंदियों की मदद कर कायम की थी मिसाल
एयरफोर्स और सेना की अनुमति से एजी ब्रदरहुड के नेताओं ने युद्धबंदियों की मदद कर मिसाल कायम की थी। एजी ब्रदरहुड के नेता रहे कृपाशंकर श्रीवास्तव ने बताया कि कमांडिंग चीफ के क हने पर हम लोगों ने मोहल्लों में अभियान चलाकर पांच सौ कोट के साथ बड़ी संख्या में ऊनी कपड़े एकत्र किए थे। युद्धबंदियों के लिए भोजन का भी प्रबंध किया गया था। युद्धबंदियों ने मदद से अभिभूत होकर खूब बातचीत की और भारत में ही रहने की इच्छा जताई थी। युद्धबंदियों ने पूर्वी पाकिस्तान के विभाजन को सुखद बताया था। उस वक्त युद्धबंदियों से मिलने वालों में तत्कालीन अध्यक्ष जीसी बनर्जी, कल्पनाथ सिंह, बाबू बैजनाथ प्रसाद, लक्ष्मीकांत तिवारी के साथ सीडीए पेंशन के कर्मचारी नेता भी शामिल थे।
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0 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान चैथम लाइन और इरादतगंज में बनी थी अस्थायी जेल
0 एजी ब्रदरहुड के नेताओं ने की थी युद्धबंदियों से मुलाकात, खाने के साथ पहुंचाए थे कपड़े
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। पुलवामा हमले के बाद सोमवार रात हुई जवाबी कार्रवाई पर बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि पाकिस्तान के हालात आज भी वैसे हैं, जैसे करीब 50 वर्ष पहले थे। पुरनियों ने भारत-पाक युद्ध 1971 से जुड़ी घटनाओं को याद करते हुए कई संस्मरण साझा किए। बताया कि उस वक्त प्रयागराज (इलाहाबाद) में पाक के युद्धबंदी लाए गए थे। अस्थायी जेलों में उन्हें रखा गया था। वहां युद्धबंदियों ने खुद को पाकिस्तान के हालात से त्रस्त बताया था। वे रिहा होकर दोबारा पाक जाना ही नहीं चाहते थे।
एजी ब्रदरहुड के बुजुर्ग नेता कृपाशंकर श्रीवास्तव बताते हैं कि वर्ष 1971 में भारत पाक युद्ध के दौरान हर भारतीय विजय कामना से सड़क पर उतरा था। रात में ब्लैक आउट फिर दिन में हर तरफ युद्ध की स्थिति पर ही चर्चा होती थी। बताते हैं कि उस दौरान पाक के युद्धबंदियों को यहां लाया गया था। चैथम लाइन के साथ इरादतगंज में अस्थायी जेल बनाकर युद्धबंदियों को रखा गया था।
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जहां युद्धबंदियों को रखा गया था, वहां कंटीले तार लगाए गए थे। उन तारों में करंट प्रवाहित कर चारों तरफ सुरक्षा का घेरा कसा गया था। उस समय युद्धबंदियों को देखने के लिए हुजूम उमड़ा था लेकिन, आम लोगों को जाने की मनाही थी। हाथ में तिरंगा लेकर लोग भारत माता की जय बोलते सड़कों पर निकले थे। हर तरफ देश प्रेम की गूंज थी।
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पाक के युद्ध बंदियों से एयरफोर्स अफसरों की अनुमति से मुलाकात करने वालों में तत्कालीन एजी ब्रदरहुड के महामंत्री कृपा शंकर श्रीवास्तव भी शामिल थे। उनके मुताबिक युद्धबंदियों ने उन्हें बताया था कि वे पाक में जनरल अयूब के अत्याचार से त्रस्त थे। उनके साथ भेदभाव कर उत्पीड़न किया जाता था। लगभग सभी युद्धबंदी आत्मसमर्पण की घटना को सही करार दे रहे थे। युद्धबंदियों ने कहा था, अच्छा हुआ मेजर जनरल ने आत्मसमर्पण कर दिया, नहीं तो वहां उनका क्या होता, सोच कर रूह कांप जाती है। उन्हें दोबारा पाकिस्तान न जाना पड़े, भले ही वे भारत की जेलों में पड़े रहें।
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युद्ध बंदियों की मदद कर कायम की थी मिसाल
एयरफोर्स और सेना की अनुमति से एजी ब्रदरहुड के नेताओं ने युद्धबंदियों की मदद कर मिसाल कायम की थी। एजी ब्रदरहुड के नेता रहे कृपाशंकर श्रीवास्तव ने बताया कि कमांडिंग चीफ के क हने पर हम लोगों ने मोहल्लों में अभियान चलाकर पांच सौ कोट के साथ बड़ी संख्या में ऊनी कपड़े एकत्र किए थे। युद्धबंदियों के लिए भोजन का भी प्रबंध किया गया था। युद्धबंदियों ने मदद से अभिभूत होकर खूब बातचीत की और भारत में ही रहने की इच्छा जताई थी। युद्धबंदियों ने पूर्वी पाकिस्तान के विभाजन को सुखद बताया था। उस वक्त युद्धबंदियों से मिलने वालों में तत्कालीन अध्यक्ष जीसी बनर्जी, कल्पनाथ सिंह, बाबू बैजनाथ प्रसाद, लक्ष्मीकांत तिवारी के साथ सीडीए पेंशन के कर्मचारी नेता भी शामिल थे।